Pawan Jury BhilwaraRj
मिशनरीज जहाँ भी जाती है स्थानीय धर्म को तोड़ने के लिए धार्मिक परम्पराओं / रीतियों को उड़ाने के लिए तर्क (Logic) एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Approach) का इस्तेमाल करती है। और ज्यादातर मामलों में 'क्राइसिस ऑफ़ कोंशस' एवं 'क्राइसिस ऑफ़ फेथ'(*) से ग्रस्त युवा पेड मीडिया के इस दुष्प्रचार की चपेट में आ जाते है।
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तथ्य यह है कि, धार्मिक परम्पराओं / रीतियों आदि के पीछे कभी कोई लॉजिक या वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता, और न ही धार्मिक रीतियों के पीछे किसी लॉजिक को ढूँढने का प्रयास करना चाहिए। यदि आपने धार्मिक रीती रिवाज में तर्क एवं विज्ञान ढूंढना शुरू किया तो आपका पूरा का पूरा धर्म उड़ जाएगा, और आपके पास कुछ भी नहीं बचेगा।
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चूंकि हिन्दू धर्म की धार्मिक संस्थाओ का प्रशासन पहले से ही बेहद कमजोर है और इस वजह से हिन्दू धर्म का क्षरण हो रहा है, इस स्थिति में वैसे भी हिन्दू धर्म के पास उत्सवों में मनोरंजन एवं बेहिसाब धार्मिक रीतियों के सिवा कुछ भी नहीं है, जो इसे टिका के रख सके। जैसे जैसे धार्मिक रीतियों की खिल्ली उड़ाई जायेगी, समाज में इन रीतियों का पालन करने वालो को प्रतिगामी माना जाने लगेगा और वे इनका पालन करने में शर्म महसूस करने लगेंगे, और इस तरह सभी धार्मिक परम्पराएं / रीतियाँ चलन से बाहर हो जाएगी, और नतीजे में हिन्दू धर्म भरभरा कर ढह जाएगा।
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तो दीवाली पर आतिशबाजी करने न करने के बीच कोई लॉजिक मत ढूंढिए। आतिशबाजी सिर्फ इसीलिए कीजिये क्योंकि यह दीपावली नामक हिन्दू उत्सव की एक परम्परा है। दही हांडी या होली खेलने की वजह का विश्लेषण करने से परहेज कीजिये, इनमें सिर्फ इसीलिए हिस्सा लीजिये क्योंकि यह हिन्दू धर्म के उत्सव में धार्मिक जमाव बनाने का एक जरिया है। और रक्षाबंधन पर यह ज्ञान मत बांटिये कि सूत का एक कच्चा डोरा कैसे किसी की रक्षा कर सकता है।
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और जागरूक बुद्धिजीवियों से मेरा कहना है कि, जो नागरिक अपने धर्म की परम्पराओं का पालन कर रहे है उन्हें करने दीजिये, उन्हें रोकने का बीड़ा उठाकर खुद को हलकान मत कीजिये। यह बीड़ा पेड मीडिया ने पहले से उठा रखा है। और पेड मीडिया जितना एक घंटे में उठाकर फेंक देता है, उतना आप पूरी जिन्दगी लगाकर भी हिला नहीं पाओगे।
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(*) क्राइसिस ऑफ़ कोशंस : भारत में बहुधा पढ़े लिखे लोगो को एक मनोवैज्ञानिक बिमारी हो जाती है, जिसका नाम क्राइसिस ऑफ़ कोशंस है। कई लोग इसमें भी बारीकी से एक और बिमारी क्राइसिस ऑफ़ फेथ भी ढूंढ निकालते है। हालांकि इस बिमारी का रोगी अन्य व्यक्तियों की तरह ही आहार, निद्रा, भय मैथुन के सहारे ही जीता है, लेकिन खुद को बुद्धि के सहारे जीने वाला बुद्धिजीवी मानकर चलता है। इस रोग में व्यक्ति जागरूक दिखने एवं जागरूक करने के हल्ले में लम्बे लम्बे वक्तव्य देता है, और सामने वालो को बेवकूफ मानकर चलता है। और बहुधा इस बिमारी का अंत कॉफ़ी हाउस की बहसों में, आवारा औरतो की बाहों में, आत्महत्या में, या सरकारी नौकरी में होता है। (साभार : राग दरबारी से)
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