Pawan Jury BhilwaraRj

टी सी पी जैसे क़ानून के अभाव में भारतीय लोकतंत्र रास्ते में पड़ी कुतिया है, जिसे कोई भी नेता लात मार कर निकल जाता है ।
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नितीश ने लोकसभा चुनाव में हार की कालिख धोने के लिए कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर जिस रिमोट से सरकार चलाने की कोशिश की, वह रिमोट बगावत कर चुका है ।
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1. मांझी अब 12 सांसदों के बूते विधानसभा में विश्वाश मत हासिल करने की जुगत लगा रहे है, तथा उनका मानना है कि बिहार की जनता उनके साथ है, क्योंकि बिहार की जनता उनके अल्पकालिक शासन से खुश है ।

2. नितीश को 130 विधायको ने विधायक दल का नेता चुन लिया है, तथा नितीश का कहना है कि बिहार की जनता उनके साथ है अत: उन्हें ही मुख्यमंत्री बनना चाहिए ।

3. बीजेपी का कहना है कि बिहार में बेसिकली मोदी लहर चल रही है, और जनता हमारे साथ है, अत: सदन में बीजेपी मौके की नजाकत देख कर मांझी के पक्ष में मतदान कर सकती है । मतलब बीजेपी जो भी करेगी, बिहार की जनता उनके साथ भी है ।

4. लालू यादव का कहना है कि जनता उनके तथा नितीश के गठबंधन के साथ है ।
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मामला इतना पेचीदा नहीं होता यदि मांझी भी रबड़ी हो जाते, किन्तु नितीश ने ऊँची छलांग लगाने के चक्कर में लोकतंत्र के चीथड़े कर दिए । ये अपने आप में विशिष्ट उदाहरण है कि, सत्ता दल के विधायक विपक्ष हो गए है, और विपक्ष पल्टी मारकर सरकार बचा रहा है ।
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ऐसे लोकतांत्रिक चमत्कारों की फसल यूपी बिहार में पनपती आई है । पाठको को स्मरण हो तो लगभग डेढ़ दशक पहले मायावती और कल्याण सिंह ने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था, तथा चुनाव के बाद इस आधार पर गठबंधन कर लिया था कि 6 माह तक मायावती सीएम रहेगी, तथा 6 महीने कल्याण सिंह । जैसा कि होना था, 6 महीने तक सीएम रहकर माया दीदी ने कल्याण को समर्थन देने से
इनकार कर दिया ।
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ये सामान्य रूप से देखा गया है कि सभी नेता हर समय जनता के साथ का दावा करके मनमर्जी से फैसले करके उन फैसलों का बिल जनता के नाम पर फाड़ते रहते है तथा टी सी पी जैसी हर उस प्रक्रिया का विरोध करते है, जिसकी सहायता से जनता की अधिकृत, स्पष्ट, पारदर्शी तथा सम्मिलित आवाज शासको तक पहुँच पाए ।
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समाधान : सिर्फ तीन लाइन का यह क़ानून जनता की आवाज को शासको के सम्मुख रखने का अवसर प्रदान करेगा, जिससे सच्चे लोकतंत्र की स्थापना होगी ।

पारदर्शी प्रस्ताव प्रणाली [टी सी पी] के क़ानून ड्राफ्ट का संक्षिप्त ब्यौरा जिसकी हम गेजेट में छापने की मांग करते है ।

धारा : 1 'राष्ट्रपति कलेक्टर को ये आदेश दे कि यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में जाकर कोई भी शपथपत्र प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डालने का अनुरोध करता है तो कलेक्टर प्रति पृष्ठ 20 रूपये की दर से शुल्क ले कर के उस प्रस्ताव को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा' ।

धारा: 2 'राष्ट्रपति कलेक्टर को ये आदेश दे कि यदि कोई मतदाता पटवारी की कचहरी में जाकर किसी शपथपत्र पर हां या नहीं दर्ज करवाता है तो पटवारी मतदाता की हाँ/नहीं दर्ज कर के उसे प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा और मतदाता से 3 रुपये ले कर छपी हुयी रसीद देगा'

धारा 3:"यदि किसी शपथपत्र पर कुल मतदाताओं के 51% मतदाता हाँ दर्ज करवा देते है तो प्रधानमन्त्री उस पर कार्यवाही कर सकता है या उसे ऐसा करने की ज़रुरत नही है"

बस ये इतना ही है । जिसकी हम मांग करते है । आसान शब्दों में कहे तो 'यदि कोई मतदाता अपना कोई प्रस्ताव/सुझाव/शिकायत प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डालना चाहे तो उसे विधिवत शुल्क लेकर ऐसा करने दिया जाएगा'
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इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करने से नागरिको को अपनी बात/सुझाव/शिकायत आदि रखने का मंच मिल जाएगा, तथा नेताओं को यह बताने की तकलीफ नही उठानी पड़ेगी कि जनता किसके साथ है ।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है, तो अपने सांसद को SMS द्वारा आदेश भेजे कि टी सी पी के कानूनी ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित किया जाए ।
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sms का नमूना कमेन्ट बॉक्स में देखें ।
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बहरहाल, बिहार विधानसभा में कल डॉक्टर्स और एम्बुलेंस के माकूल इंतजामात की आवश्यकता है। मांझी का शक्ति परिक्षण शायद कल्याण सिंह के अविश्वास प्रस्ताव से भी ज्यादा हंगामाखेज हो ।

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प्रजा अधीन राजा @ pk