Pawan Jury BhilwaraRj
लोकपाल के बहाने
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1992 से भारत ने उदारीकरण की नीति अपनाई और देश में MNCs ने बड़े पैमाने पर अपना कारोबार भारत में फैलाना प्रारंभ किया । इन कम्पनियों को भारत में व्यापार हेतु वाञ्छित अनुज्ञा और अनुमतियां प्राप्त करने के लिए राज्य और केन्द्रीय स्तर पर हजारो नौकर शाहों और नेताओं को करोड़ो रूपये की सालाना घूस देनी पड़ रही थी ।
निदान MNCs को दर्जन भर लोगो की एक ऐसी स्वायत संस्था की आवश्यकता महसूस हुई जिसके माध्यम से सभी मंत्रियों, विधायको, सांसदों, नौकरशाहो यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री को भी नियंत्रित किया जा सके ।
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^ वर्ष 2007-08 में MNCs ने भारत को एन्टी करप्शन कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया, जिसके अनुसार भारत ने लोकपाल क़ानून बनाने का वचन दिया ( कृपया गूगल करें )
^ समझौते के अनुसार भारत लोकपाल की अध्यक्षता में 10-12 व्यक्तियों की ऐसी स्वायतशाषी संस्था का गठन करेगा जिसे मंत्रियो, नौकरशाहो आदि के खिलाफ जांच करने का अधिकार होगा ।
^ केजरीवाल, योगेन्द्र यादव आदि तथा अन्य कार्यकर्ताओं के NGOs को MNCs ने फोर्ड फाउन्डेशन और अन्य अप्रवासी भारतीय धनिको के माध्यम से वित्तीय मदद देना प्रारंभ किया, ताकि 'इच्छित' लोकपाल के ड्राफ्ट के लिए जन आन्दोलन का भ्रम खड़ा किया जा सके ।
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साल दो साल अपने स्तर पर जूझने के बाद, MNCs के निर्देश पर केजरीवाल एंड कम्पनी अन्ना के पास पहुंची तथा MNCs के निर्देशानुसार ख्याति लोलुप अन्ना, केजरीवाल के साथ मिलकर लोकपाल पर माहौल खड़ा करने के लिए तैयार हो गए ।
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MNCs ने विदेशी अनुदानो से पल रहे विभिन्न सामाजिक संघठन और उनके कर्ता धर्ता जैसे मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण आदि कार्यकर्ताओं को लोकपाल का समर्थन करने के निर्देश दिए।
मनमोहन सरकार अब तक अपनी साख गँवा चुकी थी और जनता गुस्से में उबल रही थी ।
पेड मिडिया के सहयोग से देश को हिला कर रख देने वाले एक आला दर्जे के नाटक की तैयारी की जा रही थी ।
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ठीक इसी समय बाबा रामदेव काला धन, भ्रष्टाचार एवं व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे थे ।
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बाबा रामदेव को एयर पोर्ट पर अगवानी के दौरान अनशन केंसिल करने में ही भलाई है, के सम्बन्ध में केन्द्रीय मंत्रियो द्वारा समझाया गया, लेकिन रामदेव जी तब तक नही माने जब तक कि रामलीला मैदान में रात 2 बजे उनके कार्यकताओं पर लाठियां बरसा कर, तथा स्वयं उन्हें बलात रूप से रातों रात हवाई मार्ग से हरिद्वार नही छोड़ दिया गया ।
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^ पटकथा को रोमांचक बनाने के लिए अन्ना को गिरफ्तार किया गया, जेल से भी अन्ना को कवर करने के लिए टीवी केमरो को अनुमति दी गयी ।
^ पेड मिडिया के 24×7 प्रसारण से नॉन स्टॉप ड्रामा 14 दिवस तक चला ।
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असल में मामला जनलोकपाल के ड्राफ्ट को लेकर अटक गया था कोई भी पार्टी नही चाहती थी कि, लोकपाल को इतनी शक्ति दी जाए कि वह मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को उठा कर जेल में डाल दे, जबकि MNCs पीएम, सीएम, मंत्री तथा CBI को लोकपाल के अधीन करने को लेकर अड़ी हुयी थी,
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ताकि लोकपाल के माध्यम से देश के पूरे सिस्टम को नियंत्रित किया जा सके ।
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कई कार्यकर्ताओं के मन में यह संदेह घुमड़ रहा था कि लोकपाल को किस के अधीन किया जाए, क्योंकि यदि लोकपाल भ्रष्ट हो जाता है, तो परिणाम स्वरूप पूरी व्यवस्था ही लोकपाल के नियंत्रण में आ जायेगी ।
ऐसे में राईट टू रिकॉल के कार्यकर्ताओं ने IAC ( india against corruption ) को सुझाया कि लोकपाल की नियुक्ति और निलम्बन की प्रक्रिया करोड़ो नागरिको के मतदान द्वारा तय की जानी चाहिए ।
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चूँकि MNCs द्वारा पेड मिडिया के माध्यम से हजारो करोड़ रूपये इसलिए खर्च नही किये जा रहे थे कि, लोकपाल को प्रजा के अधीन किया जाए, अत: IAC ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, किन्तु कार्यकर्ताओं को आन्दोलन से चिपकाए रखने के लिए आश्वासन दिया कि वे लोकपाल को प्रजा अधीन करने के पक्ष में है ।
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^ IAC ने ऐसा भ्रम खड़ा किया कि वे लोकपाल को प्रजा अधीन करना चाहते है ।
^ जब उनसे लोकपाल का ड्राफ्ट माँगा गया तो महीनो तक टालते रहे, और प्रजा अधीन लोकपाल के पक्ष में मौखिक बयान देते रहे ।
^ राईट टू रिकॉल ग्रुप के सीनियर कार्यकर्ता राहुल चिमन भाई मेहता द्वारा लोकपाल को प्रजा अधीन किये जाने का कानूनी ड्राफ्ट लिख कर IAC के कार्यकर्ताओं को दिया गया ।
^ केजरीवाल ने लोकपाल को प्रजा अधीन किये जाने वाले कानूनी ड्राफ्ट को लोकपाल में शामिल नही किया ।
^ केजरीवाल ने RTR ग्रुप के कार्यकर्ताओं से कहा कि मुझे पानी की तरह ज़हर पीना मंज़ूर है, लेकिन जनता का लोकपाल मंज़ूर नही है ।
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इसी समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर उभर रहे थे ।
MNCs और मिशनरीज़ द्वारा नियंत्रित UPA सरकार के दस वर्षीय कुशासन से जनता में भारी असंतोष था, अत: कोंग्रेस की सत्ता वापसी की कोई संभावना नही थी ।
जनता के पास विकल्प के तौर पर सिर्फ बीजेपी थी । ऐसे में आरएसएस और विहिप के सहयोग से उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद की पूर्ण बहुमत से उभरने की संभावना थी, ऐसा होने से MNCs और मिशनरीज़ के हाथ से भारत का नियंत्रण निकल सकता था । MNCs और मिशनरीज़ के लिए यह आवश्यक था कि 2014 में गठित होने वाली सरकार का नियंत्रण उनके हाथ में रहे।
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इसके लिए विकल्प के तौर पर एक नयी नवेली पार्टी की ज़रूरत थी जिसे पेड मिडिया के धुवाँधार प्रचार द्वारा मध्यवर्ग के मतदाताओं में उभार कर बीजेपी के वोट काटने की धमकी दी जा सके ।
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^ अन्ना को सुरक्षित गलियारा देकर बाहर का रास्ता दिखाया गया, ताकि वक़्त ज़रूरत फिर से इस्तेमाल किया जा सके ।
^ केजरीवाल ने MNCs के निर्देशानुसार आम पार्टी खड़ी की।
^ दिल्ली चुनावों में पेड मिडिया द्वारा आम पार्टी को भारी कवरेज दिया गया, जिस से राष्ट्रीय मंच पर आम पार्टी एक विकल्प के तौर पर उभर आयी ।
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पेड मिडिया के प्रचार से दिल्ली में केजरीवाल ने सरकार बनायी और अगले 2 माह तक 24×7 दिल्ली की राज्य सरकार को कवरेज दिया गया ।
^ मोदी ने मुंबई की रेली में पहली बार केजरीवाल को दी जा रहे भारी मिडिया कवरेज पर एतराज़ उठाया ।
^ MNCs के निर्देश पर केजरीवाल ने सीएम पद से इस्तीफा देकर आम चुनाव में 450 सीट पर उम्मीदवार उतारे, ताकि पेड मिडिया के प्रचार से बीजेपी के ज्यादा से ज्यादा वोट काटे जा सके ।
^ मोदी ने MNCs के सामने सरेंडर किया ।
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मोदी ने अपना प्रचार अभियान टोपी न पहनने, कुत्ते के पिल्लो पर गाड़ी चढाने और हिन्दू राष्ट्रवादी होने के बयानों से शुरू किया ,ताकि वोटो के ध्रुवीकरण के लिए कट्टर हिन्दू नेता की छवि को उभारा जा सके ।
MNCs से समझौते के अनुसार
^ मोदी ने विकास को चुनावी मुद्दा बनाया ताकि सत्ता में आने के बाद विकास के लिए FDI की अनुमति देने में कोई बाधा न हो ।
^ मोदी ने धारा 370, समान नागरिक सहिंता और राम-कृष्ण-काशी विश्वनाथ देवालय जैसे मुद्दों को दरकिनार किया ।
^ MNCs ने मोदी को मिडिया दिया, जिसने मोदी की रेलियों का प्रसारण कर के पूरे देश में मोदी के पक्ष में लहर तैयार की ।
^ मतदान के दौरान मोदी के दर्जन भर साक्षात्कारो 24×7 प्रसारण किया गया ।
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सत्ता में आने के साथ ही पेड मिडिया ने मोदी का महिमा मंडन शुरू किया जो कि तब तक जारी रहने वाला है जब तक कि मोदी MNCs के खींचे गए दायरे के भीतर कार्य करते रहेंगे ।
ज्ञातव्य है कि मोदी को जो भारी बहुमत मिला उसका कारण हिंदुत्व का अंडर करंट था न की FDI जनित विकास का वादा । इसी तरह हाल ही में हुए उपचुनावों में हुयी हार का ठीकरा भी पेड मिडिया द्वारा बीजेपी के विकास के मुद्दे से भटकने के सिर फोड़ा गया ।
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आज मोदी MNCs की उन्हीं नीतियों को और तेजी से आगे बढ़ा रहे है जिन पर UPA सरकार काम कर रही थी ।
^ रक्षा, बीमा और रेल में FDI की सीमा बढ़ाई गयी है, तथा चीन को सेज आवंटित किये गए है ।
^ तिरुपति से 1.8 टन सोना हड़प लिया गया है, तथा अन्य मंदिर कतार में है ।
^ सेन्सस 2011 के धर्म और भाषा के आँकड़े प्रकाशित नहीं किये गए है ।
^ मेड इन इंडिया को मेक इन इंडिया और Forigen Direct Investment को First Develop India में बदल दिया गया है ।
^ 108 दवाइयों को मूल्य नियंत्रक सूची से निकाल दिया गया है, GM फसलो को अनुमति दी गयी है ।
^ कोल इण्डिया, ONGC तथा NHPC की हिस्सेदारी बेचीं जा रही है ।
^ रक्षा मंत्री का कार्य स्टेपनी के हवाले रखा गया है ।
^ मोरिशस रूट और MNCs को दी जा रही कर राहतें जारी है ।
^ बांग्लादेशी घुस्पेठियो को खदेड़ने के क़ानून को ड्राप कर दिया गया है ।
^ कसाईखानो को दिए जा रहे अनुदान जारी है, कटवाई की मशीनों पर आयात शुल्क घटाया गया, और गौ हत्या निषेध के लिए कोई प्रभावी क़ानून नही बनाया गया है ।
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मोदी धड़ाधड़ तकनिकी क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों को आने की अनुमति दे रहे है जबकि स्वदेशी के नाम पर जनता को सूत कातने और खादी पहनने को प्रेरित किया जा रहा है । इस पूरे नव FDI वाद, नव राष्ट्रवाद और नव हिन्दू वाद पर RSS, VHP, SWJM और BST चुप्पी साधे बैठे है, वहीँ, करोडो नागरिक सुबह शाम पेड न्यूज़ चेनल्स के सामने बैठकर नियमित तौर पर मोदी भक्ति की अफीम पी रहे है ।
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अन्य कतिपय कारणों के अलावा यह लोकपाल ही था जिसकी आड़ में पेड मिडिया ने देश के करोड़ो नागरिको के 3 वर्ष पूरी तरह बर्बाद कर दिए ताकि राष्ट्रीय मोर्चे पर एक राजनेतिक पार्टी को स्थापित कर सौदेबाजी की जा सके । आज लोकपाल का कानूनी ड्राफ्ट किस कोने में पड़ा धूल खा रहा है, किसी को पता नही है ।
बहरहाल MNCs को मोदी के रूप में नये मनमोहन मिल गए है ।
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असल में 1992 से ही भारत की सरकारे MNCs चला रही है तथा वक़्त बीतने के साथ MNCs का नियंत्रण बढ़ता ही जा रहा है ।
MNCs का एजेंडा :
^ FDI के माध्यम से बड़े पैमाने पर देश में पूँजी निवेश कर के मोनोपोली स्थापित करना ताकि देश की आर्थिक व्यवस्था को नियंत्रित किया जा सके ।
^ पेड मिडिया के माध्यम से जनता के मानस को नियंत्रित करना ताकि राजनेतिक पार्टीयो को काबू किया जा सके ।
^ प्रलोभन तथा घूस देकर MNCs को फायदा तथा घरेलू इकाइयों को नुकसान पहुंचाने वाले क़ानून बनवाना ।
^ देश की अदालतों और क़ानून व्यवस्था को बदहाल बनाए रखना ताकि भ्रष्ट व्यवस्था को प्रोत्साहन मिले ।
^ तकनीक को पंगु बनाए रखने के लिए विज्ञान तथा गणित की शिक्षा का आधार कमजोर करना ।
^ सेना को कमज़ोर बनाए रखने के क़ानून पास करवाना ।
^ देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति और खनिज संसाधनों को हडपना, तथा बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करना ।
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समाधान : कार्यकर्ताओं को नेता भक्ति की जगह ऐसे क़ानूनो का प्रचार करना चाहिए जिन से देश की सत्ता भारत की प्रजा के नियंत्रण में रहे ।
1. राईट टू रिकॉल पीएम : वर्तमान व्यवस्था में एक बार चुन लिए जाने के बाद पीएम पर जनता का 5 वर्ष तक कोई नियंत्रण नही रहता, राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून पास होने पर यदि पीएम राष्ट्र विरोधी क़ानून पास करता है तो, जनता द्वारा पीएम को कार्यकाल के दौरान करोड़ो नागरिको द्वारा मतदान द्वारा हटाया जा सकेगा ।
(अध्याय -6)
2. जूरी सिस्टम : नागरिको की ज़ूरी द्वारा मुकदमो की सुनवाई होने से भारत की अदालतों में फैसलों के आने की गति 10 गुना तक बढ़ जायेगी, जिस से भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, स्वदेशी इकाइयों को सरंक्षण मिलेगा, रोजगार बढेगा, तकनीकी विकास होगा और हम बड़े पैमाने पर स्वदेशी हथियारों के उत्पादन में सक्षम हो जायेंगे ।
(अध्याय - 21)
3. संपत्ति तथा विरासत कर : संपत्ति तथा विरासत कर लागू होने से जमीनों की कीमतों में भारी कमी आएगी, और इतना राजस्व प्राप्त होगा कि हम अपनी सेना को मजबूत बना सके ।
(अध्याय - 25 )
4. राईट टू रिकॉल डीडी चेयरमेन : दूरदर्शन को प्रजा अधीन बनाने से दूरदर्शन जनता को निष्पक्ष खबरे दिखाने लगेगा, इस से पेड मिडिया की ताकत कम हो जायेगी ।
( अध्याय - 44.33, 44.34 )
5. WOIC : आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण क्षेत्रो में पूर्ण रूप से भारतीयों के स्वामित्व वाली कम्पनियों को बढ़ावा देने से हम MNCs को हमारी अर्थव्यवस्था को अधिगृहित होने से रोक सकेंगे ।
( अध्याय - 41 )
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प्रजा अधीन राजा @ pk