Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
Chap-3 of main article "कौन से कानून ड्राफ्ट मंदिरों के प्रशासन में सुधार ला कर सभी हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं?"
Chap-3 : सिख गुरुद्वारा का प्रशासन- सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम
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Chap-3 : सिख गुरुद्वारा का प्रशासन- सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम
सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम तथा गुरुद्वारों के प्रबंधन सम्बंधी विस्तृत जानकारी पाठक इंटरनेट से अथवा अपने सिख मित्रों से प्राप्त कर सकते हैं, (इसके लिए एक अच्छा लिंक है:
en.wikipedia . org / wiki/Akali_movement । यहाँ मैं सिख गुरुद्वारा प्रशासन के सम्बन्ध में संक्षिप्त विवरण दे रहा हूँ।
सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम का संक्षिप्त इतिहास जानना यहाँ वांछित है। सिख गुरुओं ने यह परंपरा बनाई कि गुरुद्वारा प्रमुख न तो वंशानुगत होंगे, और न हीं कुछ खास व्यक्तियों के अल्पमत से नियुक्त किये जायेंगे, बल्कि उनका निर्वाचन सम्बंधित ग्राम अथवा ग्राम समूह के सभी वयस्क सिख मिलकर करेंगे। प्रत्येक सिख को अपना एक वोट देने का अधिकार समान रूप से प्राप्त था, चाहे वह अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित। इतिहास में काफी लम्बे समय के बाद 'सार्वभौम मताधिकार' का यह प्रथम उदाहरण है। ग्रीस में भी 'सार्वभौम मताधिकार' लागू किया गया था, परन्तु वहाँ गुलामों को मत देने का अधिकार नही दिया गया था। अतः मात्र 20% जनता को हीं मत देने का अधिकार प्राप्त था, चूँकि शेष 80% गुलाम थे। जबकि सिख धर्म में गुलामी की कोई अवधारणा नहीं थी, बल्कि इसे प्रतिबंधित किया गया था। अतः प्रत्येक वयस्क सिख एक मतदाता था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सार्वभौम मताधिकार को सर्वप्रथम सिख धर्म में ही गुरुद्वारा प्रमुख के निर्वाचन हेतु लागू किया गया।
सिखों के अंतिम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने इसे एक औपचारिक परंपरा बना दी। ग्राम गुरुद्वारा से निर्वाचित प्रतिनिधि हीं अन्य उच्च सिख धार्मिक अधिकारियों की नियुक्ति करते थे। इस प्रकार शीर्ष सिख धर्माधिकारी भी अप्रत्यक्ष रूप से सिख जनता द्वारा हीं निर्वाचित होते थे, न कि उनकी नियुक्ति होती थी। आगे चलकर अमृतसर का स्वर्ण मंदिर उच्च सिख धर्माधिकारियों का मुख्य केंद्र बन गया। अतः यह परंपरा आरम्भ हो गयी कि ग्रामीण सिख गुरुद्वारा प्रमुख का निर्वाचन करेंगे, तथा गुरुद्वारा प्रमुख स्वर्ण मंदिर के प्रमुख का निर्वाचन करेंगे। किन्तु स्वर्ण मंदिर के प्रमुख का निर्वाचन पूर्णतः एक औपचारिक रूप से नियमबद्ध प्रक्रिया नही थी।
निर्वाचन प्रणाली ने सिखों को मुगलों तथा अफगानों की तुलना में अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। किन्तु सिखों की शक्ति अंगेजों की तुलना में 1/10 वाँ भाग भी नहीं हो सकी। ऐसा क्यों? क्योंकि ब्रिटेन में पादरी की नियुक्ति प्रधान मंत्री तथा सांसदों द्वारा गठित बोर्ड करता था, प्रधान मंत्री का निर्वाचन सांसद करते थे, तथा सांसदों का निर्वाचन लगभग 5% जनता द्वारा किया जाता था। साथ हीं ज्यूरी सिस्टम 100% वयस्क जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करता था। जबकि सिख धर्म में हालाँकि गुरुद्वारा प्रमुख का तो निर्वाचन होता था किन्तु राजा निर्वाचित न होकर वंशानुगत या कुछ खास लोगों के अल्पमत से हीं चुना जाता था। सिख धर्म में राजा के पद के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया को लागू नही किया जा सका। क्यों? क्योंकि राज्य प्रमुख का निर्वाचन बिना ज्यूरी प्रणाली एवं बिना राइट टू रिकॉल के होने से जनतंत्रात्मक परिस्थितियों से पलायन और आगे चलकर जिम्मेदारियों से पलायन को बढ़ावा मिलता है।
अंग्रेजों ने आध्यात्मिक जीवन के साथ- साथ सांसारिक जीवन में भी लोकतान्त्रिक प्रणाली लागू की। अर्थात अंग्रेज लोकतान्त्रिक परम्पराओं का पालन करते थे।
1860 के दशक के बाद निर्वाचन प्रणाली में कुछ कमियां आयीं। यद्दपि स्थानीय गुरुद्वारा प्रमुख निर्वाचित होते थे, तथापि उच्च धर्माधिकारियों की नियुक्ति संभ्रांत वर्ग द्वारा होने लगी। सिख संभ्रांत वर्ग को अंग्रेजों द्वारा ठेके प्राप्त होते थे, और इसलिए वे अंग्रेजों के प्रभाव में थे। यहाँ तक कि अंग्रेजों ने स्वर्ण मंदिर के महंत के तौर पर कुछ ऐसे हिन्दूओं को भी नियुक्त कर दिया था जो सिख नही थे। इस प्रकार स्वर्ण मंदिर के उच्च धर्माधिकारी अंग्रेजों के समर्थक थे। स्थानीय सिख गुरुद्वारा प्रमुख निर्वाचित होते थे, इसलिए उनमें भारत समर्थक तथा ब्रिटिश विरोधी प्रवृत्ति दिखती थी। अतः स्वर्ण मंदिर के उच्च धर्माधिकारियों तथा स्थानीय गुरुद्वारा प्रमुखों का आपस में हीं टकराव बढ़ने लगा। तथा यह टकराव तब गम्भीर रूप से सामने आया जब जलियांवाला बाग़ नरसंहार के बाद उच्च सिख धर्माधिकारियों ने जनरल डायर को सम्मानित किया। उनके इस निर्णय का बड़े पैमाने पर आलोचना एवं विरोध गुरुद्वारा प्रमुखों तथा सम्पूर्ण सिख समुदाय ने किया। उच्च धर्माधिकारियों ने यह निर्णय अंग्रेजों तथा कुछ मुट्ठीभर सिख- हिन्दू संभ्रांत व्यक्तियों, जिन्हे अंग्रेजों से ठेके प्राप्त होते थे, के प्रभाव में आकर लिया था। यह स्पष्ट है कि जालियांवाला बाग़ नरसंहार के बाद जनरल डायर की गम्भीर आलोचना हुई, जिसके कारण वह भारत में कुछ सम्मान प्राप्त करना चाहता था। अतः उसने सिख- हिन्दू संभ्रांत वर्ग को प्रभावित किया ताकि वे स्वर्ण मंदिर के महंतों से उसे सम्मानित करने को कहें। तथा सचमुच स्वर्ण मंदिर के महंतों ने जनरल डायर को सम्मानित किया। सिख छात्र, स्थानीय गुरुद्वारा प्रबंधक तथा लगभग सम्पूर्ण सिख समुदाय ने इन महंतों को निष्कासित करने की मांग की।
उच्च धर्माधिकारियों के निर्वाचन की प्रणाली को पुनः लागू करने की मांग सिख समुदाय में जोर पकड़ने लगी। इस संवेगपूर्ण मांग के काफी सशक्तता से उभरने के कारण अंग्रेजों ने सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम (SGPC Act) लागू किया, जिसके द्वारा गुरुद्वारों में पूर्ण लोकतान्त्रिक व्यवस्था आई। इस अधिनियम के अनुसार सिखों का अपना एक अलग चुनाव आयोग होता है। प्रत्येक वयस्क सिख एक पंजीकृत मतदाता होता है। कुछ वर्षों के अंतराल पर चुनाव कराये जाते हैं, जिनमें सिख मतदाता स्थानीय गुरूद्वारे के समिति सदस्यों का निर्वाचन करते हैं। स्थानीय समिति सदस्य राष्ट्रीय स्तर पर समिति सदस्यों, अकाल तख़्त के प्रमुख आदि को निर्वाचित करते हैं। समिति के सदस्य गुरुद्वारा प्रमुख, रागी आदि की नियुक्ति करते हैं। पुनः अगले समिति सदस्य भी निर्वाचित होते हैं। इनमें से किसी का कार्यकाल आजीवन नही होता, तथा एक हीं व्यक्ति के बार बार निर्वाचन को भी तरजीह नही दी जाती। साथ हीं नए सदस्य ज्यादातर पूर्व सदस्यों के रिश्तेदार नही होते, जब तक कि इनका स्वयं का समाज में उच्च सम्मानित स्थान न हो। अतः गुरुद्वारा प्रमुख का कार्यकाल आजीवन नही होता, तथा इनमें उत्तराधिकार नही पाया जाता।
इस प्रकार यह हिन्दू मंदिरों से बिलकुल विपरीत है, जहाँ कि उत्तराधिकार एवं आजीवन कार्यकाल एक नियम बन चुका है। चूँकि गुरुद्वारा में आजीवन कार्यकाल तथा उत्तराधिकार नही होता, अतः इनके ट्रस्टियों एवं व्यवस्थापकों में दान में मिले धन की जमाखोरी की प्रवृत्ति नही पाई जाती। अतः जो भी दान आता है, वो सब वे सामुदायिक कल्याण के कामों जैसे गरीबों के लिए भोजन व औषधि, सबके लिए शिक्षा, हथियार प्रयोग आदि में खर्च होता है।
गुरुद्वारा प्रबंधक का निर्वाचन होने तथा उनके कार्यकाल के आजीवन नही होने की प्रणाली ने सिख धर्म को इतना सशक्त बना दिया कि वे मुगलों, अफगानों आदि को रोक सके। लेकिन राजनीति में सिख इस निर्वाचन प्रणाली को लागू नही कर पाये। जबकि अंग्रेजों ने इसे अपने यहाँ राजनीति में भी लागू किया। साथ हीं चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड के माध्यम से चर्चों में 'लोकप्रिय मत का अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व' को भी लागू किया था । अतः ब्रिटिश सिखों की तुलना में अधिक शक्तिशाली थे, और इसलिए वे सिखों को पराजित कर पाये।
हिन्दू मंदिरों ने मंदिरों की व्यवस्था के लिए सिख मॉडल क्यों नही अपनाया?
सिखों के विश्वास तथा मंदिरों के प्रबंधन के तरीके आध्यात्मिक थे। मंदिरों के प्रबंधन के तरीके हिन्दुओं को ऐसे ढंग से बताये जा सकते थे जो उनके द्वारा स्वीकार्य हो। किन्तु कई आध्यात्मिक विश्वास, जैसे मूर्ति पूजा को महत्व नही देना, अधिकांश हिंदुओं के लिए स्वीकार्य नही थे। अतः यहाँ मैं यह कहना चाहूंगा कि यदि (1) हिंदुओं के सामने सिखों के मंदिर व्यवस्था के अच्छे तरीकों का वर्णन किया जाये, (2) तथा यदि उन्हें मंदिर व्यवस्था के ये अच्छे तरीके अपनाने को कहा जाये (3) साथ हीं उन्हें अपने धार्मिक विश्वासों तथा रीति रिवाजों को बदलने के लिए नही कहा जाये तो सम्भव है कि ये मंदिर व्यवस्था सम्बन्धी अच्छे तरीके हिंदुओं के लिए भी स्वीकार्य बन जाएँ।