Pawan Jury BhilwaraRj
पेड इण्डिया टुडे के ताजा अंक में दो 'प्रतिष्ठित और विश्वशनीय' सम्पादक एक दुसरे को एक्सपोज़ करते हुए यह खुलासा कर रहे है, कि निष्पक्ष मिडिया नाम की चिड़िया तो 1988 में भी नही पायी जाती थी, आज की तो बात ही छोड़ दीजिये । उनके सवाल जवाब बताते है कि, कैसे वीपी के आन्दोलन को पेड मिडिया ने भरपूर सहानूभूतिक सहयोग दिया था, तथा वे ऐसा देशहित में कर रहे थे । अन्ना तथा मोदी वेव पर पेड मिडिया की सहानूभूति के ऐसे खुलासो के लिए फिलहाल आप 20-25 साल इंतिजार कीजिये ।
________________
चिट्ठियां जिन्हें पेड इंडिया टुडे ने प्रकाशित किया है ।
------------
यह 18 फ़रवरी 2015, के इण्डिया टुडे के अंक में प्रकाशित शेखर गुप्ता के राष्ट्र-हित कॉलम से संबधित है । आखिरी हिस्से में गुप्ता लिखते है कि, 1998 में इलाहबाद उपचुनाव के लिए प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने प्रभाष जोशी को देवीलाल की और से वी पी सिंह को 7.5 लाख रू चुनाव खर्च के लिए देते देखा था । मैंने जून 1988 में इण्डिया टुडे में गुप्ता की लिखी खबरों को देखा, उनमे ऐसे किसी भी लेनदेन का ज़िक्र नही है। असल में गुप्ता के विवरण बता रहे थे कि वी पी सिंह ने साफ़ सुथरा और पारदर्शी अभियान चलाया था। ऐसे में मैं दो संभावनाएं देखता हूँ। पहली यह कि 1988 में गुप्ता में बतौर पत्रकार इतनी काबलियत नही थी कि वे इस महत्त्वपूर्ण सूचना को रिपोर्ट कर पाते और इसीलिए उन्होंने यह अहम सूचना पाठको से छुपायी, दूसरी उन्होंने 18 फ़रवरी के कॉलम में झूठ बोला है । दोनों ही गलतियों के लिए उन्हें इण्डिया टुडे के पाठको से माफ़ी मांगनी चाहिए। उनकी टिपण्णी एक प्रतिष्ठित और विश्वशनीय पत्रकार की स्मृति पर विद्वेषपूर्ण हमला है - राम बहादुर राय, ट्रस्टी, प्रभाष जोशी परम्परा न्यास ।
.
शेखर गुप्ता का जवाब
आपकी मुख्य आपत्ति यह है कि अगर मैंने वह घटना देखी थी तो मैंने उसका जिक्र 1988 की रिपोर्ट में क्यों नही किया, और अगर नही किया तो क्या इससे मेरी नाकाबलियत जाहिर नही होती ?
दरअसल, यह उस समय राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह की चुनौती के प्रति मेरी सहानूभूति दिखाता है । उस स्टोरी पर कार्य करते हुए ज़्यादातर पत्रकारों ने ऐसा ही महसूस किया था । कभी कभी हम पत्रकार खुद को नेकनीयती वाले सियासी आंदोलनों के सहयात्री के रूप में देखने लगते है और इस लिहाज से मैं भी बेदाग़ नही हूँ, इसीलिए मेरा मामला यहीं ख़त्म हो जाता है ।इस सम्बन्ध में दिवंगत प्रभाष जोशी का ज़िक्र आया है। राजनैतिक इतिहासकारों ने इस तथ्य को बखूबी दर्ज किया है, कि जोशी उस समय जिस प्रकाशन समूह में काम करते थे उसने वीपी सिंह के प्रचार अभियान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । जोशी कोई विश्वाश्घाती काम नही कर रहे थे । इसका सवाल ही नही उठता । वे मेरे पहले संपादक और मार्गदर्शक थे तथा मुझे अपना मानस पुत्र कहते थे । फिर भी यदि उनका जिक्र करने से उनके किसी प्रशंषक को ठेस पहुंची हो, तो मैं खेद प्रकट करता हूँ ।
___________________