Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate
भूटान के नागरिक एक प्रकार की भ्रामक ख़ुशी के साथ जी रहे हैं। कैसे? क्योंकि भूटान के पास हथियार उत्पादन कि क्षमता नही है, और इसलिए एक दिन इसका अंत भी एक और इराक की तरह होगा।
कई लेखों में दावा किया गया है कि ख़ुशी के मापदंड पर भूटान सर्वोच्च स्थान पर है। लेकिन गौर से देखें तो यह सारी प्रसन्नता महज एक भ्रम है। चूँकि भूटान के पास लगभग शून्य हथियार उत्पादन क्षमता है। अतः यह चीन तथा मिशनरियों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा समय समय पर किये जाने वाले आक्रमण से बचने के लिए भारत पर बहुत ज्यादा निर्भर है। स्वयं भारत के पास भी हथियार निर्माण क्षमता उच्च कोटि की नही है। यदि भूटानी इस तथ्य को स्वीकार करके अपनी हथियार उत्पादन क्षमता नही बढ़ाते तो एक दिन उनका हश्र भी इराक या तिब्बत जैसा या उससे भी बुरा होने वाला है।
भूटानी इसलिए खुश हैं क्योंकि उन्हें पता ही नही है कि एक अच्छे व समृद्ध जीवन के विभिन्न आयामों पर विश्व के अन्य देशों की तुलना में उनकी क्या स्थिति है। उदहारण के लिए भूटान में मृत्यु दर 44/ 1000 है, जबकि अमेरिका में 6/ 1000, कनाडा में 5/ 1000, क्यूबा में 5/ 1000, तथा चीन में 15/ 1000 है। इसी प्रकार जन्म पूर्व मृत्यु दर भी क्यूबा, चीन आदि की तुलना में बहुत अधिक है, पश्चिमी देशों की तो बात ही छोड़ दीजिये। खाद्दान्न का अभाव नही है, क्योंकि प्रति व्यक्ति भूमि वितरण दर उच्च है। जनसँख्या घनत्व भी मात्र 18/ sqkm है (जबकि भारत में 377/ sqkm है)। पानी और धूप बहुतायत में उपलब्ध हैं। इसलिए घास, अनाजों आदि जैसे शाकाहारी भोजन के साथ साथ मांस आदि मांसाहारी भोजन भी प्रचुरता में उपलब्ध हैं। कल्याणकारी राज्य की प्रकृति के चलते अधिकांश लोगों के जीवन में स्थायित्तव है।
लेकिन इन सबके बावजूद उद्द्योग लगभग शून्य है। तथा यदि हथियार उत्पादन की बात करें तो हम उससे भी बड़ा शून्य पाते हैं। गणित व विज्ञान की शिक्षा का स्तर भी पिछड़ा है, क्योंकि विगत का समृद्ध वर्ग ही शिक्षा का प्रसार करना नहीं चाहता था। मालूम होता है कि तत्कालीन नेपाल नरेश ने यह महसूस कर लिया है कि भूटान काफी पिछड़ रहा है। अतः अब वे कुछ हद तक शिक्षा के प्रसार के प्रयास कर रहे हैं। किन्तु अभी भी यह बहुत कम है।
अतः यदि भूटानी जल्द से जल्द इस वास्तविकता से अवगत नही होते, तो उनका विनाश निश्चित है। जो कि इराक या तिब्बत जैसा या उससे भी बुरा होने वाला है।
हम भी इसके लिए कुछ अधिक नही कर सकते। भारत में भी हमारे पास अनेक समस्याएं हैं। हम सिर्फ इस कहानी से सीख ले सकते हैं कि हथियार उत्पादन की क्षमता के अभाव में सारी सुख सुविधाएँ बेकार हैं। हम चाहे कितनी हीं अच्छी से अच्छी फ़िल्में बना लें, खेलों में आगे हों, अतिसक्रिय एनजीओ चलाते हों, तथा इन सब चीजों से खुश हो जाएँ। किन्तु यदि देश हथियारों का उत्पादन स्वयं नही कर रहा तो वस्तुतः वह प्रतीक्षा कतार में खड़ा एक और इराक बन जायेगा।