Pawan Jury BhilwaraRj
अमेरिका में जब चुनाव होते है तो चुनाव आयोग प्रत्येक मतदाता को अपने खर्चे से एक पेम्पलेट भेजता है, जिसमें उम्मीदवारो के बारे में जानकारी होती है। इस जानकारी में उम्मीदवार का नाम, पार्टी का नाम, फोटो, एजेंडा, वादे आदि शामिल होते है। यह जानकारी उम्मीदवार द्वारा चुनाव आयोग को प्रेषित की जाती है, और चुनाव आयोग उसमें बिना छेड़छाड़ के इसे प्रकाशित करता है।
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इस तरह अमेरिका में जब कोई छोटा आदमी किसी छोटी पार्टी से या निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ता है, और यदि उसके पास खर्च करने के लिए पैसा और प्रचार करने वाले कार्यकर्ता नहीं है, लेकिन यदि उसने निर्धारित क्राइटेरिया मीट कर लिया है तो उसके चुनाव क्षेत्र में प्रत्येक मतदाता तक उसके बारे में "प्राथमिक" जानकारी पहुँच जाती है। भारत में "प्राथमिक" जानकारी पहुँचाने का पूरा भार प्रत्याशी पर ही होता है। इस वजह से छोटे उम्मीदवार प्रचार में पिछड़ जाते है, एवं बड़े उम्मीदवार संसाधनों की प्रचुरता के कारण बढ़त बना लेते है।
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उदाहरण के लिए, 2019 में मैंने जब लोकसभा चुनाव लड़ा था तो मेरे पास प्रचार के लिए 8 दिन का समय था। मेरे लोकसभा क्षेत्र में 20 लाख मतदाता है। अन्य साथी कार्यकर्ताओ के सहयोग से हमने 10 हजार पर्चे छपवाकर उन्हें नागरिको में वितरित किया। सीमित समय में सीमित बजट एवं सीमित संसाधनों के कारण लगभग 20 हजार मतदताओ तक मेरा पेम्पलेट पहुँचा, और अनुमानित 75 हजार नागरिको तक राईट टू रिकॉल पार्टी का एवं मेरा नाम पहुँच पाया होगा। 20 लाख में से 19 लाख मतदाता मेरे मुद्दों आदि से पूरी तरह से अपरिचित रहे।
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इससे क्या अंतर आता है ?
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बड़ी पार्टियों के पास इतने संसाधन है कि वे निर्वाचन क्षेत्र के सभी मतदाताओ तक पहुँच जाते है। मेरे जैसे छोटे उम्मीदवार के पास उतने संसाधन नहीं होते। मैं लगभग एक लाख मतदाताओ तक पहुँच पाया और एवज में मुझे 13,000 वोट मिले। यदि चुनाव आयोग उम्मीदवारों के बारे में "प्राथमिक" जानकारी पहुचाने का भार ले लेता है तो छोटे उम्मीदवारों के बारे में जानकारी लगभग समस्त मतदाताओ तक पहुंचेगी और उनका वोट शेयर बढ़ जाएगा। वोट शेयर बढ़ने से ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवार चुनावों में आना शुरू करेंगे और बड़ी पार्टियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
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तो अमेरिका में भी किसी भी व्यक्ति को चुनाव लड़ने की छूट है, और भारत में भी किसी भी व्यक्ति को चुनाव लड़ने की छूट है। लेकिन अमेरिका में जो छोटे प्रत्याशी निर्धारित मापदंड को पूरा कर लेते है उनके बारे में "प्राथमिक" जानकारी पहुँचाने का काम चुनाव आयोग करता है, जबकि भारत में सभी उम्मीदवारो को यह काम ख़ुद ही करना होता है। और इस वजह से छोटे उम्मीदवार चुनाव में खड़े तो हो पाते है, किन्तु मतदाताओ तक पहुँच नहीं पाते।
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(*)हालाँकि, अमेरिका में भी सभी छोटे उम्मीदवार निर्धारित मापदंड पूरा नहीं कर पाते, लेकिन कुछ छोटे उम्मीदवार इसे पूरा कर लेते है। विभिन्न जिलो एव राज्यो में निर्धारित मापदंड भिन्न है)
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बड़ी पार्टियों को अतिरिक्त लाभ पहुँचाने और छोटे उम्मीदवारों की दबाने की नीति के इस अंतर को पेड राजनीती शास्त्रियों ने "लोकतंत्र" के आवरण से ढक के रखा हुआ है। क्योंकि पेड राजनीती शास्त्रियों के अनुसार भारत में भी लोकतंत्र है, और अमेरिका में भी लोकतंत्र है !! और लोकतंत्र के नाम पर उन्होंने छोटे उम्मीदवारों की गर्दन मरोड़ने के लिए कितने क़ानून छापे हुए है इस पर 100 पेज की पूरी किताब लिखी जा सकती है !!!
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अमेरिकी चुनावों में चुनाव आयोग द्वारा वितरित किये जाने वाले ऐसे 92 पृष्ठ के पेम्पलेट का पीडीऍफ़ यहाँ देख सकते है -- <https://kingcounty.gov/~/media/depts/elections/how-to-vote/voters-pamphlet/2016/08/201608-edition-3.ashx?la=en>
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