Pawan Jury BhilwaraRj
हथियार विहीन वैभव की आधारशिला
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यह संघ का छिपा हुआ हथियार है । जाहिर हथियार साथ वाले चित्र में दर्शाया गया है !!
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क्योंकि भारत अपने हथियार स्वंय बनाने की जगह आयात करता है, यदि युद्ध के दौरान हमे आपूर्तिकर्ता देश हथियारों की सप्लाई रोक देते है या हथियारों के दाम 10 गुना कर देते है तो हम युद्ध हार जायेंगे और दुश्मन देश की सेना हमारे शहरो में घुस कर कत्ले आम मचा देगी, इस स्थिति से निपटने के लिए संघ ने अपने 60 लाख स्वयं सेवको को ये भोंपू वितरित किये है ।
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इन भोंपूओ में ध्वनी विस्तारक चिप इंस्टाल किये हुए है । ज्योहीं इन्हें सामान्य मोड़ से 'war mode' पर स्विच करके फूँका जाता है, इनमें से इतनी विकट 'sound waves' निकलती है कि आस पास के एक वर्ग किलोमीटर के इलाके में उपस्थित व्यक्तियों के कान में से खून निकलने लगते है और वे बेहोश हो जाते है । यदि कल भारत को किसी भीषण युद्ध का सामना करना पड़ता है तो अपनी भोंपू रेजिमेंट से दुश्मन देश के आधुनिक हथियारों से निपटने का संघ का यह अपना तरीका है ।
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यही वह मूल कारण है जिसके चलते संघ भारतीय सेना की गिरती हालत पर तबसरा करना समय की बर्बादी समझता है, और भारत के नागरिको को हथियार प्रशिक्षण तथा हथियार रखने छूट देने के क़ानून का विरोध करता है ।
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संघ का तर्क है कि तो क्या हुआ अगर हम आयातित हथियारों पर देश चला रहे है, अगर आयातित हथियारों में 'किल स्विच' इंस्टाल होते है, जिन्हें सक्रीय करने से हथियार काम करना बंद कर देता है, अगर हम खुद के फाइटर प्लेन, पनडुब्बिया, रडार आदि नही बना पा रहे है, अगर 1947 में विभाजन के दौरान 20 लाख हिन्दू इसीलिए क़त्ल कर दिए गए थे क्योंकि उनके पास हथियार नही थे, अगर चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाता जा रहा है तब भी हमें स्वदेशी आधुनिक हथियारों के उत्पादन के बारे में विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारे पास ऐसे संकट से निपटने के लिए अब भोंपू है ।
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यदि आज चीन पाकिस्तान को भारत पर हमला करने के लिए आधुनिक हथियार नही दे रहा है, या खुद सिर्फ अरुणाचल प्रदेश को ही अपने नक़्शे में दिखाकर रुक जा रहा है, यूपी बंगाल बिहार पर अपना हक नही जता रहा है तो उसका कारण यह भोंपू है । चीन और अमेरिका के पास इस यंत्र की काट नही है । ये कसाब का सौभाग्य था कि जब उन्होंने मुंबई हमले में 66 निहत्थे नागरिको को मार गिराया तो उस समय आस पास किसी के पास उच्च आवृति वाला यह ध्वनी विस्तारक भोंपू मौजूद नहीं था ।
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असल में भोंपू और बल्लम मोहन गांधी द्वारा रचे गए अनशन के मायाजाल के क्रम में ही एक कड़ी है । जिस प्रकार गांधी के अनशन करने से अंग्रेजो को डायरिया हो जाता था, पेट में मरोड़ उठने लगती थी, जी मिचलाता था, पित्ता पानी हो जाता था और उनकी शक्ति निचुड़ कर गांधी में समाने लगती थी, कुछ उसी तरह का प्रभाव दुश्मनों पर यह भोंपू पैदा करता है । संघ का मानना है कि अनशन वगेरह के दिन अब लद चुके है (हथियार, सेना वगेरह के दिन तो कभी के लद चुके) नयी सदी में 'परम वैभवशाली भारत' के निर्माण हेतु हमें दुश्मन देश की सेनाओं के आधुनिक हथियारों से निपटने के लिए भोंपू जैसे नये पैंतरो की जरुरत है वरना भारत जैसा हथियार विहीन देश फिर से गुलाम बन जाएगा जैसे कि 200 साल पहले बन गया था ।
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संघ का स्टेंड है कि देश में स्वदेशी आधुनिक हथियारों के उत्पादन के लिए न हमें ज्यूरी सिस्टम की जरुरत है, न इंजीनियरिंग का कौशल विकसित करने और गणित विज्ञान की शिक्षा सुधारने के लिए राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी की जरुरत है, न रक्षा में FDI को केंसिल करने की जरुरत है, न अपनी सेना का आकार 12 लाख से बढाकर 40 लाख करने के लिए वेल्थ टेक्स की जरुरत है, न नागरिको को हथियार चलाने का प्रशिक्षण व् बन्दुक रखने की छूट देने के क़ानून की जरुरत है, न 123 एग्रीमेंट केंसिल कर के परमाणु हथियारों के उत्पादन की जरुरत है, न सेना की बात करने की जरुरत है न ही हथियारों का नाम लेने की जरुरत है ।
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हमें जरुरत है 2030 तक 60 लाख स्वयं सेवको की संख्या बढ़ाकर 6 करोड़ करने की, ताकि 2060 तक इनकी संख्या 60 करोड़ की जा सके । इन सबको 'एक' करने की जरुरत है, एक करने के बाद इन जगाना है, और जगा कर संगठित करना है ताकि फिर से 'एक' किया जा सके । 90 साल में 60 लाख तक पहुंचे है, थोड़ी गति बढाने की जरुरत है । भाड़ में गयी सेना, चूल्हे में गए हथियार, कुँए में डालो अच्छे कानूनों की मांग को । एक करने, संगठित करने और जगाने के लिए 24×7×30×12×90 सालों तक नारे लगाओ, शंख बजाओ, पथ संचलन निकालो, लाठी और बल्लम घुमाना सीखाओ, लाखो राष्ट्रवादी नागरिको को खींच कर इन गतिविधियों में उनकी उर्जा और समय बर्बाद कर दो पर उनको यह तक कभी न बताओ कि गेजेट किस चिड़िया का नाम है ।
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ताकि जब दुश्मन देश की सेना भारत की सीमाओं को तोड़ कर शहरो में घुसे तो उन्हें भोंपू बजा कर भगाया जा सके ।
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