Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
कृपया गूगल पर सर्च करें- हेमचन्द्र विक्रमादित्य (Hemachandra Vikramaditya) ---- यह सुनी सुनाई कहानी कि वे "दुर्भाग्यशाली" थे, और अचानक एक तीर के लगने से वे अंधे हो गए, सही नही है। उन्होंने लगभग 35 युद्धों की कमान स्वयं आगे रहकर संभाली, 34 बार वे भाग्यशाली रहे और भाग्य हर बार तो किसी का भी साथ नही दे सकता।
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उन्हें हेमू के नाम से सम्बोधित नही किया जाना चाहिए। यह नाम सम्मानसूचक नही है। उन्हें यह नाम मुगलों ने दिया और आगे चलकर बिके हुए भारतीय इतिहासकारों, जैसे थापर आदि ने इसे प्रचलित किया। उनके लिए हेमचन्द्र विक्रमादित्य, राजा विक्रमादित्य, या सिर्फ हेमचन्द्र नाम का प्रयोग हम कर सकते हैं।
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ऐसी कहानियाँ प्रचलित हैं कि यदि वह तीर हेमचन्द्र की मृत्यु का कारण नही बनता तो भारत में इस्लामिक शासन का अंत अवश्यम्भावी था। अब कृपया निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दीजिये :-
1. हेमचन्द्र ने 35 से भी अधिक युद्धों में सामने से मोर्चा संभाला, इसे हम बहादुरी कह सकते हैं या उनका सौभाग्य कि 34 बार वह सुरक्षित रहे, एक बार भी किसी तीर, भाले, या तोप के किसी गोले का शिकार नही बने, तो यह कैसे संभव था कि भाग्य हमेशा उनके ही पक्ष में रहे।
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2. हेमचन्द्र को हर बार युद्ध में स्वयं आगे रह कर मोर्चा सम्भालना पड़ता था क्योंकि उनके पास सेना में विश्वसनीय पदानुक्रम का अभाव था। या तो वे सैन्य पदानुक्रम बना नही पाये या बनाया नही। अतः उनकी मृत्यु के साथ ही उनकी सेना और उनका साम्राज्य ताश के महल की तरह ढह गए। जबकि मुगलों के साथ ऐसा नही हुआ। जब हुमायूँ दुर्घटनावश मारा गया, मुगलों के पास अकबर के रूप में तुरंत एक नया राजा उपलब्ध था। चूँकि वह नया राजा महज 11 वर्ष का था, अतः उसकी ओर से राजकाज सँभालने के लिए एक काफी विश्वस्त प्रभारी चाहिए था, वह भी उपलब्ध था। इस प्रकार उनके पास कभी भी शीर्ष नेतृत्व की जगह पर अचानक आये शून्य को भरने के लिए अत्यंत सुदृढ़ संरचना मौजूद थी।
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3. हेमचन्द्र तोपों के लिए अफगानों पर अत्यधिक निर्भर था। अतः यदि हेमचन्द्र ने मुगलों को हरा भी दिया होता तो उसके बाद अफगानों के हाथों वह अवश्य ही पराजित होता, चूँकि उस समय हिन्दुओं के पास अच्छे तोपों की बहुत कमी थी। यह कमजोरी अंत तक बनी ही रही। यहाँ तक कि मराठों के पास भी अपनी तोपें नही थी। तोपों के लिए वे शिया तथा आगे चलकर फ्रेंच पर निर्भर रहे।
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जो कुछ मैंने इस विषय पर पढ़ा उसके अनुसार मैंने पाया कि अफगान काफी आसानी से हेमचन्द्र को हरा सकते थे। लेकिन उन्होंने देखा कि वे मुगलों को हरा नही पाएंगे। मुगलों को हराने के लिए उन्हें भारी संख्या में सैनिक चाहिए थे, जो कि उनके पास नही थे। अतः अफगानों ने तय किया कि वे किसी हिन्दू राजा को आगे करेंगे। चूँकि हिन्दू राजा भारी संख्या में हिन्दुओं को अपनी पैदल सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित कर सकते थे। इस प्रकार पैदल सेना में तो हिन्दू थे, किन्तु तोपों और तोपख़ानों का संचालन अफगानों पर निर्भर था। अतः मुगलों को यदि हेमचन्द्र हरा भी देता तो उसके बाद अफगानों के हाथों पराजित होता, क्योंकि अफगानों के पास अधिक उन्नत तोपखाने और तोपें थी।
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इस प्रकार हेमचन्द्र की सफलता का कारण यह था कि तत्कालीन हिन्दुओं ने अन्य हिन्दू राजाओं को छोड़कर हेमचन्द्र का साथ दिया, जिससे हेमचन्द्र की शक्ति तो बढ़ी किन्तु प्रत्येक हिन्दू की ताकत नही बढ़ी। मंदिरों में उत्तराधिकार, राजमुकुट तथा अन्य पदों पर उत्तराधिकार, सूदखोरी आदि अनेक कारणों से हिन्दू कमजोर रहे। इस संरचनात्मक कमजोरी को दूर करने के लिए हेमचन्द्र ने कुछ नही किया या कर नही पाया (सिखों ने सैंकड़ों सालों के बाद यह करके दिखाया)
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अतः आप सब से मेरा आग्रह है कि हेमचन्द्र विक्रमदित्य के विषय में निम्नलिखित प्रश्नो के उत्तर गूगल पर सर्च करें –
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1. अफगानों ने नेता के रूप में हेमचन्द्र को ही क्यों चुना?
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2. हेमचन्द्र अपने नीचे एक ऐसा पदानुक्रम क्यों नही बना पाया जो उसकी अनुपस्थिति में भी कार्य कर सके या उसकी मृत्यु होने पर नया नेता चुन सके?
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3. हुमायूँ की मृत्यु होने पर भी मुग़ल ताश के घर की तरह धराशायी नही हुए। उन्होंने तत्काल 11 वर्षीय राजकुमार अकबर को अपना नया राजा तथा अत्यंत विश्वासपात्र बैरम खान को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। लेकिन हेमचन्द्र की मृत्यु होने पर उनकी सेना और साम्राज्य का पतन हो गया। आखिर क्या कारण था कि हेमचन्द्र की सेना मुगलों की तरह फिर से उठ कर खड़ी नही हो पायी?
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4. हेमचन्द्र को 35 युद्धों में स्वयं आगे रह कर नेतृत्व क्यों सम्भालना पड़ा, जबकि इसमें उसकी जान जाने का खतरा पूरी तरह से था? अकबर ने शायद ही किसी युद्ध में स्वयं अग्रिम पंक्ति में रह कर मोर्चा संभाला होगा, जिससे उसकी सुरक्षित रहने की सम्भावना बढ़ी।
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यह भी पता लगाने की कोशिश करें कि अधिक उन्नत/ अधिक संख्या में तोपें किसके पास थी? मेरे अनुमान के अनुसार मुगलों के पास अफगानों की तुलना में अधिक उन्नत तथा अधिक संख्या में तोपें थी। और अफगानों के पास हिन्दू राजाओं की तुलना में अधिक उन्नत/ अधिक संख्या में तोपें थी। शुरूआती दौर में हेमचन्द्र इसलिए विजय प्राप्त करता गया क्योंकि बड़ी संख्या में हिन्दू उसकी सेना में शामिल हुए, जिससे उसकी सैनिक संख्या बढ़ी। लेकिन वह मुगलों की तरह उन्नत तोपें नही बना पाया। अंततः हथियारों की ताकत तो भीड़ से ज्यादा होती है। एक तरफ कितनी भी बड़ी भीड़ हो, लेकिन दूसरी तरफ उन्नत हथियार तो जीत हथियारों की होगी। यही कारण था कि जीत मुगलों की हुई।