Pawan Jury BhilwaraRj
प्रश्न : क्या कॉलेज या यूनिवर्सिटी में प्रार्थना न करवाने के पीछे भी इन्ही मिशनरीज का हाथ हैं। क्यूंकि अगर उस स्तर पर लोगो से हिंदू धर्म की बात छुड़वा दी जाए तो उसको कन्वर्ट करना आसान होगा।
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मुझे इस बारे में सटीक जानकारी नहीं है कि, आजकल स्कूलों / कॉलेज वगेरह में सामूहिक प्रार्थना करवाई जाती है या नहीं और यदि करवाई जाती है तो इन प्रार्थनाओ के शब्द क्या है। हमारे समय में सभी विद्यालयों में सामूहिक प्रार्थना एक अनिवार्य अंग था। सभी धर्मो के छात्र ये प्रार्थनाएँ करते थे। और जहाँ तक मुझे याद है प्रार्थनाओं के शब्द सामाजिक / सामुदायिक सौहार्द को बढ़ाने वाले होते थे।
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यदि अब प्रार्थनाएं बंद कर दी गयी है तो इससे सामुदायिक भाईचारे में कमी आएगी। क्योंकि इस तरह की सामूहिक गतिविधियाँ आपसी भाईचारे को मजबूत बनाती है।
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समाज को कई हिस्सों में बांटना एवं उनमें जाति, धर्म, संस्कृति के आधार पर अलगाव पैदा करना बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पुराना एजेंडा है। जैसा कि आप देख ही रहे है कि, उन्होंने पेड मीडिया का इस्तेमाल करके भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में वैमनस्य के बीज बो दिए है, और आज लगभग प्रत्येक वर्ग (जाति, धर्म, संस्कृति के आधार पर) अपना झुण्ड बनाकर किसी न किसी अन्य वर्ग के खिलाफ 24*7 विष वमन कर रहा है।
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किसी देश को तोड़ने के लिए यदि आपको सबसे गहरा आघात करना हो तो सबसे प्रभावी तरीका यह है कि अमुक देश में रहने वाले विभिन्न समुदायों के बीच इतना अविश्वास पैदा कर दो, कि वे एक दुसरे को दुश्मन की तरह देखने लगे। और फिर अमुक देश खुद ही अंदर ही अंदर लड़ मर कर ख़त्म हो जाता है।
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हिन्दुओ का एक झुण्ड मुसलमानों को देश से बाहर खदेड़ने पर आमादा है, दलितो के कुछ झुण्ड अगड़ो को देश से बाहर खदेड़ना चाहते है, कुछ अगड़ो के झुण्ड दलितों को देश से बाहर भेजना चाहते है, कुछ झुण्ड ब्राह्मणों को देश से निकालने पर काम कर रहे है, और कुछ झुण्ड बनियों को देश निकाला देना चाहते है। इन सबके पास "अपने अपने सत्य और तर्क" है !!
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कुछ सालों बाद हम ऐसे मंजर के गवाह बनेंगे जब कोई झुण्ड पार्किंग में खड़ी आपकी गाड़ी को सिर्फ इसीलिए जला जाएगा क्योंकि उस पर जाट, दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण या जैन का प्रतीक बना हुआ था। और आप कभी जान नहीं पायेंगे कि यह क्यों किया गया।
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FDI द्वारा किया गया यह सबसे बड़ा आघात है, और वैमनस्य का यह पूरा प्रोपेगेंडा पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित है !! वो पूरे देश में बारूद बिछा रहे है, और ट्रिगर करने के साथ ही भारत जलने लगेगा।
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जूरी कोर्ट लाये बिना इस विघटन को काबू नहीं किया जा सकता। जूरी कोर्ट आने के 3 महीने के अन्दर ही जाया तौर पर वैमनस्य फ़ैलाने वाले इन झुंडो पर लगाम आ जायेगी, क्योंकि जूरी उन लोगो की तम्बीह करना शुरू करेगी जो पहचान की राजनीती (Identity Politics) के नाम पर यह तंदूर दहका रहे है। जजों को इस विघटनकारी प्रक्रिया को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि वे पेड मीडिया के प्रयोजको की कठपुतली है।
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मेरे छात्र जीवन के दौरान गाई जाने वाली कुछ प्रार्थनाएं, जिनके बोल जैसे मुझे याद है :
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(1) दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना
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(2) जयति जय जय माँ सरस्वती...
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(3) तू ही राम है तू रहीम है, तू करीम कृष्ण खुदा हुआ
तू ही वाहे गुरु तू यीशु मसीह हर नाम में तू समा रहा
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(4) अस्तो माँ सद गमय...
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सरस्वती वंदना से लेकर सभी तरह की प्रार्थनाएँ होती थी, और सभी धर्मो के छात्र इन्हें करते थे।
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1989 से पहले तक भारत में जातीय, साम्प्रदायिक वैमनस्य काफी कम था, या कम से कम यह मुख्यधारा की राजनीती में नहीं था, और इसे सामाजिक स्वीकार्यता नहीं थी। साथ ही विभिन्न समुदायों में अविश्वास का माहौल नहीं था।
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कोंग्रेस ने भारत में इस्लामिस्ट के बढ़ते हुये “गलत प्रभाव” को कम करने के लिए आवश्यक क़ानून (टू चाइल्ड लॉ, बांग्लादेशी अवैध निवासियों को खदेड़ना, पुलिस-अदालतों को ठीक करने के लिए जूरी कोर्ट) नहीं छापे, जिसकी वजह से इस्लाम के बढ़ते गलत प्रभाव में वृद्धि हुयी और साम्प्रदायिक आधार पर राजनीति की जमीन में उर्वरता बढ़ गयी।
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और इसका राजनैतिक फायदा बीजेपी=आरएसएस ने उठाया। बीजेपी =आरएसएस साम्प्रदायिक राजनीती में खुद को स्थापित इसीलिए कर पायी क्योंकि 1990 से अमेरीकी-ब्रिटिश धनिको का प्रभाव बढ़ना शुरू हो गया था, और उन्होंने साम्प्रदायिक, जातीय वैमनस्य फैलाने वाले मुद्दों को पेड मीडिया की सहायता से प्रमोट करना शुरू किया।
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1989 से पहले तक बीजेपी=आरएसएस का हिन्दू, हिंदुत्व आदि से कोई ज्यादा लेना देना नहीं था। आप 1952 से 1985 तक आरएसएस=बीजेपी का राजनैतिक घोषणा पत्र देख सकते है, उसमें आपको हिन्दू, हिंदुत्व आदि का कुछ उल्लेखनीय नहीं मिलेगा।
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1991 से भारत की सभी मुख्यधारा की पार्टियों एवं शीर्ष नेताओं ने मिशनरीज को जॉइन कर लिया और वे मिशनरीज के विस्तार के लिए काम करने लगे। आज पेड मीडिया पर निर्भर सभी पार्टियों के शीर्ष नेता खुले तौर पर मिशनरीज के लिए काम कर रहे है।
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कुल मिलाकर , 1991 से अब तक हम काफी गहरे धंस चुके है, और यह दलदल FDI की आवक के अनुपात में बढ़ता जाएगा। दो क़ानून गेजेट में छापकर इस विभाजनकारी प्रक्रिया को रोका जा सकता है
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(1) जूरी कोर्ट #JuryCourtDrartRrp
(2) वोइक #WoicRrp
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और चुनाव जीतने के लिए मिशनरीज पर निर्भर होने के कारण भारत की सभी पेड मीडिया पार्टियाँ इन कानूनों के खिलाफ है।
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