Pawan Jury BhilwaraRj

"100 दिन चले अढ़ाई कोस"

पेड मिडिया और मोदिभक्तो द्वारा सरकार के 100 दिन पूरे होने पर 'उपलब्धियां' गिनाई जा रही है, जबकि नमो चाहते तो 100 दिन में आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की नीवं डाली जा सकती थी ।
.
आर्थिक पक्ष - नमो को विरासत में 440 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ मिला, क्योंकि पूर्व सरकारों ने अंधाधुंध FDI को अनुमति दी थी जिस से हमारा व्यापार घाटा बढ़ा और विदेशी मुद्रा का संकट खड़ा हो गया, अब नमो इस संकट को और भी बढ़ा रहे है ।
नमो ने FDI के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया, जिस से भारत में विदेशी निवेश के रूप में भारी डॉलर की आवक हुयी, नतीजतन डॉलर गिरा < रूपया मजबूत हुआ > पेट्रोल के दाम गिरे = बाज़ार उछला, महंगाई दर गिरी, विकास दर बढ़ी और दलाल स्ट्रीट चमकने लगी ।
यह अनुभव सिद्ध है कि FDI का निवेश आने से फौरी तौर पे कीमते गिरती है, लेकिन कालान्तर में अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है ।
.
पिछली सरकारों की आर्थिक निति में सिर्फ तीन शब्द थे - FDI, FDI, FDI.
जबकि नमो की आर्थिक निति में पांच शब्द है , 'और अधिक FDI'
नमो ने रक्षा में विदेशी निवेश को अनुमति दी, जबकि बीमा, रेल और शिक्षा में FDI की सीमा बढ़ाई ।
नतीजा हमे वही मिलने वाला है, जो कि पूर्व सरकारों से मिला है ।हमारे बचे खुचे स्वदेशी उद्योग या तो बंद हो जायेंगे या MNCs द्वारा टेक ओवर कर लिए जायेंगे, हम तकनीक के क्षेत्र में और भी पंगु होंगे, हमारा निर्यात गिरेगा, जिससे विदेशी मुद्रा संकट और भी गहरा जाएगा, MNCs के एकाधिकार से हमारे खनिजो की नीलामी होगी और धर्मान्तरण में तेजी आएगी ।
.
नमो की 'उपलब्धि' यह रही कि उन्होंने पेड मिडिया और सोशल मिडिया के सहयोग से :
1.FDI को साहसिक फैसलों की तरह प्रस्तुत किया और क़र्ज़ को निवेश के गर्व के रूप में प्रचारित किया ।
2. नागरिको को यह भनक नही लगने दी कि वे कोंग्रेस के ही एजेंडे को आगे बढ़ा रहे है ।
3. FDI से होने वाले आर्थिक दुष्परिणामो के बारे में देश को अवगत नही होने दिया ।
4. जिस श्रेणी की 4 फ़ाइलो पर दस्तखत करके मनमोहन गालियाँ खा रहे थे, उसी श्रेणी की 5 फाइलों पर साइन कर के नमो ने मुशायरा लूट लिया है ।
उपलब्धि जो कि नमो हासिल करने से चूक गए :
1. देश को तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए जूरी सिस्टम और सात्य प्रणाली के क़ानून को गेजेट में छापा जा सकता था ।
2. MNCs को दी जा रही कर राहतो को वापिस लिया जा सकता था ।
3. MNCs के बढ़ते एकाधिकार को रोकने के लिए WOIC के ड्राफ्ट को गेजेट में छापा जा सकता था ।
4. काले धन की जननी मोरिशस रूट को ख़त्म किया जा सकता था
.
चूंकि नमो MNCs के FDI एजेंडे को ही आगे बढा रहे है इसलिए कोंग्रेस और पेड मिडिया के उत्पाद केजरीवाल ने मूल विषय से ध्यान हटाने के लिए टमाटर, आलू, प्याज और रेल भाड़े जैसे महत्त्वहीन विषयों पर शोर गुल मचा कर जनता का टाइम पास किया ।
.
सामरिक क्षेत्र - बीते 100 दिनों के दौरान ISIS का उत्कर्ष हुआ, ISIS ने पाकिस्तान में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया और ये खतरा बढ़ गया कि भारत को निकट भविष्य में एक शक्तिशाली ज़िहादी हमले का सामना करना पड़ सकता है ।
चीन ने अरुणाचल प्रदेश को आधिकारिक रूप से चीन के नक़्शे में दिखा कर हमें धमकाया ।
पाकिस्तान से वार्ता बंद कर दी गयी, जबकि सीमा पर गोलीबारी में 100 दिनों में 47 जवान शहीद हुए, जो कि शांतिकाल के लिहाज़ से बड़ा आंकड़ा है ।
तेल में निर्भरता के चलते सऊदी अरब के दबाव में हमें उस इस्राएल के खिलाफ UN में वोट करना पड़ा जिस से हमारा सामरिक गठबंधन है ।
हथियार विहीन सेना वाला देश गरीब की जोरू है । सामरिक परिदृश्य में हमें अपनी सेना को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर ऐसे कानूनों की आवश्यकता थी जिससे हम हथियारों की तकनीक जुटा सके ।
.
नमो की 'उपलब्धि' यह रही कि उन्होंने रक्षा में विदेशी निवेश को अनुमति दी, नतीजे के रूप में हथियारों के निर्माण की हमारी स्वदेशी इकाईयां बंद हो जायेगी और हम उन विदेशी हथियारों पर निर्भर हो जायेंगे जिनमे हार्ड वेयर ट्रोजन इंस्टाल किये जाते है, युद्ध के दौरान इन किल स्विच को निर्मात्री कम्पनी द्वारा यदि सक्रिय कर दिया जाए तो हथियार निष्क्रिय हो जाता है ।
फैसले, जिन्हें लेने में नमो चूक गए :
1. हथियार निर्मात्री कम्पनियों को लाइसेंस मुक्त किये जाने का ड्राफ्ट गेजेट में छाप सकते थे । इस से हथियारो के निर्माण में बड़े पैमाने में वृद्धि होती ।
2. हथियार बंद नागरिक समाज की रचना के लिए, हर नागरिक को बन्दूक रखना अनिवार्य हो, ऐसा क़ानून गेजेट में छापा जाना चाहिए था ।
3. सेना खड़ी करने के लिए वेल्थ टेक्स लागू करने के क़ानून को गेजेट में छापा जा सकता था ।
4. युद्ध के दौरान अप्रत्याशित रूप से सबसे बड़ा खतरा बन सकने वाले 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने का क़ानून गेजेट में छापा जा सकता था ।
.
भारत में सेना और हथियारों के महत्त्व के विषय को फ़ालतू और गैर ज़रूरी माना जाता है, इसलिए इस मुद्दे पर कोई पार्टी न कोई स्टेंड लेती है, न पेड मिडिया इनकी चर्चा करता है, जहां तक नागरिको का प्रश्न है, उन्हें भी मनोरंजन प्रधान मुद्दे जैसे प्याज, टमाटर और रेल भाड़े में ही रुचि है, अत: ये विषय 100 दिनों के दौरान आउट ऑफ़ टच रहे तथा देश भक्ति की लहरे पाकिस्तान से वाकयुद्ध की चट्टानों पर माथा कूटती रही ।
.
आंतरिक सुरक्षा तथा धार्मिक क्षेत्र - गौ भक्तो द्वारा सोशल मिडिया पर चलाये जा रहे गाय बचाओ अभियानों में तेजी आई, आरएसएस प्रमुख भागवत द्वारा हिन्दू राष्ट्र बनाने के बयान दिए गए, नमो द्वारा पाक को 'करारा' जवाब दिए जाने को मोदी अंधभक्तो ने तांडव नृत्य की तरह 'लिया' , योगी आदित्यनाथ लव जिहाद के नाम पर वोट जिहाद में लिप्त रहे, नमो के जापान में जाकर ढोल बजाने व नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर दर्शन करने पर देवताओं ने आकाश से पुष्प वृष्टि की , आदि आदि ।
नमो की 'उपलब्धि' इस क्षेत्र में यह रही कि उन्होंने रघुराम गजनी की मदद से तिरुपति मंदिर से 1.8 टन सोने की लूट की, और सेन्सस 2011 के धर्म और भाषा के आंकड़ो को दबाया ।
राष्ट्रवादी एजेंडे के तहत जो कार्य नमो द्वारा किये जाने चाहिए थे :
1. समान नागरिक संहिता और जनसँख्या नियंत्रण का क़ानून गेजेट में छापा जाना चाहिए था ।
2. गौ हत्या निषेध बिल को संसद और बीजेपी शाषित प्रदेशो में पारित करवाया जा सकता था ।
3. सेन्सस 2011 के आंकड़े प्रकाशित किये जा सकते थे ।
4. हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए सिख धर्म की तर्ज़ पर 'हिन्दू देवालय प्रबंधन सिमिति' की स्थापना के क़ानून को गेजेट में छापा जाना चाहिए था ।
5. अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए संसद से क़ानून पास किया जाना चाहिए था ।
.
कुछ अन्य प्रतिरोध शून्य* विषय जिन पर सरकार ने फैसले लिए :
1. गंगा साफ़ करने का प्रयास किया जा रहा है, प्रशंशनीय है । किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की प्रोजेक्ट रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि, 'इस से गंगा साफ़ होने में 200 वर्ष लग जायेंगे' । सरकार नई रिपोर्ट बना रही है । फिलहाल गंगा साफ़ होना दूर की कौड़ी लगती है ।
2. कश्मीरी पंडितो को बसाने की घोषणा की गयी है, यदि सुरक्षित बसा दिए जाते है, तो स्वागत है ।
3. काले धन पर SIT बनायी गयी है। अच्छी बात है। पर धन आना और SIT बनाना, दोनों बिलकुल अलग किस्म की बाते है । उम्मीद कम है ।
4. योजना आयोग ख़त्म कर दिया गया है । नया क्या बनेगा, नतीजा उस पर निर्भर है ।
5. शौचालय वगेरह बनाने के ऐलान दिए गए है । उम्मीद है बन भी जायेंगे ।
6. जन धन योजना के तहत खाते खोले जा रहे है । इस से एक फायदा यह होगा कि निचले तबके के नागरिको के पास भी अब खाते होंगे जिस से उन्हें ऋण मिलना आसान हो जाएगा । इस से होने वाले नुक्सान तीन है , पहला यह सिर्फ 'खाते' है इनमे नागरिको के हक की मिनरल रोयल्टी नही भेजी जायेगी, दूसरा विदेशी बेंक बड़े पैमाने पर ऋण देंगे जिस से उनका मुनाफा बढेगा और हमे फिर डॉलर संकट का सामना करना पड़ेगा, तीसरा बेंको का मुनाफा बढ़ने से CSR में वृद्धी होगी, जिस से मिशनरीज़ द्वारा धर्मांतरण में तेजी आएगी

*प्रतिरोध शून्य वे फुटकर विषय होते है, जिनको लागू करने में किसी भारी विरोध का सामना नही करना पड़ता ।
===

बहरहाल नमो का एक फैसला जो कि उपलब्धि नही है, किन्तु भूल सुधार की श्रेणी में रखा जा सकता है, जुवेनाइल एक्ट संशोधन है । उपलब्धि इसलिए नहीं क्योंकि :
1. इस विष वृक्ष का बीज वाजपेयी सरकार के दौरान ही अरुण जेटली आदि के द्वारा बोया गया था, जिस कारण पिछले 13 वर्षो में स्त्री के खिलाफ बलात्कार, लव जेहाद, अपहरण और अन्य हिंसक अपराधो में भारी वृद्धि हुयी ।
2. प्रस्तावित क़ानून कमज़ोर है, जुवेनाइल बोर्ड को जुवेनाइल के निर्धारण का अधिकार दिया गया है, जबकि बोर्ड को प्रजा अधीन नही किया गया है ।

उम्मीद की जानी चाहिए की सरकार अपने शेष कार्यकाल में ऐसे कानूनों को पास करने की ज़हमत उठाएगी, जिस से देश की आर्थिक एवं सामरिक सुरक्षा मजबूत बने ।

प्रजा अधीन राजा @ pk