Pawan Jury BhilwaraRj
old post (2018)
Pawan Jury BhilwaraRj:
**सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न देने के पीछे क्या कारण थे?**
.
शीतल पेय कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में क्रिकेट को बढ़ावा देना चाहती है ताकि ज्यादा से ज्यादा छात्र विज्ञान-गणित विषयों में आपने आप को खपाने की जगह क्रिकेट के मैदानों की और दौड़ लगाए। अत: क्रिकेट को प्रमोट करने के लिए सचिन को भारत रत्न दिया गया। लेकिन सचिन ने जिस तरह से यह अवार्ड लपका उसने इस पुरस्कार की रही सही गरिमा भी गिरा दी।
> सब के जैसे होकर भी बाइज़्ज़त है बस्ती में,
> कुछ है लोगों का सीधापन कुछ है अपनी एय्यारी भी
1. तब भारत रत्न खेल की श्रेणी में नही दिया जाता था । सचिन चाहते थे कि चूँकि वे भगवान है अतः इस तरह के नियम उन पर लागू नही होने चाहिए । अतः सचिन को भारत रत्न देने के लिए रातों रात इस पुरस्कार में खेल की श्रेणी को लागू किया गया ।
1. सचिन अपने सन्यास समारोह को भव्य एवं यादगार बना देना चाहते थे । अतः उन्होंने तत्काल रूप से कोंग्रेस ज्वाइन की और खुले आम भारत रत्न ख़रीद लिया। सचिन को भारत रत्न वैसे भी मिल जाता था, लेकिन वे इंतज़ार नही करना चाहते थे। उन्होंने भारत रत्न लपकने के लिए पूरे देश के सामने इस पुरस्कार की रही सही गरिमा को भी नष्ट कर दिया। उन्होंने यह पुरस्कार बेहद अशोभनिय ढंग से झपटा , जिसकी कोई ज़रूरत नही थी।
1. सचिन को फ़रारी कम्पनी ने २००२ में एक कार गिफ़्ट की थी । इम्पोर्टेड कार पर सचिन को १ करोड़ इम्पोर्ट ड्यूटी चुकानी थी । पर सचिन का मानना था कि वे भगवान है अतः उन्हें इसमें छूट मिलनी चाहिए । सरकार ने उन्हें बताया कि ड्यूटी तब माफ़ की जाती है जब यह पुरस्कार आपको किसी प्रतियोगिता में मिला हो । लेकिन यह एक प्राइवेट गिफ़्ट है अतः आपको ड्यूटी चुकानी होगी । सचिन ने तब वित्त मंत्री मेजर जसवंत सिंह से कहा कि शायद आप टीवी बराबर नही देखते है, अतः आपको यह पता नही है कि मैं भगवान हूँ । यदि मौजूदा नियमों के तहत ड्यूटी माफ़ नही हो सकती तो आप अपने नियम बदलिए ।
1. जसवंत सिंह जी ने तब क़स्टम एक्ट में एक संशोधन [ 25 (3) ] तुरंत किया, जिसके अनुसार यदि सरकार चाहे तो किसी विशेष मामले को देखते हुए पुरस्कार पर ड्यूटी की छूट देने के सम्बंध में अपने विवेक से फ़ैसला ले सकती है । इस तरह बिकाऊ सचिन तेंदुलकर को कर दाताओ से वसूले गए पैसे में से १ करोड़ १३ लाख की राहत दी गयी । यह राहत उन्हें इसीलिए नही दी गयी क्योंकि उनके पास ड्यूटी चुकाने के पैसे नही थे, बल्कि इसीलिए दी गयी क्योंकि वे भगवान है, अतः नियमो से ऊपर है । और सचिन ने उपहार में मिली इस कार का क्या किया ? उन्होंने कुछ वर्षों बाद इसे सूरत के एक व्यापारी को बेच दिया !
1. कपिल को भी इसी तरह से दो कारे गिफ़्ट में मिली थी, पर उन्हें सरकार ने एक धेले की भी छूट नही दी । उन्हें ड्यूटी के पूरे पैसे चुकाने पड़े । और गोल्फ़र अमरिंदर को जब गिफ़्ट में कार मिली तो उन्हें इसे विदेश में ही बेचना पड़ा !! क्योंकि सरकार ने ड्यूटी माफ़ नही की और ड्यूटी चुकाना वे वहन नही कर सकते थे । और अकोर्डिंग टू मीडिया, भगवान ये लोग थे नहीं। तो छूट देने की कोई वजह ही नहीं बनती !!
1. क्रिकेट मैच तो हमेशा से ही फ़िक्स थे लेकिन जब यह बात खुलकर सामने आयी कि अजहरूद्दीन, जडेजा समेत लगभग सभी खिलाड़ी मैच फ़िक्सिंग में शामिल है पर तब भी सचिन शक के दायरे से बाहर रहे ।
बहरहाल , इस बारे में मेरा प्रस्ताव है कि क्रिकेट को खेल की श्रेणी से निकाल दिया जाना चाहिए।
## क्रिकेट को क्यों खेल की श्रेणी से निकाल देना चाहिए ?
एक तर्क यह है कि -- "सरकार को सभी खेलो के साथ समान रूप से पेश आना चाहिए । क्रिकेट को खेल की श्रेणी से निकालना क्रिकेट के साथ सौतेला व्यवहार है"। किंतु मेरा मानना है कि क्रिकेट अन्य खेलो की तरह नही है । क्रिकेट का मामला अपवाद है ।
1. क्रिकेट कोई खेल नही है, यह एक बिज़नेस है । अतः सरकार इसे यदि खेल की श्रेणी से निकाल भी देगी तब भी पैड मीडिया एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इसे प्रोत्साहित करती रहेगी और यह चलन में बना रहेगा । क्योंकि यह खेल पैसा बनाता है जबकि अन्य सभी खेल पैसा गँवाते है ।
1. क्रिकेट में बेतहाशा सट्टे बाज़ी है, और हर सिरीज़ ख़त्म होते होते सैंकड़ों घर परिवार उजड़ जाते है । युवाओं को भी इस पर सट्टा लगाने की लत है । वे पैसा उधार करके रातों रात लखपति बनने के लिए सट्टा लगाते है और गले गले तक क़र्ज़ में डूब जाते है ।
1. अनिश्चितता खेल का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है । किंतु क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग एक अनिवार्य तत्व है जो कि इसे खेल नही रहने देता । अन्य खेलो में इस पैमाने पर फ़िक्सिंग नही है ।
1. क्रिकेट एक महँगा खेल है । बच्चों को क्रिकेट की लत लग जाती है और माता पिता को हैसियत न होने पर भी उन्हें खेल का सामान दिलाना होता है । एक बच्चे की किट पर लगभग 5-10 हज़ार का ख़र्च आता है। जबकि अन्य आउटडोर खेल सस्ते है, और किसी भी वर्ग के बच्चे इन्हें खेल सकते है ।
1. बाज़ार क्रिकेट को भुगतान करता है, अतः राज्य स्तर के खिलाड़ियों को भी मोटा पैसा एवं सुविधाएँ मिलती है । ( आज का मुझे मालूम नही है, किंतु १० साल पहले राज्य स्तर के जूनियर [१७ वर्ष से कम आयु ] खिलाड़ी को एक मैच का 4 हज़ार रुपया मिलता था जबकि हेंडबोल या होक़ी के खिलाड़ी को 150 रुपए मिलते थे । जूनियर क्रिकेटरों को तब 3 स्टार होटेल में ठहराते थे जबकि अन्य खेलो के खिलाड़ियों को धर्मशाला में )
1. यह सभी भुगतान बाज़ार करता है तो इसमें दख़ल नही दिया जा सकता । किंतु उस पर तुर्रा यह कि ज़िला स्तर पर सरकारें सम्मानित भी इन्ही खिलाड़ियों को कर देती है । अर्जुन, पद्म, भारत रत्न आदि एवार्ड अलग से है । यह सरकारी सम्मान और प्रोत्साहन अन्य खेल के खिलाड़ियों को बलात रूप से क्रिकेट की और ठेलता है । उन्हें लगता है कि हम बेवक़ूफ़ है जो क्रिकेट नही खेल रहे है । इस तरह क्रिकेट अन्य खेलो को खा रहा है । जब बाज़ार क्रिकेट के पीछे इतनी मजबूती से खड़ा है तो सरकार को चाहिए कि वह इसे पूर्ण रूप से बाज़ार के हवाले कर दे ।
1. और इस बात पर कोई बहस नही है कि जितने ज़्यादा युवा/बच्चे क्रिकेट खेलेंगे और देखेंगे देश को उतना ही नुक़सान होगा । बेरोज़गारी बढ़ेगी, आत्म हत्याएँ बढ़ेगी, अपराध में वृद्धि होगी और प्रतिभाशाली बच्चों का भविष्य बर्बाद होगा। अन्य खेल इस पैमाने पर हानि नही पहुँचाते ।
1. क्रिकेट के कारण युवा आज ऐसे लोगों को अपना हीरो बना कर रखे है जो कि वास्तविक अर्थों में अनुसरण करने लायक नही बल्कि बहिष्कार करने लायक है । आज के सभी क्रिकेट खिलाड़ी फिक्सर है, यानी वे कपटी, धूर्त, झूठे, मक्कार और भ्रष्ट है । सभी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंट है वो अलग से । मतलब एंटी नेशनल भी है । टके टके पर नीलाम होते है । और ये युवा पीढ़ी के आदर्श है । इतनी गंदगी अन्य किसी खेल में नही । एक बोलीवुड़ है और अब बोलीवुड़ की यह दूसरी ब्रांच और आ गयी है ।
1. क्रिकेट में जितना व्यापार, सट्टा और फ़िक्सिंग है सब विदेशियों एवं डी कम्पनी के नियंत्रण में है । इस तरह यह खेल जो रुपया बनाता है वह हमारे दुश्मन को मजबूत और देश को कमज़ोर करता है ।
इसीलिए मैं इस बात में मानता हूँ कि जिस तरह सभी प्रकार के नशों को एक श्रेणी में नही रख सकते उसी तरह क्रिकेट को अन्य सभी खेलो के समकक्ष नही रखा जा सकता । क्रिकेट शराब, तम्बाकू, अफ़ीम, भांग, कैफ़िन नही है, यह कोकीन बन चुकी है ।
इसीलिए मेरे मत में सरकार को चाहिए कि वह इसे खेल की श्रेणी से निकाल बाहर करे और क्रिकेट की मैच फ़िक्सिंग को क़ानूनी कर दे । इससे देश पर छाये इस नशे का काफ़ी हद तक शमन हो जाएगा ।
.
सरकार द्वारा इसके लिए निम्न कदम उठाये जाने चाहिए :
1. सरकारी स्कूल एवं कोलेजों में क्रिकेट प्रतियोगिताओं पर प्रतिबंध लगाया जाए ।
1. सरकार क्रिकेट संगठनों को किसी भी प्रकार की टेक्स रियायते न दे । और इन्हें खेल मैदान के लिए एक इंच भी भूमि आवंटित नही करे ।
1. क्रिकेट जब खेल की श्रेणी से बाहर हो जाएगा तो क्रिकेट खेलने वालों को अर्जुन, पद्म, भारत रत्न पुरस्कार मिलने और क्रिकेट खेलने की एवज़ में सरकारी नौकरी मिलने के रास्ते ख़ुद ही बंद हो जाएँगे ।
1. सरकारी संगठन, अर्ध सरकारी संगठन एवं सरकार द्वारा पोषित किसी भी संगठन पर क्रिकेट प्रतियोगिताए आयोजित करवाने या टीम उतारने पर प्रतिबंध लगे ।
1. जब क्रिकेट खेल की श्रेणी में नही रहेगा तो दिल्ली दूरदर्शन एवं आकाशवाणी क्रिकेट की ख़बरों एवं इसकी कमेंट्री का प्रसारण भी नही करेंगे । यदि तब भी करते है तो सरकार इन पर प्रतिबंध लगाए ।
1. ज़ीसटी की अधिकतम कर सीमा 28% है, अतः क्रिकेट की बोल, बेट, पैड आदि सभी पर 28% कर लगाया जाए । ( वैसे इस पर एक १०% का अलग से टेक्स "समय बर्बाद मनोरंजन कर" नाम से भी लगाया जा सकता है । पर मैं ऐसे कर को सपोर्ट नही करता )
1. सरकार मैच फ़िक्सिंग को क़ानूनी कर सकती है । मतलब यदि कोई व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि अमुक मैच फ़िक्स था, तो इस आरोप पर कोई एफ आइ आर नही दर्ज की जाएगी ।
इतना होने से क्रिकेट से देश व युवाओं को होने वाले नुक़सान की अच्छी ख़ासी भरपायी हो जाएगी । शेष जिन्हें क्रिकेट खेलना एवं देखना है वे निजी संसाधनों से अपना खेल सकते है । सरकार दख़ल नही करेगी । मतलब जिन्हें क्रिकेट खेलना व देखना है और जिन्हें दिखाना एवं खिलाना है वे ख़ुद के संसाधन ख़र्च करे देश पर बोझ न डाले ।
.
======+===