Pawan Jury BhilwaraRj
19 वीं शताब्दी में एक राजनैतिक "विचारक" हुआ था जिसने वर्ग संघर्ष, पूंजीवाद, समाजवाद आदि की व्याख्या करते है हुए कई सिद्धांतो का प्रतिपादन किया, और समाज में व्याप्त भुखमरी, गरीबी, शोषण, उत्पीड़न आदि सभी समस्याओ का समाधान "समाज के सभी संसाधनों का सभी में बराबर विभाजन करना" बताया।
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इस आदमी की रुचि अपने देश में कम एवं वैश्विक क्रांति में ज्यादा थी। इसके विचारो को दुनिया के सभी देशो में प्रकाशित किया गया और उन्हें पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। दुनिया में आपको एक भी ऐसा ग्रेजुएट नहीं मिलेगा, जिसने इस आदमी के विचारो को नहीं पढ़ा हो !! और पूरी दुनिया में ऐसा आपको कोई मुल्क नहीं मिलेगा जहाँ पर इस आदमी के विचारों को लेकर राजनैतिक दल नहीं बनाए गए हो।
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मतलब इस आदमी के विचार दुनिया के हर राजनैतिक-सामाजिक प्राणी तक पहुंचे और इसके विचारो को लेकर भर भर जागरूकता आई। इसके विचारों से प्रभावित समूहों ने धरने लगाए, जुलुस निकाले, आगजनी की, सशस्त्र संघर्ष किया, सेनाएं खड़ी की, सफल क्रांतियाँ और आन्दोलन किये, राजनैतिक पार्टियों का गठन किया और उन पार्टियों /समूहों ने दुनिया के कई देशों की सत्ताओ पर कब्ज़ा भी किया !!
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लेकिन इस आदमी का विचार (समाज के सभी संसाधनों का सभी में बराबर विभाजन करना) दुनिया में कहीं भी लागू नहीं हो सका !! किसी भी देश में नहीं, किसी भी राज्य में नहीं, किसी छोटे से जिले में भी नहीं, और किसी छोटे से गाँव तक में नहीं !!!
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पिछले 150 वर्षो से राजनैतिक-सामजिक क्षेत्र का यह सबसे अधिक डिस्कस किये जाने वाला विचार है। दुनिया की ऐसी कोई लाइब्रेरी नहीं है, जहाँ के राजनैतिक शेल्फ में इस आदमी के विचारो की व्याख्या करने वाली पुस्तक न हो। तो इस आदमी के "राजनैतिक विचार" कभी भी लागू क्यों नहीं हो सके ?
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मार्क्स पहले दिन से जानता था कि उसके राजनैतिक "विचार" लागू नहीं किये जा सकते है। यह व्यवहारिक रूप से संभव नहीं था। किन्तु वह और इसके प्रायोजक यह भी जानते थे, कि पूरी दुनिया के राजनैतिक कार्यकर्ता यह समझने में नाकाम रहेंगे कि -- इन्हें लागू ही नहीं किया जा सकता।
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इस तरह मार्क्स एवं इसके प्रायोजको ने पूरी दुनिया के राजनैतिक कार्यकर्ताओ की 6 पीढ़ियों का जीवन एवं समय एक न हासिल किये जा सकने वाले लक्ष्य का पीछा करने करने में बर्बाद कर दिया।
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और आज भी पेड मीडिया के प्रायोजक इस तरीके का इस्तेमाल कार्यकर्ताओ को भोट करने में करते है। वे राजनैतिक समस्याओं के समाधान के लिए नए नए "विचारों" का बढ़ावा करते रहते है, और आज भी असूचित कार्यकर्ता उनके इस जाल में फंसते है, क्योंकि उन्हें इसका अंतर करना नहीं आता कि, अमुक "विचार" को लागू किया जा सकता है या नहीं !!!
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क्या आप इस बारे में जानते है कि, इसका पता कैसे लगाया जाता है कि अमुक "विचार" लागू किया जा सकता है या नहीं ? यदि आपको इस तरीके के बारे में नहीं पता तो ज्यादातर से भी ज्यादातर संभावना है कि इसी तरह का कोई "न लागू किया जा सकने वाला विचार" आपके दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर लेगा।
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देखा करीब से तो वो मौजे सराब थी,
जिस आब जू का चर्चा बशर दूर दूर था।
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सराब - नखलिस्तान, मरीचिका, रेगिस्तान में पूर्ण आंतरिक परावर्तन की घटना के कारण झील दिखने का भ्रम होना। आब जू - पानी का दरिया।
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