Pawan Jury BhilwaraRj
यह इत्तिफाक नहीं है कि - जितने भी लोगो ने मोहन दास की चपेट में आकर आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनमें से किसी भी व्यक्ति ने वोट वापसी, जनमत संग्रह आदि क़ानून प्रक्रियाओं के बारे में अपनी पूरी जिन्दगी में कभी मुंह नही खोला। जबकि मोहन एवं जवाहर लाल की चपेट से बाहर रहकर लड़ने वाले ज्यादातर क्रांतिकारी वोट वापसी कानूनों के समर्थक थे।
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अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल, महात्मा भगत सिंह जी, महात्मा चन्द्रशेखर आजाद के बाद अब महात्मा विजय सिंह जी पथिक भी इस सूची में शामिल है, जो वोट वापसी एवं जनमत संग्रह क़ानून प्रक्रियाओ के बारे में लिख लिख कर नागरिको तक यह जानकारी पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे।
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ऐसा लगता है कि, 1919 में भारत में वोट देने का क़ानून आने एवं पहली बार चुनाव होने के बाद अंग्रेजो से लड़ने का ड्रामा करने वाले एवं वास्तव में लड़ने वालो के बीच इस विषय को लेकर स्पष्ट विभाजन रेखा खिंच गयी थी - वोट वापसी के समर्थक गोरो के खिलाफ थे और गोरो का साथ देने वाले सभी नेता वोट वापसी के विरोधी।
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