Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate

Pawan Jury BhilwaraRj:

मेगी खरीदना खाने से ज्यादा हानिकारक है ।
.
जब आप मेगी खरीदते है तो इससे होने वाला मुनाफा नेस्ले की जेब में जाता है । नेस्ले एक विदेशी कंपनी है, अत: नेस्ले के देश में रूपया नही चलता, वहां डॉलर चलता है । इसलिए भारत सरकार ने नेस्ले को यह लिखकर दिया है कि वे जितना भी रूपया भारत में कमाएंगे उसके बदले भारत सरकार उन्हें डॉलर दे देगी । और ऐसा भारत सरकार ने सभी विदेशी कम्पनियों को लिखकर दे दिया है ।
.
भारत के पास डॉलर छापने की मशीने नहीं है, अत: हमारे पास डॉलर लाने के तीन उपाय है--
1) हम निर्यात से डॉलर कमा सकते है । किन्तु हमारा निर्यात आयात से कम है, अत: हम हर साल निर्यात से जितना डॉलर कमाते है, उससे ज्यादा आयात कर के गँवा देते है ।
.
2) विश्व बेंक से कर्ज लेकर डॉलर लाये जाते है । किन्तु हम पहले ही काफी कर्जे लेकर खा चुके है अत: अब हमे कर्जे आसानी से नही मिलते ।
.
3) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) द्वारा डॉलर देश में आता है । जब कोई कम्पनी भारत में व्यापार करने आती है तो वह डॉलर भारतीय रिजर्व बेंक में जमा कराकर डॉलर के बदले में रूपये लेती है ताकि भारत में व्यापार कर सके । लेकिन FDI बूमरेंग की तरह है, जो चलाने वाले पर ही मार करता है । क्योंकि जब ये कम्पनीयां भारत में मुनाफा कमाएगी तो, कमाए गए सभी मुनाफे के बदले हमें डॉलर देने पड़ेंगे । इसे पुनर्भरण या Repatriation कहते है । repatriation crisis से कैसे देश दिवालिये होकर गुलाम बन जाते है इसके लिए गूगल करे ।
.
मतलब जब भी हम मेगी खरीद रहे है, हर पेकेट के साथ हम अपने देश की तिजौरी पर डॉलर का बोझ बढा रहे, जिसमे कि डॉलर पहले से ही मौजूद नही है । यह मेगी को लेकर असली मुद्दा है जिसके समाधान पर हमे ध्यान देना चाहिए । लेकिन मोदी-सोनिया-केजरीवाल पुनर्भरण संकट के बारे में आपको कोई जानकारी नही देना चाहेंगे, क्योंकि पिछले 10 साल में मनमोहन ने जितना काम FDI के क्षेत्र में किया है, उतना मोदी साहेब 1 साल में ही कर के फेंक चुके है, और जहाँ तक केजरीवाल जी की बात है तो, आम आदमी पार्टी की तो उत्पत्ति ही FDI के कुंड से हुयी है । ऐसे में यदि नागरिको को यह जानकारी मिल जाती है कि इस सारे निवेश के बदले भारत को एक दिन डॉलर चुकाने है, तो रातों रात इन नेताओं की प्रतिमाएं टूट जायेगी ।
.
तो मेगी खरीदने से देश के स्वास्थ्य पर निश्चित रूप से कितना बुरा प्रभाव पड़ रहा है, इस बात को कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति समझ सकता है, लेकिन मोदी-सोनिया-केजरीवाल के अंधभक्त इस बात को नहीं समझ पा रहे है । क्योंकि अंधभक्ति ने उनकी सहज बुद्धि को कुंद कर दिया है ।
.
इसके समाधान के लिए हमें मेगी को बेन करने या देश से बाहर खदेड़ने की जरुरत नही है, बल्कि हमें विदेशी कंपनियों से किये गए इस समझौते को रद्द करना चाहिए जिसके अनुसार हमें रूपये में कमायें गए मुनाफे के बदले डॉलर चुकाने होंगे । इससे फ़ूड इंडस्ट्री में आने वाला निवेश स्वत: ही घट जाएगा और स्वदेशी इकाइयों को प्रोत्साहन मिलेगा ।
.
जहाँ तक मेगी खाने से स्वास्थ्य को होने वाले नुक्सान की बात है, मेगी ज्यादा केलोरी वाला खाद्य है जिससे मोटापा बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। यदि मेगी के बारे यह जानकारी ज्यादा लोगो तक पहुँचती है तो इसकी बिक्री घटने की संभावना काफी बढ़ जायेगी ।
.
लेकिन इस तथ्य को उद्घघाटित करने की जगह पेड मिडिया सीसे की मात्रा तय मानको से अधिक होने के मुद्दे पर बवाल मचा रहा है, जो कि एक छद्म आरोप है ।
.
तात्कालीन विवाद मेगी में अनुमोदित मात्रा से ज्यादा सीसे की मात्रा पाए जाने का है । लेकिन यह खुला रहस्य है कि यह मुद्दा कानूनी रूप से मेगी को दोषी साबित नहीं कर पायेगा और मेगी दो चार हफ्ते में क्लीन चिट लेकर फिर से बाजार में लौट आएगी ।
कैसे ?
.
मेगी के पेकेट में नूडल्स के साथ एक 'मेगी मसाला' का पाउच भी होता है, जिसके 1 ग्राम में सीसे की मात्रा 17ppm (part per million) है, जो कि 12ppm के तय मानक से ज्यादा है । लेकिन यदि इसे 80 ग्राम नूडल्स के साथ मिला दिया जाए तो सीसे की मात्रा 1ppm से भी कम हो जाती है जो कि तय मानक से काफी कम है ।क्योंकि मेगी मसाले को मेगी नूडल्स में ही मिलाकर व्यंजन बनाया जाता है, अत: सिर्फ मसाले में मौजूद सीसे की गणना को आधार नही बनाया जा सकता, इसलिए अदालत में यह केस उड़ जाएगा, मेगी को क्लीन चिट मिलेगी, मिडिया और नेता 'मेगी सेफ है' के एलान चलाएंगे और इस प्रचार के कारण मेगी की बिक्री तीन गुना हो जायेगी ।
.
जहाँ तक मेगी में मौजूद msg (मोनो सोडियम ग्लुकामेट) का प्रश्न है, इस विषय में मेगी को ठीक उसी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकेगा, जिस तरह कुछ वर्षो पहले कोका कोला को दोषी नही ठहराया गया था । ज्ञातव्य है कि कोक में पेस्टीसाइड की अधिक मात्रा पाए जाने पर जांच में सामने आया था कि कोक जिस शक्कर का इस्तेमाल ड्रिंक बनाने में कर रही थी उसी शक्कर में भारी मात्रा में पेस्टिसाईड पाए गए थे । भारत में गन्ना, गेंहू समेत सभी फसलों में बेतहाशा रासायनिक खाद का उपयोग किया जा रहा है, जिस कारण हमारे मूल स्त्रोत में ही भारी धातुएं और हानिकारक केमिकल घुल चुके है । अत: मेगी के पास यह बचाव है कि उन्होने अलग से इसमें msg नही मिलाया है, बल्कि जो भी तत्व है वो मूल स्त्रोत से ही इसमें आये है ।
.
एक टुच्चा तर्क यह हो सकता है कि फ़ूड कंपनियों को हानिकारक रसायनों को फ़िल्टर करने के लिए उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि हम अपनी फसलों को विषेले रसायनों से मुक्त नहीं करना चाहते। हमें मेगी और कोला साफ़ चाहिए भले ही हम गेहू, शक्कर, शाक और चावल खा कर टनों की मात्रा में विषेले पदार्थ रोज गटक रहे हो ।
.
मेगी अपने पाउच की अलग से भी बिक्री करती है, किन्तु यह जरुरी नही है कि अलग से बेचे जाने वाले मसाला पाउच में भी सीसे की उतनी ही मात्रा हो जो कि नूडल्स के पेक के साथ दिए जाने वाले पाउच में मौजूद है । यह सब जांच का विषय है । जिसे मंत्री जी और मेगी के अधिकारी मिल बैठ कर तय कर सकते है कि किसमें कितनी मात्रा जनता को दिखानी है ।
.
बहरहाल, मेगी के साथ भी अंत में वही होगा जो कि हमारे देश में आज तक होता आया है । महीने भर में मेगी दोषी होने या न होने के बावजूद बाजार में लौट आएगी । क्योंकि न तो हमारे देश में राईट टू रिकाल फ़ूड इन्स्पेक्टर है, न राईट टू रिकाल FSSAI रेगुलेटर है, न राईट टू रिकाल जज, न राईट टू रिकाल फ़ूड मिनिस्टर। आखिर ये लोग जनता के स्वास्थ्य की चिंता में हजारो करोड़ की कम्पनी से रार क्यों ठानेंगे जबकि मेगी का पक्ष लेने से अच्छे खासे धन की प्राप्ति का अवसर मौजूद हो ।
.
___________________