Pawan Jury BhilwaraRj

"सिखो के विभाजन का षड्यंत्र"

'बरसो पुराना फ़िरकेवाराना यह फसाद एसजीपीसी के तकसीम के मुद्दे पर पंजाब में फिर भड़का , तो मज़हबी और सियासी अलमबरदार रोटियां सेंकने उतर आये'

मिशनरीज़ एवं MNCs ने सिख धर्म को तोड़ने के लिए हरियाणा एसजीपीसी बिल पास करवाया है । ये बिल पास होने से अब हरियाणा राज्य के पास अपनी अलग प्रबंधन कमेटी होगी और अमृतसर एसजीपीसी का उस पर कोई नियंत्रण नही रह जाएगा ।
ये बिल सिखों के एकीकृत धार्मिक प्रशासन को कमजोर कर देगा ।

- भारत में सिखो की आबादी 1.25% होने के बावजूद सेना में सिखो की संख्या लगभग 20% है ।
- सिख धर्म में ही शस्त्र धारण करना अनिवार्य किया गया है ।
- सिख हमेशा से किसी एक गुरु के नेतृत्व में एकीकृत रहे है ।
- भारत में सिर्फ सिख ही एक धार्मिक संघठन के आधार पर मुग़लो और अंग्रेजो से लम्बी लड़ाइयाँ लड़ सके ?
- सिखों में धर्मांतरण का प्रतिशत लगभग शून्य है ।
- अमूमन सिख आपको भीख मांगते नज़र नही आएंगे ।
- सिखों में धर्म, जाति और मातृभूमि के लिए बलिदान देने का इतिहास रहा है ।

सिखों के धर्म की मीमांसा या दर्शन जो भी हो, सिखों का प्रशासन हमेशा से मज़बूत रहा है ।

सिखों में सभी गुरूद्वारो का प्रबंधन एक ही एकीकृत संस्था (वर्तमान में एसजीपीसी) द्वारा किया जाता रहा है ।
सिख गुरुओ ने हमेशा से अपने श्रावको को हथियारों के महत्त्व के बारे में उपदेश दिए और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान होने वालो के परिवारों को आर्थिक रूप से सरक्षण तथा शहीद का दर्ज़ा देने की परम्परा की प्रणाली विकसित की ।

हिन्दू धर्म के मंदिरों में मौजूद वंश परम्परा के उलट , सिखों में गुरुद्वारों का प्रबंधन लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुन कर आये प्रतिनिधि करते है, इस कारण ग्रन्थियों में सम्पत्तियो के संग्रह की प्रवृति पनपने की जगह समाज और धर्म पर खर्च करने की प्रवृति पायी जाती है ।

ये व्यवस्था धर्मांतरण को हतोत्साहित तथा धर्म की रक्षा के लिए लड़ने को प्रोत्साहित करती है जिस से धर्म मज़बूत बना रहता है ।

ज्ञातव्य है कि 1925 के अधिनियम के तहत सिखों के समस्त गुरद्वारे, धार्मिक संकाय आदि अमृतसर की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी द्वारा शाषित होते है ।

1959 में जवाहर लाल गाज़ी ने एसजीपीसी को बाटने का प्रयास किया था किन्तु विरोध के बाद मास्टर तारा चंद और गाज़ी के बीच यह समझौता हुआ कि , एसजीपीसी की अनुमति के बिना ऐसा करना अवैध और असम्वेधानिक है , तथा आइन्दा सरकार धर्म में हस्तक्षेप नही करेगी ।

पश्चात CIA द्वारा प्रायोजित खालिस्तान के आन्दोलन को तोड़ कर जनरेल सिंह भिंडरावाले को कमजोर करने के लिए देवी इंदिरा अम्मा ने एसजीपीसी में विभाजन करके दिल्ली एसजीपीसी की अलग से स्थापना करवा दी । जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण फैसला था ।
अब जबकि अमृतसर एसजीपीसी इस बिल का विरोध कर रही है तो हरियाणा सरकार ने इस बिल को क्यों पास किया ? नियमो के खिलाफ जाकर क्यों ?

हरियाणा एसपीजीसी की स्थापना को लेकर सभी राजनितिक दल अपने तरीके से सियासत कर रहे है :

- कोंग्रेस की हुड्डा सरकार ने 7 जुलाई को बिल पेश किया और राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया ने 14 जुलाई को बिल पर हस्ताक्षर करके अलग से हरियाणा एसजीपीसी को मंज़ूरी दी ।

- केंद्र सरकार को ये कानूनी अधिकार है कि वह राज्यपाल को किसी अमुक बिल पर हस्ताक्षर न करने का आदेश दे सके । किन्तु नमो ने इस बिल को रोकने में कोई रुचि नही दिखाई ।

- मिशनरीज़ और MNCs ने बादल सरकार को एसजीपीसी में भ्रष्टाचार और पंजाब में ड्रग के व्यापार को फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया ।

- बीजेपी ने बादल के सरक्षण में चल रहे भ्रष्टाचार और ड्रग के धंधे को सरक्षण दिया , जिसका खामियाजा जेटली ने अमृतसर की सीट गँवा कर भुगता ।

- जिस प्रकार किसी हिंसक पशु के हमले से अपनी प्राणरक्षा के लिए हिरन दलदल की और भागकर अपने प्राणों को और भी संकट में डाल देता है, उसी प्रकार पंजाब की जनता ने बीजेपी,अकाली और कोंग्रेस से त्राहत होकर केजरीवाल की और दौड़ लगाई और आम चुनाव में उन्हें 4 सीट मिली ।

लेकिन चूंकि केजरीवाल को आगामी विधानसभा चुनावों में मिशनरिज़ और MNCs द्वारा नियंत्रित पेड मिडिया का समर्थन चाहिए इसलिए अरविन्द गांधी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे है ।
न उन्होंने अब तक इस विषय पर अनशन की मुनादी दी है न धरना आदि का कार्यक्रम तय किया है । वस्तुत: अरविन्द गांधी की रुचि और स्वार्थ इस विभाजन को रोकने में नहीं है । अरविन्द इसे विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनाना चाहते है ।

यह सुधार का एक अजीब सिद्धांत है कि यदि कोई मंत्री ठीक से कार्य नही कर रहा है तो मंत्री को बर्खास्त करने की जगह मंत्रालय को ही ख़त्म कर दिया जाए ।
अकालियो ने बीजेपी के सहयोग से एसजीपीसी का बेड़ा गर्क कर दिया है, बजाय इसके कि बादल को बाहर का रास्ता दिखाया जाए एसजीपीसी को ही भंग किया जा रहा है ।

अब बादल इस मुद्दे पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करना चाहते है,
बादल एसजीपीसी को बचाने की पोची मुहीम में लगे हुए है ताकि उनका गोरखधंधा चालू रहे ।
बादल ने राजनाथ से मिलकर इस बिल की संवैधानिकता पर सवाल उठाये है और केंद्र से हस्तक्षेप करने की मांग की है ।
गृह सचिव ने हरियाणा के मुख्य सचिव को चिट्ठी लिख कर इस बिल की संवैधानिकता पर जवाब माँगा है ।

चूँकि बिल पास होने से पहले न तो बादल ने केंद्र से हस्तक्षेप करने की मांग की न ही नमो ने इस बिल को पास होने से रुकवाया ।
बिल पास होने के बाद अब बादल और नमो मिलकर कोंग्रेस के साथ नूरा कुश्ती खेल रहे है ।
ताकि मुद्दे को चिट्ठी पत्रियो, निंदा आलोचना, कोर्ट कचहरी आदि के नाटकीय घटनाक्रम में उलझा कर जनता की भावनाएं इस बिल पर भड़काई जा सके, और ये मुद्दा चुनावी मुद्दा बन जाए ।

बादल और बीजेपी एसजीपीसी को बचाने का ड्रामा पब्लिक में स्टेज बना कर कर रहे है और बिल को केंसिल करने में उनकी कोई रुचि नही है ।

संभावनाएं :

- हरियाणा के अपने गढ़ को बचाने के लिए कोंग्रेस की निगाह हरियाणा के सिख वोटो पर है, इसलिए उसे चुनावों तक इस बिल को स्टेंड बाय मॉड पर रखना है।

- बीजेपी- अकाली इस बिल के विरोध के आधार पर पंजाब में चुनाव लड़ कर एसजीपीसी के पहरुए के तौर पे उभरना चाहती है । इसलिए बीजेपी अकाली भी इस बिल को स्टेंड बाय रखना चाहते है ।

- अरविन्द गांधी समय देख रणनीति तय करेंगे । अभी बिल को मौन समर्थन दे रहे है, चुनावों में विरोध करेंगे ।
यदि अरविन्द गांधी हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ते है तो वहाँ पर बिल का समर्थन कर सकते है और पंजाब में बिल का विरोध ।

- मिशनरीज़ और MNCs अरविन्द गांधी को चुनाव में बड़े पैमाने पर मिडिया फूटेज देगा, ताकि बीजेपी अकालियो के प्रति असंतोष को अरविन्द गांधी की और मोड़ा जा सके ।
यदि MNCs और मिशनरीज़ के एजेंट अरविन्द केजरीवाल सत्ता में आ जाते है तो ड्रग का व्यापार पंजाब में और मजबूत होकर उभरेगा और सिखों के विभाजन से धर्मांतरण में आसानी होगी ।

समाधान :

सभी नागरिको से निवेदन है कि अपने क्षेत्र के सांसद को SMS द्वारा ऑर्डर भेजे कि केंद्र सरकार हरियाणा एसजीपीसी बिल को तुरंत प्रभाव से रद्द करने का आदेश जारी करे ।

*अपील- चाहे आप किसी भी धर्म का पालन करते हो, इस बिल का सक्रीय रूप से विरोध करे और SMS अवश्य भेजे ।

प्रजा अधीन राजा @ pk