Pawan Jury BhilwaraRj

विचारधारा Vs क़ानून धारा
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संघ की विचारधारा : हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा, हिन्दू सशक्तिकरण, हिन्दू संस्कृति का सरंक्षण, परम्परावादी, दक्षिणपंथी, गायवादी, स्वदेशी दर्शन आदि ।
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संघ की क़ानून धारा :

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के क़ानून का विरोध ।
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मंदिरों का प्रशासन सिख धर्म की तरह मजबूत बनाने के लिए आवश्यक 'हिन्दू देवालय ट्रस्ट अधिनियम' का विरोध ।
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जनसँख्या के बिगड़ते धार्मिक अनुपात को रोकने के लिए 'टू चाइल्ड पालिसी' क़ानून का विरोध ।
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मिशनरीज द्वारा किये जा रहे धर्मान्तर रोकने के लिए, राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी क़ानून का विरोध ।
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मिशनरीज द्वारा प्रायोजित भारतीय संस्कृति को दूषित करने वाले तमाशो Pk, Omg, सिंघम रिटर्न, AIB, माय चोइस का समर्थन और इन्हें रोकने के लिए आवश्यक राईट टू रिकाल सेंसर बोर्ड, डीडी अध्यक्ष और सूचना प्रसारण मंत्रालय क़ानूनो का विरोध ।
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2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए आवश्यक क़ानून का विरोध ।
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कसाई खानों को दी जा रही सब्सिडी, कटवाई में काम आने वाले उपकरणों पर लगने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी पर छूट दिए जाने का समर्थन और गौ हत्या निषेध के लिए आवश्यक राईट टू रिकाल पुलिस प्रमुख व् कसाइयो के नार्को टेस्ट कानूनों का विरोध ।
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विदेशी कम्पनियों को दी जा रही कर राहतो का समर्थन और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने वाले कानूनों जैसे ज्यूरी सिस्टम, संपत्ति कर और राईट टू रिकाल शिक्षा मंत्री कानूनों का विरोध ।
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2011 जनगणना के धर्म और भाषा के आंकड़ो को प्रकाशित न करने के फैसले का समर्थन ।

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समान क़ानून धाराओं के वैचारिक विरोधाभास :

बीजेपी, कोंग्रेस, सपा, बसपा, आम पार्टियों की विचारधारा है कि निर्भया कांड के मुख्य आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, किन्तु इन सभी की क़ानूनधारा यह है कि जुवेनाइल क़ानून में संशोधन नही किया जाना चाहिए ।

नतीजा : इन सभी पार्टियों और इनके शीर्ष नेताओं को यह जानकारी है कि निर्भया के मुख्य आरोपी की अपराध के समय आयु 17 वर्ष 6 माह थी, अत: उसे दिसम्बर 2015 में बाल सुधार गृह से रिहा कर दिया जाएगा ।
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कोंग्रेस की सेकुलर विचारधारा : मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेकर स्वर्ण भंडारों को अधिगृहित कर लिया जाना चाहिए ।
कोंग्रेस की क़ानून धारा : मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लिया ।

बीजेपी की हिन्दू विचारधारा : मंदिरों की संपत्ति पर सरकार का हक़ नहीं ।
बीजेपी की क़ानून धारा : मोदी साहेब ने सत्ता में आने के बाद मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने से इनकार किया, और तिरुपति से 2 टन स्वर्ण भण्डार को सरकारी खजाने में पंहुचा दिया ।

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विचारधारा से जुडी हुयी समस्या यह है कि एक ही समय में एक ही संगठन में भी अलग अलग विचारधाराएं स्वतंत्र रूप से 'निजी विचार' के नाम पर पनप सकती है । विचारधाराएँ दार्शनिक पुट लिए हुए होती है, अपरिभाषित होती है, अपरिमित हो सकती है, अत: लागू नही की जा सकती । जबकि क़ानून धारा स्पष्ट, परिभाषित और परिमित होती है, अत: लागू की जा सकती है ।

उदाहरण के लिए अन्ना और केजरीवाल की विचारधारा है कि राईट टू रिकाल क़ानून देश में लागू होने चाहिए, किन्तु क़ानून धारा यह है कि न तो केजरीवाल साहेब ने सत्ता में आने के बाद राईट टू रिकाल कानूनों को पास किया न ही कभी अन्ना ने लोकपाल के कानूनी ड्राफ्ट में राईट टू रिकाल की धाराओं को शामिल करने का समर्थन किया ।
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साहित्यकारों, लेखको, दार्शनिको और धार्मिक महन्तो द्वारा हर काल में नए विचारों का प्रादुर्भाव किया जाता रहा है, जो कि प्रशस्त भी है, लेकिन राज व्यवस्था का कार्य उन विचारों को कानूनों के माध्यम से अमली जामा पहनाने का है । जब नेता दार्शनिक और उपदेशात्मक समाधान सुझाने लगे तो क्या क़ानून पास करने की जिम्मेदारी पुजारियों को दी जानी चाहिए ?
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इस बात से वाकयी कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी नेता, संगठन, पार्टी की विचारधारा क्या है, क्योंकि राज व्यवस्था कानूनों और उन दिशा निर्देशों पर चलती है जिन्हें राजपत्र ( गेजेट ) में प्रकाशित किया जाता है । जाहिर है, विचारों को गेजेट में प्रकाशित नही किया जा सकता न ही देश में उन्हें लागू किया जा सकता है ।
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हम किन्ही प्रस्तावों को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी खाका खींचने के बजाय यदि उन्हें दर्शन और विचारधारा के रूप में दशको तक पान की तरह मुहं में फेरते रहे तो, इस जुगाली से किसी भी प्रकार का परिवर्तन आने की उम्मीद करना बेतुका विचार है । क्योंकि प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ उन्हीं निर्देशों की अनुपालना करते है, जिन्हें गेजेट में प्रकाशित किया जाता है ।
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असल में यदि आप किसी समस्या के समाधान से लोगो का ध्यान भटकाना चाहते है, तो उसके समाधान के कानूनी उपाय सुझाने की जगह उस पर वैचारिक बहस छेड़ दीजिये, दर्शन बघारिये, प्रवचन दीजिये, उपदेश पिलाइये, चिंतन शिविर आयोजित करवाइये और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दीजिये । इस से मूल समस्या जस की तस रहेगी और आप जनता को इस धोके में रखने में कामयाब हो जायेंगे कि आप वाकई इस समस्या का समाधान चाहते है ।
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यही कारण है कि सभी नेता, समूह और बुद्धिजीवी जानबूझकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के भासण देते है किन्तु जनता को उन कानूनों की जानकारी नहीं देते जिनसे वास्तविक परिवर्तन लाये जा सकते है ।
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तो आइंदा यदि कोई राजनेता, राजनेतिक दल, अराजनेतिक समूह जो कि राजनीति में लिप्त है, सामाजिक संगठन तथा अन्य ऐसे कोई भी समूह, व्यक्ति इत्यादि जो कि देश में व्याप्त समस्याओं को विचारधारा के माध्यम से हल करना चाहते है, से उन कानूनों के ड्राफ्ट देने को कहे, जिन्हें गेजेट में प्रकाशित कर उनकी विचारधारा को लागू किया जा सकता है ।

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राईट टू रिकाल ग्रुप @pk