Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Hindi translation of chap-4 , chap-5 of the article "कौन से कानून ड्राफ्ट मंदिरों के प्रशासन में सुधार ला कर सभी हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं?"
Chap 4- किस प्रकार आजीवन कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से मंदिरों में जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है
(pls post comments at the end of main article ONLY . comments posted here will be deleted. The main article is --- what law-drafts can make all sects of Hinduism as powerful as Sikhism . The fukk article is at facebook . com / note.php ? note_id = 10151479439181922 )
For link to translation of chap-1 to chap-3 pls see above link. This post has translation of chap-3. Trnslation is done by a friend of mine
पाठक मुझसे असहमत होकर यह कह सकते हैं कि यदि मंदिरों में आजीवन कार्यकाल तथा उत्तराधिकार प्रणाली है तो इसमें बुराई क्या है? तथा गुरू प्रथा में गलत क्या है, जिसके अंतर्गत वर्त्तमान गुरू हीं अपने शिष्यों में से किसी एक को अगला गुरू चुनते हैं? यह एक वैध प्रश्न है।
आइये, हम दो परिदृश्यों की तुलना करके देखें- पहला, जिसमें मंदिर प्रमुख A का कार्यकाल मात्र 2 वर्षों का है, तथा दूसरा परिदृश्य जिसमें मंदिर प्रमुख B का कार्यकाल आजीवन का है। मान लीजिये प्रमुख A तथा प्रमुख B दोनों हीं अलग- अलग मामलों में 1- 1 करोड़ रूपये प्राप्त करते हैं। ऐसी स्थिति में B, जिसका कार्यकाल आजीवन का है, उस 1 करोड़ रूपये को खर्च करने की बजाय लम्बे समय तक अपने पास रखना चाहेगा। जबकि A का कार्यकाल चूँकि कुछ वर्षों का निश्चित है, अतः बदतर स्थिति में हीं वह इसका कुछ भाग अपनी जेब में डालने की कोशिश कर सकता है। किन्तु एक सीमा से अधिक यह भी सम्भव नहीं होगा। अतः A इस पैसे को यथासम्भव सामुदायिक कार्यों में हीं लगाएगा, ताकि उसे यश मिले तथा उसके पुनर्निर्वाचन की सम्भावना भी बढ़ जाये। इस प्रकार आजीवन कार्यकाल से खर्च की इच्छा घटती है, तथा जमाखोरी की इच्छा बढ़ती है। जबकि कुछ वर्षों के निश्चित कार्यकाल से जमाखोरी की प्रवृति घटती है, तथा सामुदायिक कार्यों में खर्च करने की इच्छा बढ़ती है।
उत्तराधिकार तथा आजीवन कार्यकाल दोनों हीं साथ- साथ पाये जाते हैं। प्रत्येक ऐसी संस्था जिसमें आजीवन कार्यकाल होता है, वहाँ उत्तराधिकार भी होता है। इसी प्रकार उत्तराधिकार प्रथा वहीँ होती है जहाँ कि आजीवन कार्यकाल भी होता है। निश्चित समय का कार्यकाल होने से आजीवन कार्यकाल तथा गुरु प्रथा दोनों हीं स्वतः- रद्द हो जाते हैं।
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Chap- 5. किस प्रकार मंदिरों में आजीवन कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से सामुदायिक प्रतिरक्षा कमजोर पड़ती है?
अध्याय 4 में दिए गये उदाहरण में प्रमुख B अपने उत्तराधिकारी के लिए धन संग्रह करना चाहेगा, तथा उत्तराधिकारी भी उसपर यथासम्भव कम खर्च करने के लिए दबाव बनाएंगे। अतः जमाखोरी आगे बढ़ते हीं जायेगी, सामुदायिक कार्यों में गिरावट आएगी, तथा समस्या बद से बदतर होती जायेगी।
सामुदायिक कार्यों में धन खर्च करने की जगह संग्रह करने की प्रवृत्ति से समुदाय की प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर पड़ती है। उदाहरण के लिए मान लीजिये दो समुदाय A तथा B हैं। समुदाय A में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल निश्चित है, तथा उत्तराधिकार की जगह उसका निर्वाचन अनुयायियों द्वारा किया जाता है। समुदाय B में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल आजीवन का है, तथा उत्तराधिकार प्रथा भी है। यदि समुदाय A पर कोई बाह्य आक्रमण होता है, जिसमें समुदाय के 1000 में से लगभग 100 सदस्यों ने युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मान लीजिये युद्ध में उनमें से 10 मारे गये तथा 10 बुरी तरह घायल हो गये। अब यदि घायलों तथा मारे गये व्यक्तियों के परिजनों को मंदिर कोई सहायता नही देते, तो अगली बार हमले में बहुत कम व्यक्ति लड़ने जायेंगे। फलस्वरूप समुदाय का नियंत्रण आक्रमणकारियों के हाथों में चला जायेगा। यदि समुदाय B के साथ भी समान परिस्थिति की कल्पना करें तो चूँकि यहाँ धन संग्रह नहीं होता, अतः मंदिर प्रमुख घायलों एवं मृत तथा घायल व्यक्तियों के परिजनों की सहायता करेंगे। अतः अगली बार भी युद्ध छिड़ने पर बड़ी संख्या में लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ने जायेंगे। इस प्रकार निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं-
1. यदि मंदिर में धन संग्रह की प्रवृत्ति है तो
2. मंदिर की तरफ से घायलों तथा मृतकों के परिजनों को मिलने वाली सहायता में कमी आती है।
3. अतः समुदाय की सुरक्षा के लिए लड़ने की इच्छा रखने वाले सदस्यों की संख्या में कमी आती है।
4. फलस्वरूप समुदाय की पराजय बाह्य आक्रमणकारियों के हाथों होती है।
यही कारण है कि गैर सिख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, अतः उनमें धन संग्रह की प्रवृत्ति होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की अत्यल्प मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का निर्वाचन निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होता है, अतः उनमें धन संग्रह की प्रवृत्ति नही पाई जाती, इसलिए वे घायलों व मृतकों के परिजनों की मदद करते हैं। अतः सिखों में लड़ने का जोश बना रहता है, तथा सतत बढ़ता हीं जाता है। और इस कारण सिख स्वयं को तथा हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।