Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
एके अपने जेल के नाटक में आसानी से सफल हुए। इसका सारा श्रेय बिकाऊ मीडिया द्वारा दिए गए सहयोग तथा भाजपा के नेताओं की निष्क्रियता को जाता है। इसका समाधान मैं प्रस्तावित करता हूँ कि कार्यकर्ताओं को राइट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम आदि जैसे समाधानों पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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एके ने नितिन गडकरी को भ्रष्ट कहा, जो कि वे सचमुच हैं। एके ने 15 दिन के लम्बे समय के लिए जेल में रहने का नाटक किया, तथा पूरी बिकाऊ मीडिया ने इसका प्रसारण किया, चाहे सकारात्मक तौर पर अथवा नकारात्मक तौर पर। और इस प्रकार उन्हें पूरे भारत में नागरिकों का बड़े पैमाने पर समर्थन मिला, खासतौर से उनका जो स्वयं भ्रष्टाचार के शिकार रह चुके हैं। अधिकांश वैसे व्यक्ति जो भ्रष्टाचार के शिकार रह चुके हैं, आंशिक या पूर्ण रूप से एके का समर्थन करते हैं।
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मैं एके के इस व्यवहार को नाटक इसलिए कहता हूँ क्योंकि उनकी योजना कभी भी भ्रष्टाचार तथा न्यायिक विलम्ब को कम करने की नही रही। जमानत की यह समस्या भी इसलिए हुई क्योंकि हमारे यहाँ न्यायाधीश प्रणाली है, न कि ज्यूरी प्रणाली। अमेरिका में जमानत का निर्णय न्यायाधीश करते हैं, किन्तु यदि ग्रैंड ज्यूरी महसूस करती है कि जमानत अविवेकपूर्ण है तो वह अभियोग पक्ष से अपेक्षाकृत आसान शर्तों पर जमानत का प्रस्ताव रखता है। नागरिक भी ऐसे न्यायाधीशों को हटा सकते हैं जो अविवेकपूर्ण निर्णय ले रहे हो। अतः समस्या का समाधान न्यायालयों की संख्या बढ़ाना, ज्यूरी सिस्टम, न्यायाधीशों पर राइट टू रिकॉल लागू करना आदि हैं। एके ने ज्यूरी सिस्टम सहित इन सभी प्रस्तावों का विरोध किया है, तथा न्यायालयों के सुधार हेतु एक भी ड्राफ्ट नही दिया। यहाँ तक कि जब वह दिल्ली के मुख्य मंत्री थे, तब भी उन्होंने दिल्ली सरकार के अधीन न्यायाधिकरणों के सुधार हेतु भी कोई प्रस्ताव नहीं रखा। अतः ऐसा बिलकुल नही है कि वे सिस्टम को सुधारने के उद्देश्य से जेल गए हैं। वह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार पीड़ित जनता की सहानुभूति तथा वोट प्राप्त करने के लिए जेल गए हैं।
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समस्या और अधिक पेचीदा इस बात से हो जाती है कि राष्ट्रवादी कार्यकर्ता भी न्यायालय, प्रशासन, आदि को सुधारने में रुचि नही रख रहे। आम मतदाता सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए कार्यकर्ताओं एवं बिकाऊ मीडिया पर निर्भर हैं।कार्यकर्ताओं एवं बिकाऊ मीडिया दोनों ने मतदाताओं के समक्ष मात्र दो विकल्प रखे- नमो तथा एके। नमो ने तो औपचारिक रूप से साफ़- साफ़ यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि- " मैं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकास पर ध्यान केंद्रित करूंगा, और भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान तो अब भगवान ही करेंगे!!!" वह ईमानदार और स्पष्टवादी हैं। उनके गुजरात में 12 वर्षों के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम रहा, किन्तु इसकी दर शून्य से काफी दूर रही। इस प्रकार वस्तुतः नागरिकों से नमो का अनुरोध है कि वे उनसे भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान की उम्मीद न करें। अतः भ्रष्टाचार विरोधी सभी मतदाता अब एके की तरफ ही रूख करेंगे, तथा इस प्रकार अपना समय व्यर्थ करेंगे। इससे भी बुरा यह हो सकता है कि एके अपने समर्थकों का दुरूपयोग अस्थिरता फ़ैलाने में कर सकते हैं।
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मैं समाधानस्वरूप ऐसे कार्यकर्ताओं को सुझाव देना चाहूँगा जो आआपा, आरएसएस, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट, नमो- भक्त आदि नही हैं। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम, राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि सम्बन्धी जानकारी का प्रसार करें, जिससे भ्रष्टाचार कम होगा तथा बिना एफडीआई के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। मैं औपचारिक रूप से आआपा, आरएसएस, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट, नमो- भक्त आदि को इस अभियान से दूर रख रहा हूँ, इसका कारण यह है कि वे सब नारेबाजी, टोपी पहनना, मास्क पहनना, झाड़ू लगाना, आदि जैसे काम तो बहुत अच्छी तरह कर सकते हैं, किन्तु उनके सामने कानून ड्राफ्ट का वर्णन करना और फिर उनसे उसके बारे में सूचना का प्रसार करने की उम्मीद करना वैसे ही है जैसे भैंस को भगवद्द्गीता सुनाना, तथा फिर उससे यह उम्मीद करना कि वह दूसरों को भी सुनाये। अतः अच्छा हो हम उन्हें नारेबाजी, टोपी पहनना, मास्क पहनना आदि जैसे मनोरंजक कार्य करने दें। बाकी लोग वास्तविक समस्याओं के समाधान हेतु कानून ड्राफ्टों की जानकारी का प्रसार कर सकते हैं।