Pawan Jury BhilwaraRj

भारत की जनता जन्तु क्यों है..!!
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ज्यूरी प्रथा को भारत में लागू करने को लेकर बुद्धिजीवियों द्वारा किया जाने वाला आम एतराज यह होता है कि, चूँकि भारत में ज़्यादातर लोग बेवकूफ है, घोंघा है, आलसी है, निकम्मे है, भ्रष्ट है, अनैतिक है, साम्प्रदायिक है, अनपढ़ और विचार शून्य है, अत: जनता को सुनवाई और फैसले सुनाने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए ।
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ज्यूरी प्रथा के विषय को दरकिनार करके भी इस बात पर विचार किया जाए तो, विभिन्न वर्गों का आमतौर पर यह प्रतिभाव देखने को मिलता है कि 'भारत की जनता बेवकूफ है' । मजेदार बात यह है कि जनता की श्रेणी में शामिल हर आदमी शेष जनता को बेवकूफ ही मानकर चलता है ।
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किन्तु राजनेतिक बिरादरी और हमारे नेताओं की राय इसके बिलकुल उलट है । वो सिर्फ यह मानते ही नहीं बल्कि याद से बार बार सार्वजनिक रूप से यह कहते भी रहते है कि, 'भारत की जनता बेहद समझदार है, और पब्लिक को सब पता है' ।
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नेताओं के बारे में सभी वर्गो की आम राय है कि वे भ्रष्ट, चालाक या जो भी है, पर कम से कम बेवकूफ तो नहीं ही है ।
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या तो हम बेवकूफ है, या फिर हमारे सभी नेता झूठ बोल रहे ताकि जनता को समझदार संबोधित करके उन्हें इस मुगालते में रखा जाए कि वे वाकयी बेवकूफ नहीं है ।
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बुद्धिजीवी और पेड मिडिया यह जुमले लगातार दोहराते रहते है कि जनता जागरूक नही है, सब स्वार्थी है, देश की किसी को परवाह नही इसीलिए देश डूब रहा है आदि । तब समाधान के लिए दर्शन बघारा जाता है कि खुद को बदलो देश बदलेगा, जनता को खुद की सोच सुधारनी चाहिए, जनता भ्रष्ट और बेवकूफ है इसीलिए देश को भ्रष्ट नेता मिल रहे है और जनता की सोच ही सभी समस्याओं की जड़ है ।.
यदि आप उनमें से है जो मानते है कि भारत की जनता समझदार है और सही गलत का विचार करके फैसले दे सकती है, तो आपको ज्यूरी प्रथा का समर्थन करना चाहिए । किन्तु यदि आप मानते है कि भारत की जनता जन्तु है, तो जनता को विवेकशील, जागरूक और समझदार बनाने का एक मात्र कानूनी तरीका यह है कि भारत में ज्यूरी प्रथा तथा राईट टू रिकाल कानूनों को तुरंत लागू किया जाए ।

क्योंकि सोच सुधारने की हिदायत देने वाले किसी भी बुद्धिजीवी ने अब तक ऐसी किसी दवाई या इंजेक्शन के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है, जिसे लगाने से आदमी की सोच सुधर जाती हो, और रही बात प्रवचन और उपदेश से ऐसा करने की, तो तमाम तरह के ऐसे उपदेशको के उपलब्ध रहते हुए भी भारत के नागरिको की सोच, शिक्षा, बुद्धि जैसी भी है, यथावत है ।
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कैसे ज्यूरी प्रथा तथा राईट टू रिकाल क़ानून नागरिको को विवेकशील और जागरूक बना देते है ?
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अमेरिका और ब्रिटेन में ज्यूरी प्रथा आने से नागरिको की भागीदारी क़ानून, अदालत, पुलिस प्रशासन आदि में रचनात्मक रूप से बढ़ने लगी, जिससे उनमें इन विषयों को समझने की बुद्धि विकसित हुयी, राईट टू रिकाल कानूनों ने उनकी भागीदारी को और बढ़ाया । उन्होंने कानूनों का महत्त्व समझा और अच्छे नेता की जगह अच्छे कानूनों पर ध्यान दिया । जनता के हाथ में सत्ता आने से तकनिकी शिक्षा का विकास हुआ, व्यवसाय करने की आजादी मिली, औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप रोजगार बढ़ा, गरीबी कम हुयी और ये देश आधुनिक हथियारों का उत्पादन कर तेजी से मजबूत होते चले गए ।

यूरोपिय पुनर्जागरण प्रवचन और व्याख्यानों की देन नही थी, ये ज्यूरी प्रथा थी जिससे यूरोप में पुनर्जागरण आया ।
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भारत में आज़ादी मिलने के बाद भी जनता की लोकतंत्र में भागीदारी सिर्फ 5 साल में एक बार वोट करने तक सिमित रही, अत: हम पिछड़ते चले गए । एक वर्ग जान्बूझकर और एक वर्ग अनजाने में आज भी पूरी शक्ति से यह प्रयास कर रहा है कि भारत की स्थिति यथावत बनी रहे ।
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यदि आप शिक्षा स्तर सुधारना चाहते है, तो राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी की मांग कीजिये ।

भारत के लोग अशिक्षित है, और अमेरिका के शिक्षित, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वहां राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी है, जबकि भारत में ऐसा न होने के कारण 8 वीं क्लास तक बिना फ़ैल किये पास कर दिया जाता है, और 3 दिन वन वीक सीरिज पढ़ कर कोई भी बेचलर और मास्टर डिग्री अपने गले में लटका लेता है ।

हम शिक्षा व्यवस्था तोड़ने में मेकाले से भी चार कदम आगे निकले । मान लीजिये कि भारत की जनता शिक्षा व्यवस्था सुधारना चाहती है, तो क्या करे ?
कुतुबमीनार से छलांग लगाए ?
वोट करने के 5 साल पहले और 5 साल बाद तक उनके पास क्या विकल्प है । चूंकि सभी शासक चाहते है कि अवाम का विवेक कुंद रहे इसलिए अगर आप सोचते है कि शासक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की रचना करेंगे जिससे अवाम में बुद्धि और विवेक पैदा हो तो यह हमारी भूल है ।
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यदि आप आपराधिक सोच पर लगाम लगाना चाहते है तो राईट टू रिकाल पुलिस प्रमुख तथा जूरी प्रथा की मांग कीजिये ।

देहात में जाकर पूछिए कि जिला पुलिस प्रमुख या सीबीआई निदेशक कौन है । किन्तु यदि आप स्थानीय विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री या प्रधानमन्त्री का का नाम पूछेंगे तो ज़्यादातर लोग आपको सही जवाब इसलिए देंगे, क्योंकि इनकी चयन प्रक्रिया में उनकी भूमिका थी । बिना सहभागिता के जनता में जागरूकता आना दूर की कौड़ी है ।

यदि भ्रष्ट पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार क्षेत्र के नागरिको के पास होगा तो नागरिक स्वयं ही पुलिस प्रशासन में रूचि लेने लगेंगे । इससे अपराधी अपराध करके बच नहीं सकेंगे वहीँ जूरी प्रथा आने से दंड का त्वरित भय आपराधिक सोच में कमी लाएगा ।
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राईट टू रिकाल ग्रुप प्रस्ताव कर रहा है कि पाठ्यक्रम में 8 वीं कक्षा से क़ानून की पढ़ाई अनिवार्य की जानी चाहिए, तथा छात्रों को 9 वीं कक्षा से अदालतों का व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए प्रायोगिक शिक्षण लागू किया जाए ताकि नागरिको को मालूम हो कि देश को क़ानून चलाते है, वरना देश के 95% नागरिक इसी भ्रम में जीते रहेंगे कि देश को मनमोहन-मोदी-सोनिया-केजरीवाल जैसे नेता चलाते है ।
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जूरी प्रथा लागू होने से आम नागरिक क़ानून, प्रशासन, न्याय आदि के ढाँचे से परिचित हो जायेंगे, इनमें रूचि लेने लगेंगे, जिससे सरकारों से उनका जुड़ाव बढेगा ।
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ग्रामीण : सोच लो मौसी !! अगर वीरू को कुछ हो गया तो कोर्ट कचहरी के चक्कर हो जायेंगे ।
मौसी : पर बेटा, मैं तो कभी कचहरी गयी ही नहीं.. । ठीक है, मैं बसंती की शादी वीरू से करने को तैयार हूँ । संदर्भ, शोले - 1975
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क्यों आम नागरिक कोर्ट कचहरी में जाने से घबराता है ?

क्योंकि वह कभी कोर्ट गया ही नहीं। अत: उसके लिए जज, वकील, पेशकार, तारीख पेशी, गवाही आदि अबाबीलें है, जिनसे वह उलझना नहीं चाहता ।
किसी भी राजनेतिक या राष्ट्रीय मामले में वह वहीँ तक रुचि लेता है, जब तक कि मामला अदालत में न चला जाए । ज्योहीं मामला कोर्ट में जाता है, उसका एक्टीविस्म समाप्त हो जाता है, तथा एक शाश्वत स्वर सब तरफ छा जाता है, कि मामला कोर्ट में है, मामला कोर्ट में है । यह संकेत है कि अब आपको इस विषय पर सोचने और बोलने का न अधिकार है न ही समझ । अदालती सुरंगों में जाकर मामले वर्षो तक गुम बने रहते है, तथा अचानक सालो बाद जनता के सामने फैसला आता है ।
नतीजा यह होता है कि, वह यह मानकर चलता है कि जज वगेरह बेहद समझदार लोग है, अत: उन्होंने जो भी फैसला किया होगा ठीक ही किया होगा ।
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यह कुपोषण जानलेवा है ।
देश के नागरिको की दिमागी सोच और सेहत सुधारने के लिए जूरी सिस्टम, राईट टू रिकाल दवा की सख्त जरुरत है ।
अलबत्ता प्रजा को पोषण देने वाली यह दवा राजनेताओं के लिए जहर के घूँट से कम नहीं है ।
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राईट टू रिकाल ग्रुप @