Pawan Jury BhilwaraRj
मार्क जुकेरबर्ग ने निर्देश प्रसारित किया है कि सभी फेसबुक एकाउंट होल्डर्स को शिक्षक दिवस पर नमो का भाषण सुनना अनिवार्य है । वक्तृता के बाद जुकेरबर्ग एकाउंट होल्डर्स से रेंडमली सवाल पूछेंगे, जो कि नमो के भाषण से सम्बंधित होंगे । यदि आप उन सवालों के जवाब सही नही दे पाते है, तो आपका फेसबुक एकाउंट 15 दिवस के लिए ब्लोक कर दिया जाएगा ।
क्योंकि अब डेविड कूम वाट्स एप के मालिक नही रहे है, इसलिए ये शर्त वाट्स एप यूज़र्स पर भी लागू होगी ।
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अन्य पार्टियों की तरह बीजेपी में भी शुरुआत से ही व्यक्ति पूजा की परंपरा रही है । 1990 के दशक से वाजपेयी, 2004 से आडवानी और अब नमो वे व्यक्ति है जिनकी पूजा करने के लिए कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया जाता रहा है ।
नमो ने आदेश जारी किया है कि सभी शालाओं के बच्चो को शिक्षक दिवस पर उनका भाषण सुनना अनिवार्य है, बच्चे भासण ध्यान से सुने इसके लिए वक्तृता में से प्रश्न पूछने का विधान भी किया गया है , निदान बच्चो के अवचेतन पर नायकत्व की छाप डाली जा रही है ।
भारत व्याख्यानों और अवतारों का देश रहा है, पौराणिक काल से ही हमें अवतार उपलब्ध रहे, और हमे बचाने के लिए हमने अवतारों के आविर्भाव की आराधना की । पश्चिमी देश इन अवतारों से महरूम रहे, और उन्होंने अपने इस रिक्त स्थान को भरने के लिए काल्पनिक चरित्र जैसे सुपरमेन, स्पाइडरमेन आदि गढ़े । किन्तु पुनर्जन्म में अविश्वास और अवतारवाद की पौराणिक अवधारणा न होने से तारणहार की संकल्पना उनके अवचेतन में नही उतर सकी ।
नतीजतन उन्होंने वैज्ञानिक सिद्धांतो की पूजा की और व्यक्ति की जगह व्यवस्था को तरजीह दी ।
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जब व्यवस्था दूषित होती है, तो उसे सुधारने के लिए निति नियमों तथा कानूनों में आवश्यक संशोधन करके उसे ठीक कर लिया जाता है । किन्तु व्यक्तिपूजा में इसकी गुंजाइश नही रहती, नायक के गिरते ही पूरी व्यवस्था गिर जाती है , फिर से नए नायक का इन्तिज़ार और फिर से उसके गिरने का खतरा । सारांश रूप में 'या तो नायक हीरो की मौत मरते है, या तब तक जिन्दा रहते है जब तक कि खलनायक नही बन जाते ।
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भारत की राजनेतिक व्यवस्था में ये दोष सदा से ही रहा । अवाम ने कभी उन कानूनों की मांग नही कि जिस से व्यवस्था को सुधारा जा सके, बल्कि ये जिम्मेदारी किसी अवतार के हवाले करने में रुचि दिखाई । परिणाम हमारे सामने है, हम आज भी अपने देश को चलाने के लिए अवतारों और नायको पर निर्भर है । कतिपय राजनेताओं ने जनता की इस कमजोर नब्ज़ को गहराई में जाकर पकड़ा और प्रचार तंत्र की सहायता से हमेशा एक नायक देश पर थोपने की कोशिश की । इस गंभीर तथ्य को हवा में उड़ा दिया कि सभी अवतार क्षणिक होते है जबकि क़ानून व्यवस्थाएं अज़र अमर होती है ।
अस्तु देश को सामरिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए नागरिको को अच्छे कानूनों की मांग करनी चाहिए, ताकि देश की स्थिति में उत्तरोत्तर रूप से स्थाई सुधार लाया जा सके ।
प्रजा अधीन राजा @ pk