Pawan Jury BhilwaraRj
'क्या पट्टी खोल दी गयी है ?
1. सुप्रीम कोर्ट ने नमो के दाग़ी मंत्रियों की सफाई की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी है ।
2. आल राजस्थान एडवोकेट्स संघर्ष समिति की हड़ताल के कारणों और भ्रामक समाधानों के संदर्भ में ।
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1.
नमो ने सरकार में आने के बाद संसद को साफ़ करने की प्रतिबद्धता दिखाई थी और सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया कि सभी दाग़ी सांसदों के निपटान के लिए फास्ट ट्रेक अदालतों का गठन किया जाए ।
न्यायालय ने नमो की इस मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि सांसदों के लिए हम ऐसी कोई वेकल्पिक व्यवस्था नही बना सकते ।
अब न्यायपालिका ने नमो को सलाह दी है कि दाग़ी मंत्रियो को मंत्रिमंडल में जगह नही दी जानी चाहिए । न्यायपालिका ने सरकार से पूछा है कि 'जब किसी 'दाग़ी' व्यक्ति को न्यायाधीश बनने की अनुमति नही है, तो किसी 'दाग़ी' सांसद को मंत्री बनने की अनुमति कैसे दी जा सकती है ?
*ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पूर्व कोल्जियम द्वारा सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश पद के लिए गोपाल सुब्रह्मनियम का नाम प्रस्तावित किया था, जिसे नमो ने IB की नकारात्मक ख़ुफ़िया रिपोर्ट का हवाला देते हुए लौटा दिया था । अन्तत: विवाद से तंग आकर सुब्रह्मनियम ने अपना नाम वापिस ले लिया ।
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भारत में न्यायपालिका को सरकार द्वारा नियंत्रित करने की कोशिशे लगातार होती रही है, आज़ादी के बाद जवाहर लाल ग़ाज़ी और देवी इंदिरा अम्मा ने विधिवत तरीके से हमारे देश में आंशिक रूप से स्थित जूरी सिस्टम को ख़त्म कर दिया ।
क्योंकि जूरी सिस्टम द्वारा ही स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की जा सकती है । अन्य तरीको में न्यायपालिका का नियंत्रण या तो सरकार के हाथ में चला जाता है या फिर MNCs और मिशनरीज़ इन पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेती है ।
ज्ञातव्य है कि 1991-92 में MNCs ने सुप्रीम कोर्ट से एक रूलिंग निकलवा कर कोल्जियम की स्थापना करवा दी थी जिस से सरकार की न्यायपालिका पर पकड़ कमज़ोर हो चुकी थी ।
अब नमो ने विधिवत ढंग से आयोग बना कर न्यायपालिका को सरकारी तोता बना दिया है ।
टकराव नमो के शपथ लेने के साथ ही शुरू हो गया था :
- IB ने लगभग डेढ़ महीने पहले ही नमो को ख़ुफ़िया रिपोर्ट दे दी थी कि यदि ग्रीन पीस इण्डिया और विदेशी अनुदान से चलाये जा रहे इन जैसे 20 अन्य संघठनो को प्रतिबंधिंत नही किया गया तो ये संघठन न्यायपालिका में बड़े पैमाने पर PLI डलवा कर सभी कोल ब्लोक्स रद्द करवा सकते है । इस से बिजली का उत्पादन बड़े पैमाने पर प्रभावित होगा ।
नमो ने काटजू और पेड मीडिया से न्यायिक सुधार का मुद्दा उठावाया और 'स्वतंत्र न्यायपालिका' के नाम पर आयोग टेप कर न्यायपालिका को काबू में कर लिया ।
- नमो ने सुब्रह्मनियम को रोका तो पलटवार करते हुए कोर्ट ने नमो के मंत्रियो को कटघरे में खड़ा करवा दिया ।
- नमो ने आयोग बना कर न्यायपालिका को हड़प लिया, कोर्ट ने 1993 से आवंटित सभी कोल-ब्लोक अवैध घोषित कर दिए ।
- नमो ने दाग़ी सांसदों को मंत्री बना दिया और आलोचना से बचने और टाइम पास करने के लिए गेंद कोर्ट के पाले में फेंक दी । जबकि कोर्ट दाग़ी मंत्रियो को अब पद पर भी देखने के मूड में नही है ।
चूंकि अब आयोग बन चुका है इसलिए सरकारी बांग से ही न्यायपालिका में सवेरा होगा ।
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सरकार और कोर्ट की इस नूरा कुश्ती में न्यायपालिका को प्रजा अधीन करके स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना को गहरा धक्का लगा है ।
समाधान : सभी नागरिको से अपील है कि अपने क्षेत्र के सांसद को SMS
द्वारा ऑर्डर भेजे कि गेजेट में नागरिको की
1. जूरी द्वारा सुनवाई के क़ानून ड्राफ्ट को गेजेट में छापा जाए
2. शेषन जज, हाईकोर्ट जज तथा सुप्रीम कोर्ट जजों को प्रजा अधीन किया जाए ।
ताकि न्यायपालिका के पृथक्करण को सुनिश्चित किया जा सके ।
इन सभी कानूनी ड्राफ्ट यहाँ से मुफ्त डाउनलोड करे :
rahulmehta . com / 301 . h . htm
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"वकीलों का स्तर चिंताजनक रूप से गिरता जा रहा है"
भास्कर में छपी खबर के अनुसार ,जयपुर के अधिवक्ता भारत भूषन पारीक को श्री कुदसिया ने कीमती फ्लेट किराए पर दिया जिस पर श्री मान अधिवक्ता महोदय ने कब्ज़ा कर लिया ।
शेषन न्यायलय ने 10 वर्ष पहले कुदसिया के नाम डिक्री की, और पारीक को फ्लेट खाली करने के आदेश दिए । पारीक महोदय हाई कोर्ट से स्टे ले आए, जिसे ADJ 13 ने केंसिल कर दिया ।
अधिवक्ताओं ने ADJ 13 से अभद्रता की, जिसे ADJ13 ने नोट बुक में दर्ज कर लिया । बार एसोशिएशन ने ADJ 13 के ट्रांसफर की मांग की , और नकारे जाने पर हड़ताल शुरू हो गयी ।
बाद में इस हड़ताल को मोरल ग्राउंड देने के लिए न्याय्पालिका द्वारा अवमानना के विशेषाधिकारो का बेजा इस्तेमाल, न्यायपालिका में करप्शन आदि मांगो को जोडा गया ।
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देश में ज़्यादातर संघठनों के शिखर पर बैठे नेता अपने कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में करते है । उनके पास कोई तार्किक समाधान नही होते और संख्या बल का इस्तेमाल दबाव बनाने, धमकाने और राजनीति चमकाने में किया जाता है । इन दबाव समूहों की राजनीति कार्यकर्ताओं के शोषण पर चमकती है ।
वकीलों की इस हड़ताल में भी कमोबेश यही हो रहा है । बार असोशिएशन के आदेश पर हज़ारो वकीलों ने राजस्थान में काम काज ठप कर दिया । आर्थिक , न्यायिक और प्रशाशनिक नुक्सान का आकलन नही किया जा सकता ।
कई वकीलों को तो जानकारी तक नही है कि यह हड़ताल एक चुप्पा है और इस हुड़दंग का न्यायपालिका के भर्ष्टाचार के समाधानों से कोई लेना देना नही है ।
यदि बार एसोशिएशन की रुचि वाकई न्यायपालिका की स्वतंत्रता में होती तो बार एसोशियेशन द्वारा इस समस्या के निराकरण के लिए कानूनी ड्राफ्ट दिए जाते । ताकि आन्दोलन की तार्किकता होती । बजाय के क़ानून ड्राफ्ट आधारित आन्दोलन के ,वकील अपने नेताओं के आदेश पर बचकानी हरकते करके अपना और जनता का टाइम वेस्ट कर रहे है ।
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ज्ञातव्य है कि
- जब नमो न्यायिक आयोग बना कर न्यायपालिका को सरकार के नियंत्रण में ले रहे थे तब बार एसोशिएशन ने कोई विरोध नही किया ।
- न्यायपालिका में करोडो केस लंबित है लेकिन न्याय प्रक्रिया को त्वरित बनाने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट बार एसोसिएशन ने नही दिए ।
- न्यायधिशो की संख्या 4 गुना करने और जज प्रणाली में नेपोटिस्म रोकने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए ।
- न्यायालय को पृथक और स्वतंत्र बनाने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए ।
- जजों को प्रजा अधीन करने और जूरी सिस्टम लाने का हमेशा विरोध किया ।
बार एसोशियेशन पर्चे छपवा कर प्रजा के समर्थन की अपील तो जारी करता है लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रजा के सामने कानूनी ड्राफ्ट नही रखना चाहता । हमारे क़ानून पढ़े हुए ये डिग्रीधारी प्रजा के सामने क्या आदर्श स्थापित कर रहे है ।
मानव श्रुन्ख्लाये बनाओ, नारे लगाओ, अनशन करो, दुकाने बंद करो .. इस से न्यायपालिका का भ्रष्टाचार दूर होगा ?
यह सख्त अफ़सोस नाक है कि लगभग 50 दिन राज्य के बर्बाद कर दिए गए, लाखो नागरिको और हज़ारो कैदियों को परेशानी झेलनी पड़ी और नतीजा सिफर है , और सिफर ही रहने वाला है , क्योंकि बार एसोशिएशन के पास कोई कानूनी ड्राफ्ट नही है । जो कि इनके पास सबसे पहले होने चाहिए थे ।
हमारे इन वकीलों की तुलना उस मेकेनिक से की जा सकती जो अपने औजार अपने घर छोड़ कर आया हो ।
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प्रजा राज्य के सभी वकीलों से यह जानना चाहती है कि भारत की न्यायपालिका के पतन के लिए आप सबसे अधिक दोषी क्यों नही है ?
जबकि :
- विधि क्षेत्र में काम करने वाला यह सबसे बड़ा वर्ग है ।
यदि हमारे देश के इन वकीलों ने भारत की न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए ड्राफ्ट आधारित आन्दोलन किया होता ( जो कि इन्होने आज तक नही किया है ) तो इनके आन्दोलन को जनता का भारी समर्थन मिलता , क्योंकि न्याय प्रक्रिया से सबसे ज्यादा त्रस्त प्रजा ही है । लेकिन वकीलों ने अपने निहित स्वार्थो के लिए ड्राफ्ट विहीन आन्दोलन कर के अपनी साख और भी गिराई है ।
जिनसे दिशा देने की अपेक्षा की जाती है, दुर्भाग्य से वो स्वयं दिशा विहीन है । हम निंदा करते है ।
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समाधान : सभी नागरिको से निवेदन है कि ऐसे किसी आन्दोलन को समर्थन न दें जो आन्दोलन ड्राफ्ट विहीन हो । ड्राफ्ट विहीन आंदोलन बिना डिजाइन का इंजिनियर है, जो कभी भी मज़बूत भवन का निर्माण नही कर सकता ।
- अपने परिचित वकीलों तथा अधिवक्ताओ से हड़ताल में उठाई गयी समस्याओ के निराकरण के कानूनी ड्राफ्ट देने को कहें । यदि वे ड्राफ्ट देते है तो समर्थन करे, अन्यथा नही ।
प्रजा अधीन राजा @ pk