Pawan Jury BhilwaraRj
'अरविन्द गाँधी का नया चूपा'...!!
क्यों अरविन्द गांधी बुलेट ट्रेन का विरोध काल्पनिक किराए के आधार पर कर रहे है ???
*चूपा - किसी महत्वपूर्ण और वास्तविक समस्या को कुशलता और चतुराई से, महत्त्वहीन विषय द्वारा प्रतिस्थापित कर देना 'चूपा देना' कहाता है ।
- इस कला का प्रयोग मूल विषय से ध्यान भटकाने, भ्रमित करने और माहौल को हाइजेक करने में किया जाता है ।
चूपे भारतीय राजनीति का अनिवार्य घटक है । मौखिक वादे कंरना, बेतुके बयान चलाना, काल्पनिक समाधान सुझाना, फ़िज़ूल के एलान देना, चिल्लर मुद्दे उठाकर सनसनी बनाए रखना आदि चूपो के कुछ आयाम है , जिनका प्रयोग जनता का मनोरंजन तथा टाइम पास करने के लिए नेताओं द्वारा इफरात में किया जाता है ।ै
ज्ञातव्य है कि मोहन दास करमचंद गांधी ने लगभग 3 दशक तक भारत की जनता को 'सविनय अवज्ञा, असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलनों के नाम पर चूपे दिए और आज़ादी की मांग के वास्तविक मुद्दे को दरकिनार किया । इस कुकृत्य को ब्रिटिश समर्थित पेड मिडिया ने भरपूर समर्थन दिया और जनता का टाइम पास किया ।
अब वही सब कुछ पिछले दो वर्ष से अरविन्द गाँधी कर रहे है ।
अरविन्द गाँधी मोहन भाई के मानस पुत्र है और इन्हें भी अपने धर्म पिता की तरह चूपे देने में महारत हासिल है ।
विषय यह है कि नमो ने अहमदाबाद - मुंबई ट्रेक जापानियो को बुलेट ट्रेन चलाने के लिए बेच दिया है, जिसे 'सोबर' भाषा में रेल में FDI कहा जा रहा है ।
इस फैसले के विरोध के वास्तविक कारण यह है कि :
- यह विदेशी निवेश निर्यात शून्य क्षेत्र में किया गया है । मतलब इस निवेश से निर्यात होने की संभावना शून्य है ।
- जापानी जितना भी मुनाफा रुपयों में कमाएंगे उसका पुनर्भरण हमें डॉलर में करना होगा ।
- जितना ही बुलेट ट्रेन का 'विकास' होगा भारत पर उतना ही डॉलर का क़र्ज़ बढेगा ।
- इस ट्रेक पर हमारी स्वदेशी ट्रेनों राजधानी, शताब्दी और दुरंतो की हालत चरमरा जायेगी ।
तो इन वास्तविक मुद्दों का विरोध कार्यकर्ता कर रहे है और जनता को जानकारी दे रहे है , तब अरविन्द गाँधी इस विषय का विरोध अजीब तरीके से कर रहे है ।
अरविन्द गांधी की मुख्य 'चिंता' यह है कि यात्री बुलेट ट्रेन में सफ़र करने का टिकेट 72000 रूपये में कैसे खरीदेंगे ?
हाल ही में अरविन्द गांधी ने टीवी पर आकर बयान दिया कि -
"मेरी मुख्य चिंता यह है कि यात्री 72000 रु कैसे दे पायेगा । मैने जो केलकुलेशन की है उसके अनुसार 70000 से 72000 हज़ार से कम का किराया इस रूट पर मेनेज नही होगा" ---- अरविन्द गांधी उवाच
कोई भी सहज बुद्धि रखने वाला व्यक्ति यह बात समझ सकता है कि अहमदाबाद से मुंबई की दूरी फ्लाईट द्वारा 50 मिनिट में तय की जाती है , बोर्डिंग वगेरह मिलाकर 1 घंटा अतिरिक्त लगता है । मतलब कुल मिलाकर 2 घंटा । इस रूट का फ्लाईट टिकेट 6000 से 9000 के बीच मिल जाता है ।
तो जापानियो ने भांग खा रखी है जो वो भाड़ा 70000 लेंगे ???
या यात्री कोकीन के नशे में है जो कि 4 घंटे के सफ़र के 70000 रु देंगे ???
सरल गणित यह है कि :
ट्रेक की लागत - 60 हजार करोड़
1 ट्रेन की क्षमता - 1500 यात्री
प्रति घंटा आवृति - 8 ट्रेन
प्रति घंटा यात्री संख्या - 15×8 = 9600
12 घंटे में यात्री संख्या - 9600 × 100000 ( लगभग )
प्रस्तावित भाड़ा - 5000 रु प्रति यात्री ।
100000 × 5000 = 500000000 प्रति दिन ।
500000000 × 300 = 150000000000 करोड़ का सालाना रेवेन्यु जापानी प्राप्त करते है ।
*कार्य क्षमता 24 घंटे की जगह 12 घंटे को आधार बनाया गया है ।
*365 की जगह 300 दिन को आधार बनाया गया है ।
*स्टेशन पर मौजूद शोपिंग मोल्स, होटल्स आदि की आय नही जोड़ी गयी है ।
तो ये आदमी क्या पागल है ?
जोकर है ? 24 घंटे अफीम और भांग के नशे में रहता है ?
या
ये जनता को अफीम पिलाने की कोशिश कर रहा है ?
72000 ????????
किस हिसाब से ?
साफ़ दिख रहा है कि जापानी 4000 से 8000 के बीच किराया रख कर काफी मोटा मुनाफा कमाने वाले है ।
और ये भी तय है कि खडगपुर से इंजीनियरिंग करने वालो को इतनी सरल गणित तो आती ही है ।
फिर मिस्टर गांधी इतनी भयंकर हेराफेरी कर के क्यों जनता को भ्रमित कर कर रहे है ?
जवाब है कि अरविन्द गांधी नही चाहते कि डॉलर पुनर्भरण के वास्तविक मुद्दे की और नागरिको और कार्यकर्ताओं का ध्यान जाए
क्योंकि इस मुद्दे के गरमाने पर सरकार को फैसला पलटना पड़ सकता है ।
चूंकि जैसे मोहन गांधी ब्रिटिश एवं पेड मिडिया के प्रोडक्ट थे, उसी तरह से अरविदं गांधी भी MNCs और पेड मिडिया के प्रोडक्ट है ।
इसलिए AK- 420 मूल मुद्दे को साइड में करने के लिए जनता को 72000 के काल्पनिक किराए का चूपा दे रहे है । ताकि बुलेट ट्रेन के वास्तविक नुकसान डॉलर पुनर्भरण के मुद्दे से कार्यकर्ताओं का ध्यान हट जाए और काल्पनिक किराए पर विरोध शुरू हो जाए । ऐसा किराया जो कि कभी रहने वाला ही नही है ।
प्रजा अधीन राजा @ pk