Pawan Jury BhilwaraRj

हम ठीक ही करते है, जब हम दुरात्मा गांधी, जवाहर लाल ग़ाज़ी और सरदार पटेल की निंदा करते है किन्तु हमें महात्मा बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों की दुर्दशा के लिए किसे कोसना चाहिए ?

मैं कहना यह चाहता हूँ कि भारत के 95% कार्यकर्ताओं ने कभी भी उन क्रान्तिकारियो की सुध नहीं ली जिन्हे आजादी के बाद अपना जीवन नारकीय अवस्था में बिताना पड़ा ।
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जैसा कि घटनाएं इशारा करती है, राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस ने अपने अंतिम दिन रूस की जेल में बिताये, तथा पूरी संभावना है कि उन्हें कारागार में एक त्रासद मृत्यु का शिकार होना पड़ा होगा । इस तथ्य से जवाहर लाल, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दुरात्मा गांधी तथा तब के शीर्ष स्तर के नेता अनभिग्य नही थे, किन्तु अपने राजनेतिक लाभ और निहित स्वार्थो के लिए ये सभी खामोश बने रहे । इसलिए यदि हम इन्हें दोषी मानते है तो इसमें कुछ भी गलत नही है ।
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लेकिन हम उन स्वत्रंता सेनानियों की दुर्दशा के लिए किन्हें जिम्मेदार ठहराएं, जिन्हें आजादी के बाद अपना जीवन बेरोजगारी के कारण भुखमरी में गुजारना पड़ा, क्योंकि जेल में भोगी गयी कठोर शारीरिक और मानसिक यातनाओ ने उन्हें अपाहिज बना दिया था ?
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कृपया महात्मा बटुकेश्वर दत्त पर गूगल करे ।
और सिर्फ दत्त ही नही, ऐसे हजारो क्रांतिकारी है, जिनके साथ हमने हद दर्जे की उपेक्षा की ।
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कई हज़ार आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिक अपंगता और भुखमरी की हालत में जीवन जीने को मजबूर थे ।
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ये देवी इंदिरा गांधी थी जिन्होंने 1972 में आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिको को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया और स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना की शुरुआत की ।
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दुसरे शब्दों में देश के सभी कार्यकर्ताओं ने लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, उनकी विधवाओं और उनके परिवार की दुर्दशा की अवहेलना की ।
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जहां तक मेरा विचार है, मैं इस विडंबना के लिए व्यक्तिपूजा और अंधभक्ति को कारण मानता हूँ ।

भारत के कार्यकर्ताओं में किसी व्यक्ति का आँख मूंदकर अनुसरण करने की जबरदस्त प्रवृति है । इस कारण अधिकतर कार्यकर्ता उन नेताओं के प्रचार तथा चाटुकारिता पर अपने अधिकाँश समय तथा श्रम को खर्च कर देते है, जिन पर वे निर्भर करते है । नतीजतन लाखों कार्यकर्ता अपनी ऊर्जा का अधिकाँश अनुपयोगी गतिविधियों में खपा दे रहे है, और देश की गंभीर समस्याओं के समाधान पर ध्यान नहीं दे पा रहे ।
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कुल मिलाकर यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सभी स्वतंत्रता सेनानियों को पूरी तरह अनदेखा किया गया। साथ ही हमें कम से कम देवी इंदिरा अम्मा का इस फैसले के लिए शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना बनाई और आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को औपचारिक मान्यता दी।
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यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनसे कैसे पेश आते है, जिन्होंने देश के लिए वहां खून बहाया जहाँ पसीने की जरुरत थी । यदि हम लगातार व्यक्तिपूजा में लिप्त रहे तो हालात इसी तरह बदतर से बदतरीन होते चले जायेंगे ।

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