Pawan Jury BhilwaraRj
यह एक भ्रामक एवं बेतुकी धारणा है कि मूर्तिपूजा और बहु-ईश्वर वादी व्यवस्थाएं समाज को कमजोर बना देती है। ग्रीक, रोमन, विकिंग्स और यहाँ तक कि कई भारतीय राजा भी मूर्तिपूजक और बहु-ईश्वरवादी थे।
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बहु-ईश्वरवाद से आशय है कि, एक से अधिक ईश्वर के अस्तित्त्व को स्वीकार करना। तथा लगभग सभी बहु-ईश्वरवादी मूर्तिपूजक रहे है।
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'कैवल्य' प्राप्त कर चुके कई बीजेपी सांसद, मंत्री तथा परेश रावल, राजू हिरानी तथा अक्षय कुमार जैसे ज्ञानी श्रोताओं को निरंतर यह उपदेश देते रहते है कि, मूर्तिपूजा त्याज्य कर्म-काण्ड है और इससे समाज पर प्रतिगामी प्रभाव पड़ता है। इसी श्रेणी के अन्य सिद्ध पुरुष यह कीर्तन भी कीर्तन भी करते रहते है एक ईश्वर की अवधारणा (सबका मालिक एक टाइप) समाज को मजबूत बनाती है, जबकि बहु-ईश्वरवाद इसे कमजोर बनाता है।
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ग्रीस वासी कई ईश्वरो में विश्वास करते थे तथा मूर्तिपूजक थे। ग्रीस ने तुर्की, ईरान को फतह करते हुए भारत में वे यमुना तक पहुंचे ।
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रोमन भी कई प्रकार की मूर्तियों की पूजा करते थे और बहु-ईश्वरवाद में विश्वास रखते थे। उन्होंने तुर्की, ईराक, ईजिप्ट, उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया और यूरोप के आधे भू-भाग को जीता।
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विकिंग्स भी बहु-ईश्वरवादी थे, और उन्होंने लगभग आधे से ज्यादा यूरोप को कब्ज़े में किया।
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भारत में भी ऐसे दर्जनों राजा हुए जो बहु-ईश्वरवादी और मूर्तिपूजक थे।
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चीन और जापान भी मूर्तिपूजक रहा है।
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स्पष्ट है कि मूर्तिपूजा और बहु-ईश्वरवाद किसी भी तरह से समाज और उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर नही बनाता।
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