Pawan Jury BhilwaraRj

'रावणवाद.. नमो नमो'
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हिन्दू धर्म के आख्यानों में प्रचलित कथाओं के अनुसार रावण ने तीन शुद्ध संकल्प धारण किये थे, जिन्हें पूरा करने की उसकी उत्कट 'इच्छा' थी :
1. स्वर्ण में सुगंध अध्यारोपित करना ।
2. अग्नि को धूम्रविहीन करना ।
3. मृत्युलोक से बैकुंठ तक सीढ़ियो का निर्माण करना ।
लेकिन आज रावण को उसके द्वारा धारित संकल्पों के लिए नहीं बल्कि सीता हरण के लिए जाना जाता है ।
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बीजेपी, आरएसएस और इन संगठनो के मानस पुत्र नरेन्द्र मोदी भी दशको से कुछ लोकप्रिय संकल्पों को वैदिक मंत्रो की तरह दोहरा रहे है ।
^ अनुच्छेद 370 की समाप्ति
^ राम, कृष्ण जन्म भूमि तथा काशी विश्वनाथ देवालय का निर्माण
^ समान नागरिक संहिता का प्रवर्तन ।
^ राष्ट्रीय पहचान प्रणाली क़ानून।
^ जनसँख्या नियंत्रक क़ानून ।
^ गौ हत्या निषेध अधिनियम ।
^ बांग्लादेशी घुसपेठीयों को खदेड़ने का क़ानून ।
किन्तु 125 दिन की पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया को आज देश दुनिया में FDI के लिए जाना जाता है ।
गौरतलब है कि रावण को अमरत्व का भ्रम पालने की सुविधा थी, लेकिन नमो किस मुगालते में व्यर्थ में समय गवां रहे है, समझ से बाहर है ।
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बात इतनी भर नही है, चुनाव प्रचार के दौरान बेंगलोर में एक रेली को संबोधित करते हुए नमो ने बेहद आत्मविश्वास से हुंकार भरी थी कि 'इस देश में कुछ काम है, जो पिछले 60 वर्षो से किसी ने नहीं किये है, उन कार्यो को करना मेरे ही भाग्य में लिखा है'।
दशको के कुशासन से अघाए नागरिको में इस बयान ने उम्मीदों का विस्तार अपरिमित कर दिया, ऐसे बयान देकर नमो ने बेतहाशा उम्मीदों के बीज बोये, और जमकर वोटो की फसल काटी ।
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इस प्रकार के बयानो में इस प्रकार के निहितार्थ छुपे हुए थे कि नमो उस व्यवस्था में ही आमूल परिवर्तन ले आयेंगे, जिसके चलते मनमोहन जैसे अप नेता देश के निति नियंता बने रह जाते है ।
इस पर कोई बहस नहीं कि साल 2011 से ही UPA सरकार की कलई उतरने लगी थी, और 2012 आते आते मनमोहन सरकार जनता का विश्वास खो चुकी थी ।
लेकिन भारतीय गणतंत्र में जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार न होने से, इतनी निकम्मी सरकार से छुटकारा पाने के लिए करोड़ो नागरिको को 3 वर्ष इन्तिजार करना पड़ा ।
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नमो 2002 से पूर्व अमेरिका की कई यात्राएं कर चुके है, अत: उन्हें यह जानकारी होना स्वभाविक है कि, अमेरिका के नागरिको को अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार प्राप्त है। तो हाल ही में अमेरिका की यात्रा से नमो राईट टू रिकॉल कानूनों की जगह FDI लेकर आये है, जो कि पूर्व सरकारे भी इफरात में लाती रही है ।
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1870 में महर्षि दयानंद सरस्वती की प्रेरणा के बाद राईट टू रीकॉल कानूनों की मांग सर्वप्रथम 1925 में महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने की थी, पश्चात जेपी और महामना राजिव भाई दिक्षित भी लगातार यह मांग करते रहे है ।
क्या ही अच्छा होता यदि नमो राईट टू रीकॉल प्रधानमन्त्री का क़ानून पास करते, ताकि भविष्य में यदि फिरकोई घटिया नेता इस पद को हथिया लेता है, तो उसके 5 वर्षीय शासन से अभिशप्त होने की जगह नागरिक मतदान द्वारा कार्यकाल के दौरान ही अमुक नेता को नौकरी से निकाल सके ।
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यदि जनता को चुनने का अधिकार है, तो हटाने का अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए ?
राईट टू रिकॉल कानूनों के अभाव में लोकतंत्र एक जंगली घोड़े की तरह है, जिसे रोकने का मतदाता रूपी सवार के पास कोई उपकरण नही, लेकिन राईट टू रिकॉल क़ानून लोकतंत्र के घोड़े पर ज़ीन कस कर, मुहं में लगाम डाल देते है ।
राईट टू रिकॉल क़ानून लोकतंत्र के सोने में सुगंध की तरह है, यदि नमो वाकयी जनता को अधिकार देने में विश्वास करते है, तो उन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों को बिना वक़्त गंवाए पास कर देना चाहिए था, क्योंकि रहे काम रावण के कहे जाते है ।
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जब मौसी किसी भी हाल बसंती की शादी धुत्त होकर टंकी पर चढ़े वीरू से करने पर राज़ी नहीं होती है, तब पास खड़ा ग्रामीण मौसी को आगाह करता है कि, 'मान जाओ मौसी, वरना कोर्ट कचहरी के 'चक्कर' हो जायेंगे' । धमकी काम कर जाती है, और मौसी मान जाती है ।
1975 का यह सिने संवाद भारतीय न्याय व्यवस्था से भली भाँती परिचय करवा देता है, परन्तु तब से हालात और भी बदतर ही हुए है ।
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घोंघे की सी सुस्त चाल से रेंगने वाली हमारी अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लंबित है, और सतह के नीचे भाई भतीजा वाद और भ्रष्टाचार का परनाला बह रहा है ।
1996-97 में लालू और जयललिता पर भ्रष्टाचार के मुकदमे कायम हुए थे, आज 2014 तक सुनवाई और पेशियों का उपक्रम जारी है ,जबकि दोनों नगीने दो राज्यों के शासन की धुरी बने हुए है । और ऐसे 2 नही अनगिनत मामले है, जिनमे यह मालूम नहीं कि फैसले की मूली किस खेत में पायी जाती है ।
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जापान और अमेरिका की यात्राओं के चलते नमो को सहज रूप से यह जानकारी होगी कि जापान में न्याय तंत्र को आंशिक रूप से प्रजा अधीन किया गया है, जबकि अमेरिका में सुनवाई का अधिकार नागरिको की ज्यूरी को है ।
ज्यूरी सिस्टम से मुकदमो के निपटान में तेजी आती है, और फैसला 15-20 दिनों के भीतर आ जाता है ।ज्यूरी सिस्टम के लागू होने तथा न्याय प्रणाली के प्रजा अधीन होने से भ्रष्टाचार की सम्भावनाए लगभग ख़त्म हो जाती है और न्याय प्रक्रिया चुस्त हो जाती है ।
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क्या यह महत्त्वपूर्ण नही है, कि जिस व्यवस्था में 3×8 = 24 करोड़ नागरिक फंसे हुए हो, उस व्यवस्था में सुधार किया जाए ?
67 वर्षो से जनता ये संताप झेल रही है, नमो इसे और कितने वर्षो तक लटकाए रखना चाहते है । यदि शपथ लेने के साथ ही जूरी सिस्टम का क़ानून लागू कर दिया जाता, तो शायद अब तक लाखो परिवार इस दुश्चक्र से मुक्ति पा चुके होते । लेकिन नमो ने यह फैसला किया है कि, इस समस्या का समाधान 'बाद' में किया जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे रावण ने अग्नि को धूम्र विहीन करने का अनुष्ठान 'कल' पर छोड़ दिया था ।
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1985 से ही भारत की सेना लगातार कमजोर हो रही है, देवी इंदिरा के बाद किसी भी प्रधानमन्त्री ने भारत की सेना को मज़बूत बनाने के क़ानून पास नही किये । UPA के 10 वर्षीय शासन काल ने रही सही कसर पूरी कर दी, हम आज हथियारों के सबसे बड़े आयातक है, खुद के बूते मंगल यान भेज दे रहे है, लेकिन स्वदेशी सामरिक अस्त्रों के निर्माण में हम फिसड्डी है ।
जाहिर है नमो को यह जानकारी है कि स्वदेशी आधुनिक हथियारों से ही सेना मजबूत हो सकती है, और एक मजबूत सेना ही संप्रभु राष्ट्र का निर्माण करती है ।
लेकिन उन्हें नही लगता कि सेना को मज़बूत बनाने के लिए आवश्यक कानूनों को पास करने की तत्काल आवश्यकता है ।
पहले FDI जनित विकास का आधार तैयार करना है,
मंदिरों के स्वर्ण कोषो को आधिपत्य में लेना है, सड़को और नालियों को स्वच्छ करना है.. बैकुंठ तक सीढ़ीयां ठहर के भी लगाई जा सकती है ।
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असल में मनमोहन सरकार का 10 वर्षो के दौरान एक निष्ठ एजेंडा FDI रहा, और नमो उसी एजेंडे को और तेजी से अमली जामा पहना रहे है । यह अपने आप में अजब मिसाल है कि दवा कि जगह डॉक्टर बदल कर चिकित्सा की जा रही है ।
जिस संखियाँ* को जनता मनमोहन के हाथों छूने को राजी नही थी, उसी संखियाँ को नमो के हाथ से मल्टी विटामिन का नुस्खा समझ कर गपागप गटक रही है ।
*सखियाँ एक प्रकार का धीमा जहर होता है ।
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रावण ब्राह्मण कुल में जन्मा प्रकांड ज्ञानी, तथा वास्तु, ज्योतिष, मन्त्र विज्ञान के कई ग्रंथो का रचयिता था । यदि उसने सीता हरण से पूर्व अपने शुद्ध संकल्पों को पूर्ण किया होता, तो मानव जाती शायद उसकी ऋणी होती ।
नरेन्द्र मोदी ने अपने कीमती 125 दिन सिर्फ और सिर्फ FDI में गवाएं है, जबकि इस दौरान उन कानूनों को भी पास करने के लिए वक़्त निकाला जा सकता था जिनका इंतज़ार करोडो नागरिक दशको से कर रहें है ।
बेहतर है, कि अगले रावण दहन से पूर्व नमो इस रावण वाद से मुक्ति पा ले ।
अमर कोई भी नहीं है ।

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पुनश्च : स्मरण रहे कि 2011 के सेन्सस के धर्म और भाषा के आँकड़े, जो कि शूर्पनखा गांधी ने दबा लिए थे, मोदी साहब ने भी दबा कर रख रखे है । उनका अचार न डाल दिया गया हो, तो प्रकाशित करावें ।

प्रजा अधीन राजा @ pk