Pawan Jury BhilwaraRj
Pawan Jury BhilwaraRj:
[**हिन्दी भाषा के संवर्धन एवं वृद्धि हेतु कौन कौनसे प्रयास आवश्यक हैं?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8-%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82>)
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तकनिकी रूप से पिछड़े हुए देशो का भाषाई सरंक्षण एवं शुद्धता का **दुराग्रह **राष्ट्र को तकनिकी-सैन्य दृष्टि से निर्बल बना सकता है !!*
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भारत में कई कार्यकर्ता हिन्दी को प्रोत्साहन करने और सरंक्षित करने के लिए मौखिक अभियान चलाते रहे है, जो कि प्रशस्त है। किन्तु इनमें कई कार्यकर्ता इससे भी आगे बढ़ते है और अंग्रेजी भाषी भारतीयों पर अंग्रेजियत की लानत भेजते है। उनके हाव भाव एवं वक्तव्यों से ध्वनित कुछ यूँ होता है कि :
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यदि आपको भारतीयता से प्यार है तो आपको हिन्दी ही लिखनी चाहिए, हिन्दी ही बोलनी चाहिए और खास तौर पर अंग्रेजी का विरोध करना चाहिए !!*
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हिन्दी को बचाने के लिए की गयी गतिविधियाँ जरुरी है लेकिन इसी रौ में जब अंग्रेजी का विरोध किया जाता है तो मेरे विचार में यह देश को दो तरीके से नुकसान पहुंचाता है - इससे भारत के तकनिकी विकास में अवरोध पैदा होगा और इससे अलगाव को प्रोत्साहन मिलेगा।
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इस जवाब में मैंने किसी भाषा के टिके रहने, फैलने और नष्ट हो जाने के महत्त्वपूर्ण कारको को स्पष्ट किया है।
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**(1) **भाषा की सरलता या वैज्ञानिकता से कोई लेना देना नहीं है। यह सैन्य शक्ति है, जो किसी भाषा का फैलाव बाध्य करती है।
**(2)** कैसे मुनाफा देने वाले विवरणों का प्राथमिक स्त्रोत अंग्रेजी होने के कारण भारतीय अंग्रेजी की तरफ आकर्षित हुए ?
**(3)** भाषाई एकता का नारा अलगाव को बढाता है।
**(4)** हिन्दी को बचाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है ?
**(5) **समाधान
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**(1) भाषा का फैलाव का तकनीकी विकास एवं सैन्य शक्ति पर निर्भर करता है।
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जिस राष्ट्र में तकनीकी उत्पादन को प्रोत्साहित करने और उन्हें संरक्षण देने के लिए अच्छी क़ानून व्यवस्थाएँ होगी वह देश अपेक्षाकृत अधिक तेज़ी से तकनिकी आविष्कार करेगा। यह बात ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि जिस भी राज्य ने तकनिकी विकास करना शुरु किया अंततोगत्वा यह तकनिकी विकास हथियारों के निर्माण की दिशा में मुड़ गया। तकनिकी विकास होने पर वह राष्ट्र आधुनिक व उत्तम अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करके अन्य निर्बल देशों पर हमला करेगा। इससे कमजोर देश पर आक्रमणकारी राष्ट्र का शासन स्थापित होगा और अधीनस्थ देश द्वारा आक्रमणकारी राष्ट्र के धर्म और भाषा को अपनाने की प्रक्रिया शुरू होगी।
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इस्लाम में गेदरिंग की प्रक्रिया होने के कारण कारीगरों की रक्षा हुयी और उन्होंने तकनिकी विकास किया। बाबर ने भारत में सल्तनत की स्थापना की और उनकी भाषा भारत में चलन में आई। मुगल अपने शासन में अरबी-फारसी का इस्तेमाल करते थे अत: शासकीय भाषा फारसी बन गयी और लोगो ने फारसी सीखना शुरू किया !!
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पूरे विश्व में ग्रीक भाषा इसीलिए नहीं बोली जाती क्योंकि सिकन्दर व ग्रीस का युद्ध अभियान हवा के झोंके की तरह था। वे अन्य देशो पर दीर्घकाल तक शासन स्थापित करने में असफल रहे। किन्तु अंग्रेजी पूरी दुनिया में इसीलिए बोली जाती है क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य ने मुल्को पर सदियों तक शासन किया।
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1200 ईस्वी, यूरोप में ज्यूरी सिस्टम आने से औद्योगिक क्रान्ति हुयी। इससे तकनिकी आविष्कार हुआ और वे उत्तरोत्तर रूप से आधुनिक हथियारों का निर्माण करने लगे। हथियारों के बूते उन्होंने विश्व में अपना शासन स्थापित किया। बेहतर तोपखाना होने से मुगलो ने, और बेहतर बंदूके होने के कारण अंग्रेजो ने भारत को पराजित किया और उनकी सत्ता आने पर भारत में अरबी-फ़ारसी, अंग्रेजी का फैलाव हुआ।
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**(2) मुनाफा देने वाले विवरणों का प्राथमिक स्त्रोत अंग्रेजी में होने के कारण भारतीय अंग्रेजी की तरफ आकर्षित हुए।
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सैन्य शक्ति या शासन किसी भाषा को प्रस्तुत करने का कारक बनता है, लेकिन भाषा तब तक विस्तार नहीं करती जब तक कि अवाम खुद इसे सीखने के लिए आकर्षित नहीं हो। भाषा को फैलाने का मुख्य काम पाठ्य विवरण करता है।
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यदि किसी भाषा में ऐसे पाठ्य विवरण मौजूद है जो मुनाफा बनाकर देते है, तो अमुक भाषा को सीखने की प्रवृति बढ़ने लगेगी। और सबसे ज्यादा मुनाफा तकनीक बनाकर देती है। तो यदि किसी देश ने तकनिकी क्षेत्र में तेजी से विकास किया है या लगातार नए नए आविष्कार कर रहा है तो इन आविष्कारो से सम्बंधित सभी **मूल** विवरण उस देश की भाषा में ही उपलब्ध होंगे। और इस वजह से ज्यादा से ज्यादा नागरिक इस भाषा को सीखने की और जाने लगेंगे।
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फ़ारसी, अरबी और उर्दू साहित्य में अलिफ़ लैला, हातिम ताई आदि की कहानियाँ और ग़ज़लियात इफ़रात में लिखी गयी जबकि गणित-विज्ञान का साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध था।
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तो मुग़लो की भाषा लोगो को आकर्षित नहीं कर सकी। क्योंकि जिस हिन्दी भाषी को ग़ालिब-मीर न समझ आ रहे वह अरबी सीखने की जगह जय शंकर प्रसाद या दुष्यंत कुमार को पढ़ लेगा। किन्तु यदि आपको इंजीनियरिंग और चिकित्सा से सम्बंधित विवरण पढने है तो आपको अंग्रेजी सीखनी ही होती थी। और चूंकि इन विषयों में दक्ष होने से आदमी तेजी से पैसा बना सकता था, अत: भारतीयों में स्वतः ही अंग्रेजी का पठन पाठन बढ़ने लगा। पाठक इस बात को नोट करें कि तब इन विषयों के हिन्दी अनुवाद उपलब्ध नहीं थे।
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**2.1. संस्कृत भाषा क्यों चलन से बाहर हो गयी ?
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संस्कृत के साहित्य में आयुर्वेद होने से संस्कृत प्रासंगिक बनी रही, किन्तु जैसे जैसे ऐलोपेथी का विकास हुआ आयुर्वेद के पिछड़ने के साथ ही संस्कृत का पठन पाठन भी कम होने लगा। संस्कृत का शेष साहित्य आध्यात्म, योग, धर्म, मीमांसा, खगोल, ज्योतिष, धर्म आदि से संबधित है, जिनका कारोबारी मूल्य उतना नहीं है।
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मतलब ये सब ज्ञान उत्पादकता नहीं बढ़ाता। तो इंजीनियरिंग विवरण न होने से संस्कृत के मूल विवरण अनुपयोगी होते चले गए और यह भाषा मुख्य धारा से बाहर हो गयी। मानव चिकित्सा एक महत्त्वपूर्ण विषय है और यह मुनाफा बनाकर देता है। अत: संस्कृत पूरी तरह से गायब नहीं होगी। लोग इसे सीखते रहेंगे और इसके मूल ग्रंथो में आयुर्वेद, योग आदि के रहस्यों को ढूँढने के लिए संस्कृत ग्रंथो का अन्वेषण करते रहेंगे।
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इसी बीच यदि कोई व्यक्ति संस्कृत के पुराने पाठ्य में से निरापद रूप से केंसर ठीक करने का फार्मूला खोज निकालता है, और इसे बनाकर भी दिखा देता है, तो अचानक से दुनिया भर में संस्कृत उछल कर आ जायेगी, और लोग संस्कृत ग्रंथो को खंगालना शुरू करेंगे ताकि इसमें से एड्स का इलाज भी खोजा जा सके !!!
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**2.2. और क्यों जल्दी ही हिंदी भी चलन से बाहर हो जाएगी ?**
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मौजूदा हालात में पूरी दुनिया तकनीक पर टिकी है , और सभी प्रकार के कारोबार कम्प्यूटर आदि पर आ रहे है। कंप्यूटर, मोबाइल की मूल भाषा अंग्रेजी है। सभी इंजीनियरिंग के कोर्स, ऐलोपेथी, गणित-विज्ञान का आधुनिक पाठ्यक्रम आदि अंग्रेजी भाषा में है, इनके सभी मूल ग्रन्थ भी अंग्रेजी भाषा में है, और होने वाले सभी आविष्कार भी अंग्रेजी भाषा में है।
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तो यदि किसी छात्र जो ऊँचे दर्जे के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल लेना है या इंजीनियरिंग / चिकित्सा साहित्य पढ़ना है तो उसे अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। हिन्दी भाषा में इनमे से कुछ नहीं है। हिन्दी में पिछले 1000 साल का जितना भी विवरण लिखा गया है वह किस्से कहानियाँ है। और जो कुछ काम का है वह भी अंग्रेजी से अनुवादित है। दुसरे शब्दों में यदि आप हिन्दी पढ़ते है तो आपके साथ दो चीजे होती है :
* यदि आप हिन्दी की मूल पुस्तक पढ़ते है तो यह अनिवार्य रूप से अनुत्पादक होती है !!
* यदि ये विवरण उत्पादक है तो ये अंग्रेजी से अनूदित है !!
दुसरे शब्दों में हिन्दी धीरे धीरे सिकुड़ती चली जाएगी। इसे रोकना मतलब पूरी धारा को पलटना है।
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**(3) भारत में किसी एक भाषा पर पूरे देश को सहमत नहीं किया जा सकता।
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भारत में ऐसी कोई भाषा नहीं है जिससे राष्ट्र को एक साथ संबोधित किया जा सके। हिन्दी राजभाषा अवश्य है, किन्तु दक्षिण एवं पूर्व में इसका चलन नही है। वे हिंदी सुन कर समझ सकते है और कच्ची पक्की बोल भी सकते है, किन्तु लिख या पढ़ नहीं सकते। गुजरात, बंगाल, उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र में आपको लिखित में हिन्दी का प्रयोग बेहद कम मिलेगा और शहरो से दूर दराज इलाको में तो बिलकुल भी नहीं मिलेगा।
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वे स्थानीय भाषा में ही लिखते पढ़ते बोलते है। बल्कि दक्षिण के राज्यों में तो हिंदी का विरोध है। और ये विरोध नया नहीं है। इसीलिए हमारे पास ऐसी कोई भाषा ही नहीं है जिसे शुद्धता के साथ सभी देशवासियो पर लागू किया जा सके।
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तमिलनाडु / कर्नाटक का उदाहरण लीजिये। वहां तमिल बोली, लिखी और पढ़ी जाती है। तमिल उनकी प्राथमिक भाषा है। द्वितीय भाषा अंग्रेजी है। अब यदि उन्हें कहा जाए कि आप हिंदी को अपनाइये तो उन्हें किस भाषा का त्याग करना चाहिए ? तमिल का ? या अंग्रेजी का ? तमिल उनकी अपनी भाषा है, और यदि वे अंग्रेजी का त्याग कर देंगे तो कंप्यूटर, इंजीनियरिंग और चिकित्सा संबंधी विवरण किस भाषा में पढ़ेंगे ? क्योंकि हिंदी में तो मूल रूप से यह सब उपलब्ध नहीं है। और अनुवाद को पढ़ना एक खुराफात है। अनुवाद सिर्फ तब ही पढ़े जा सकते है जब कोई इन्हें उपलब्ध करवाये।
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असल में धर्म के बाद भाषा सबसे बड़ी दूसरी वजह है जिसके आधार पर दुनिया में देशो के विभाजन होते आये है।*
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तो भाषाई एकता की बात करना अलगाव बढाता है। इससे उत्तर-दक्षिण भारतीयों के बीच घर्षण बढ़ जाएगा।
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**(4) हिन्दी को बचाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है ?**
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फिलहाल हमारी ट्रेन छूट चुकी है, और हिन्दी को बचाने के लिए हमें प्राथमिक चरण में आंशिक रूप से अंग्रेजी को भी अपनाना पड़ेगा। वजह ?
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तकनिकी विकास के लिए यह जरूरी है कि हम अपने छात्रों को विज्ञान-गणित की और धकेलें। और विज्ञान-गणित का 100% मूल पाठ्यक्रम सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध है। जो कुछ हिन्दी में है वह अनुवाद है। विज्ञान-गणित-इंजीनियरिंग-तकनीक आदि के बारे में रोज सैंकड़ो-हजारो पृष्ठ पूरी दुनिया में लिखे जाते है और यह अद्यतन जानकारी होती है। यदि विज्ञान-गणित के छात्र अनुवाद पढेंगे तो वे बेहतर प्रदर्शन कभी नहीं कर पायेंगे।
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यदि भारत के छात्रों ने कसरत से गणित-विज्ञान नहीं पढ़ी तो हम तकनीक के क्षेत्र में और भी पिछड़ जायेंगे। और यदि हम उन्हें गणित-विज्ञान की और धकेलेंगे तो उन्हें अंग्रेजी भी पढ़नी ही पड़ेगी !! कृपया पाठक इस बात को नोट करें कि मैं छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाने की वकालत नहीं कर रहा हूँ। मेरा हेतु उन्हें गणित-विज्ञान पढ़ाने का है। लेकिन गणित-विज्ञान में दक्ष होने के लिए अंग्रेजी में दक्ष होना जरुरी है। और यदि कोई व्यक्ति गणित-विज्ञान नहीं पढ़ रहा है तो वह कौनसी भाषा पढ़ता है इससे मुझे कोई लेना देना नहीं है।
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**4.1. फ्रेंच, रशियन और मंदारिन कैसे बची ? **
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फ़्रांस एवं रूस ने खुद से तकनीकी विकास किया और इस वजह से उनके पास ज्यादातर तकनिकी ज्ञान खुद का पैदा किया हुआ है। मतलब उनके छात्रों ने विज्ञान-गणित के अनुवाद नहीं पढ़े थे। उनके इंजीनियरों ने चीजो को खुद खोजा, और इस वजह से उनके पास विज्ञान-गणित का सारा मूल ज्ञान फ्रेंच एवं रशियन में मौजूद है। यह सिलसिला जारी रहेगा और ये भाषाएँ बनी रहेगी।
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भारत एवं चीन साथ में आजाद हुए थे। लेकिन चेयरमेन माओ ने चीन को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई कदम उठाये। माओ ने किस तरह चीन के तकनिकी विकास का आधार तैयार किया जो कि आज के चीन की बुनियाद बना इस पर मैं फिर किसी लेख में कहूँगा। पर कुल मिलाकर चीन ने इंजीनियरिंग के विषय में उधार के अनूदित ज्ञान से परहेज किया और खुद से विकास करने के कारण वे अपनी भाषा को बचाने में सफल रहे। आज चीन के पास इंटरनेट का पूरा इको सिस्टम चायनीज में है। अत: मंदारिन आगे भी बनी रहेगी।
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ये तीनो देश हथियारों के निर्माण में आत्मनिर्भर है !! दुसरे शब्दों में जो देश खुद के हथियार बनाएगा वह देश अपनी भाषा को बचा लेगा लेकिन जो देश सबसे बेहतर हथियार बनाएगा उसकी भाषा विस्तार भी करेगी !! जो देश न तो हथियार बनाएगा और न ही वह भाषा अपनाएगा जिसमे तकनिकी पाठ्य है वह देश निरंतर कमजोर और परजीवी होता जाएगा। यह चीज तय है।
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**4.2. अंग्रेजी ने स्लाविक (रशियन) की तुलना में तेजी से क्यों विस्तार किया ? **
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रूस में जूरी सिस्टम न होने कारण रशियन ताकतवर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी करने में सफल नहीं हो पाए और इस वजह से रूस ने वैश्विक विस्तार नहीं किया। रूस का सारा तकनिकी विस्तार सरकारी कम्पनियों ने किया है, और सरकारी कम्पनियां दुसरे मुल्को में कारोबार करने में रुचि नहीं दिखाती।
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किन्तु ब्रिटेन में जूरी सिस्टम होने के कारण वहां के कारखाना मालिक बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हुए और उन्होंने वैश्विक विस्तार किया। इसी वैश्विक विस्तार के कारण उन्होंने दुनिया में अपनी हुकूमत बनायी और अंग्रेजी पूरी दुनिया में फैली।
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उल्लेखनीय है कि, ब्रिटेन ने जो पूरी दुनिया में सैन्य अभियान चलाये थे वे निजी कंपनियों द्वारा चलाये गए थे, ब्रिटेन के राजा द्वारा नहीं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सस्ते कच्चे माल एवं श्रम की जरूरत थी अत: उन्होंने अन्य मुल्को को टेकओवर करने की योजनाएं बनानी शुरू की। और इसके लिए उन्होंने राजा एवं चर्च से सहयोग लिया।
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जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको की राजवर्ग (जज-पुलिस-नेता माफिया) के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खड़ी कर पाए !!*
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पाठक इस बात को नोट करें कि किसी भी देश के तकनिकी विकास का सबसे बड़ा रोड़ा राजवर्ग यानी सरकार होती है। सभी देशो की यही स्थिति है। कारखाना मालिक एक खरगोश की तरह है जिसका शिकार करने के लिए जज-पुलिस-नेता निरंतर घात लगाए रहते है। और मौका मिलते ही शिकार कर लेते है। इनका काम ही ऐसे लोगो को लूटना है जो बेहद तेजी से पैसा बनाते है। और कारखाना मालिक पैसा बनाने की मशीने है। किन्तु ब्रिटेन, अमेरिका एवं फ़्रांस में जूरी सिस्टम होने की वजह से ये व्हाइट कोलर माफिया फैक्ट्री मालिको को अपना शिकार बनाने में असफल रहे !!
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दुसरे शब्दों में जूरी मंडल ने वहां के कारखाना मालिको को बचाया और इन्ही कारखाना मालिको ने अंग्रेजी का वैश्विक विस्तार किया। रूस एवं चीन में तकनिकी विकास सरकार ने किया अत: वे अपनी भाषा को बचा तो सके किन्तु फैला न सके !!
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**4.3. भारत में हिन्दी कैसे बची रही ?**
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इसका आधा क्रेडिट परिस्थिति को और आधा क्रेडिट जवाहर लाल को जाता है। जवाहर लाल लायक आदमी नही था, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि जवाहर लाल ने हिन्दी को बचाने के लिए कदम नहीं उठाये होते तो हिन्दी काफी सिकुड़ चुकी होती।
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**4.3.1. भारत के पाठ्यक्रम में अंग्रेजी एवं गणित-विज्ञान का आरम्भ :**
1835 ईस्वी, मैकाले ने भारतीय शिक्षा प्रणाली पर बिल प्रस्तुत करते हुए संसद में कहा था कि - " ब्रिटिश लाइब्रेरी का एक शेल्फ संस्कृत एवं अरबी की करोड़ो पुस्तकों से ज्यादा उपयोगी है " !!
> *I have conversed both here and at home with men distinguished by their proficiency in the Eastern tongues. .... I have never found one among them who could deny that a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia. Honours might be roughly even in works of the imagination, such as poetry, but when we pass from works of imagination to works in which facts are recorded, and general principles investigated, the superiority of the Europeans becomes absolutely immeasurable.
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और मेरे विचार में गणित-विज्ञान-इंजिनीयरिंग के सन्दर्भ में यह एक ईमानदार कथन था। पर चूंकि यह सब विवरण अंग्रेजी में था इसीलिए यह स्थापित था कि यदि आपको उपयोगी विवरण पढने है तो अंग्रेजी से बचने का कोई उपाय नहीं !!
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थॉमस मैकाले एक विवादास्पद किरदार है, और इसके कर्मो के काफी स्याह-उजले पक्ष है। मैकाले के बारे में काफी कुछ कहा सुना गया है और यह आपको गूगल / शोसल मीडिया पर मिल जाएगा। मेरे विचार में मैकाले के शिक्षा सुधारों ने कुछ अच्छा दिया और कुछ बुरा। किन्तु उसका हेतु क्या था, इस बारे में मेरी कोई निर्णायक राय नहीं है।
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भारत पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का कब्ज़ा था और संसद द्वारा उन पर यह शर्तें लागू की जाती थी कि कम्पनी को भारत में शिक्षा आदि पर इतने उतने लाख रूपये खर्च करने पड़ेंगे। पर जाहिर है कम्पनी को शिक्षा आदि के पचड़ो में सर खपाने में रूचि नहीं थी। अत: वे नियमों का पालन करने के लिए इस बजट को मदरसों / गुरुकुलो आदि पर फौरी तौर पर खर्च कर देते थे, और फर्जी हिसाब बनाकर भेज देते थे। कम्पनी को सिर्फ खनिज निकालने और लगान वसूलने में रुचि थी।
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इसी वजह से जब एजुकेशन एक्ट पास हो गया तो भी कम्पनी ने भारतीय पाठ्यक्रम एवं भाषाओ के साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की। वे बड़े पैमाने पर शैक्षिक गतिविधियाँ करके अपना बजट नहीं बढ़ाना चाहते थे। असल में मैकाले की सिफारिशे कभी पूरी तरह से लागू नहीं हो पायी। सिर्फ कुछ प्रोविंस में अंग्रेजी पाठ्यक्रम लागू किया गया था, और अधिकांश में पाठ्यक्रम को स्थानीय भाषाओ में ही रखा गया। दुसरे शब्दों में 1870 तक भी ब्रिटिश ने भारतीय भाषाओ को प्रस्थापित करने के बड़े पैमाने पर प्रयास नहीं किये थे !!
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दरअसल, कम्पनी के आला अधिकारी भारत में विज्ञान-गणित-इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम लागू नहीं करना चाहते थे। वे जानते थे कि यदि भारत में बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग की शिक्षा दी जायेगी तो भारतीयों के लिए हथियारों का उत्पादन करना आसान हो जाएगा। और तब उन पर शासन करना मुश्किल होगा।
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भारत में गणित-विज्ञान का अंग्रेजी पाठ्यक्रम बड़े पैमाने पर 1890 से लागू हुआ। और यह सिर्फ भारत में नहीं हुआ था। उन सभी देशो में हुआ था जहाँ पर कच्चा माल था और वे ब्रिटिश संसद के सीधे नियन्त्रण में थे।
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वजह यह थी कि, ब्रिटिश ने भारत में हथियारों के निर्माण के लिए कारखाने खोलने शुरू किये और इसके लिए स्थानीय स्तर पर Low Level Tech इंजीनियरों की जरूरत थी। तो उन्होंने भारत को गणित-विज्ञान की शिक्षा देना शुरू किया ताकि प्राथमिक स्तर पर नियंत्रित उत्पादन के लिए मानव संसाधन जुटाया जा सके। बाद में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इसमें और भी तेजी आई, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य को हथियारों का उत्पादन बेहद तेजी से बढाने की जरूरत थी।
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**4.3.2. आजादी के बाद अंग्रेजी एवं गणित-विज्ञान की शिक्षा **
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आजादी के बाद जवाहर लाल ने गणित-विज्ञान-इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम को अंग्रेजी में लागू नहीं किया। यदि इसे अंग्रेजी में लागू किया जाता तो देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा गणित-विज्ञान से वंचित रह जाता। जवाहर लाल ने इन विषयों को हटाया भी नहीं। असल में जवाहर लाल ने भारत में जो आधुनिक मंदिर — जिन्हें अब मोदी साहेब बेहद तेजी से नीलाम कर रहे है, और उनका संकल्प है कि वे अपना कार्यकाल ख़त्म होने से पहले भारत की सभी राष्ट्रिय सम्पत्तियों को विदेशियों के हवाले कर देंगे !! — खड़े किये थे उन्हें चलाने के लिए बड़े पैमाने पर पुजारियों ( पढ़े : इंजीनियर्स ) की जरूरत थी।
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तो ज्यादा से ज्यादा छात्रों तक विज्ञान-गणित पहुँचाने के लिए उसने अनुवाद लागू किये और इंजीनियरिंग पढने के लिए अंग्रेजी सीखने की जरूरत न रही !! दुसरे शब्दों में जवाहर लाल ने भारत को पाकिस्तान बनने से बचा लिया था !! यदि जवाहर लाल ने ये मंदिर न खोले होते और गणित-विज्ञान का अनुवादित पाठ्यक्रम लागू नहीं किया होता तो भारत वैसी ही नस्ल का उत्पादन करता जैसा पाकिस्तान ने किया है !!
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मतलब जिस तरह वे इकबाल के कलाम की तलावत कर रहे है उसी तरह शिक्षा के नाम पर एक बहुत बड़ी आबादी अभिज्ञान शाकुंतलम और पुराणों के श्लोक पढ़ रही होती।
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उस समय ब्रिटिश एवं अमेरिकी इस स्थिति में नहीं थे कि वे भारत के आंतरिक प्रशासन पर ध्यान दे पाते। अमेरिकियों ने ब्रिटिश को और रूसियों ने अमेरिकियों को पूरी तरह से उलझा कर रखा हुआ था। पर हम इसका लाभ नहीं उठा पाए क्योंकि जवाहर लाल ने भारत की अदालतों एवं थानों को खच्चर बनाने के लिए कई क़ानून छापें। और अदालतें सुधारे बिना गणित-विज्ञान की शिक्षा किताबों में ही रह जाती है, धरातल पर नहीं आ पाती।
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1991 में अमेरिकन वायसराय मनमोहन सिंह उदारीकरण लेकर आये और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में आकर विज्ञान-गणित के पाठ्यक्रम को तोडना शुरू किया। तो अब हम दोहरा घाटा खा रहे है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां विज्ञान-गणित का पाठ्यक्रम लगातार तोड़ रही है, लेकिन छात्रों में अंग्रेजी सीखने का चलन बढ़ रहा है। मतलब अब भारतीय छात्र फालतू फंड की अंग्रेजी सीख रहे है। फालतू फंड यानी गणित-विज्ञान रहित अंग्रेजी !! अनुत्पादक एवं अनुपयोगी ज्ञान !!
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कैसे वे भारत की गणित-विज्ञान का बुनियादी ढांचा तोड़ रहे है इस बारे में यह जवाब पढ़ें - [Pawan Jury का जवाब - भारत हथियारों की इंजीनियरिंग में अमेरिका को कैसे पछाड़ सकता है?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80/answers/128395434>)
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पाठक कृपया इस बात पर ध्यान दें कि - किसी देश में तकनिकी विकास गणित-विज्ञान-इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम एवं उसकी शिक्षा से नहीं आता है। पुस्तको की यह शिक्षा सिर्फ कच्चे माल के रूप में मानव संसाधन उपलब्ध कराती है। तकनीक का असली विकास अदालतों एवं पुलिस पर निर्भर करता है। यदि अदालतें एवं थाने ठीक काम करेंगे तो ही तकनिकी विकास आएगा। भूमि सुधार एवं अदालतों को ठीक किये बिना तकनिकी विकास की बात करना बौद्धिक विलास है। और भारत में बुद्धिजीवियों द्वारा यह विलास बड़े पैमाने पर किया जाता है।
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(5) समाधान - किन कानूनों की सहायता से हम हिन्दी औरअन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओ को संरक्षित कर सकते है ?
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**(A) **बोगस समाधान – हिन्दी बचाओ के नारे लगाना, हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की वकालत करना और इसी तर्ज के वन लाइनर समाधान जिसमे आदमी लोगो को *जागरूक* करने के नाम पर खुद का टाइम पास इस तरह करता है कि अन्य का भी टाइम पास हो !!
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**(B)** व्यवहारिक समाधान -- व्यवहारिक समाधान से आशय है जिन्हें लागू किया जा सके। और समाधान के ऐसे सभी रास्ते गेजेट से होकर निकलते है। निचे मैंने कुछ अधिसूचनाओ की रूपरेखा दी है, जिन्हें गेजेट में निकालने से फर्क आएगा।
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(1) विज्ञान-गणित के पाठ्यक्रम में द्विभाषी पुस्तकें लागू करना :** द्विभाषी पुस्तकों में बाएँ पृष्ठ का अनुवाद दाएं पृष्ठ पर रहेगा। उत्तर भारत में दायाँ पृष्ठ हिन्दी का रहेगा और बाएं पृष्ठ पर इसका अनुवाद अंग्रेजी में होगा। महाराष्ट्र में दायाँ पृष्ठ मराठी में कर्नाटक में कन्नड़ में रहेगा और इसका अंग्रेजी अनुवाद बाएँ पर होगा। इस तरह सभी राज्यों में उनकी स्थानीय भाषाओँ के हिसाब से द्विभाषी पुस्तकें लागू की जानी चाहिए। छात्र को जो भाषा पढनी हो वह पढ़ सकता है।
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परीक्षा में भी प्रश्न पत्र दोनों भाषाओं में आएगा। और छात्र को जिस भाषा में जवाब देना है, वह दे सकता है। हालांकि इससे खर्च बढ़ जाएगा और किताबों की साइज डबल हो जायेगी। तो किताबों को दो या तीन हिस्सों में तोड़ा जा सकता है। इससे हमें किसी पर भाषा थोपने की जरूरत नहीं रहेगी, और ज्यादातर सम्भावना यही रहेगी कि छात्र को लगभग दोनों भाषाओ का ज्ञान रहेगा। बाकी जिसे जो प्राथमिक भाषा बनानी है वह चुन सकता है ।
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कृपया ध्यान दें, मेरा यह प्रस्ताव सिर्फ गणित विज्ञान की पुस्तको के लिए है। शेष विषय छात्र किस भाषा में पढ़ते है इस बारे में वे तय कर सकते है ।
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जिला शिक्षा अधिकारी को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने से इसे पूरे भारत में सिर्फ 1 वर्ष में लागू किया जा सकता है। मेरा मानना है कि जब तक शिक्षा अधिकारी वोट वापसी पासबुक के दायरे में नहीं आएगा तब तक उसे यह करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
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**(2) सरकारी सूचनाओं बहुभाषी प्रसारण :** सूचनाएं प्रसारित करने का सबसे बड़ा स्त्रोत सरकार है। सरकार ऐसे कई छोटे मोटे निरापद कदम उठा सकती है, जिनसे मामूली तौर पर बदलाव आएगा :
1. सरकार जो भी क़ानून गेजेट में छापे उनके मूल संस्करण हिन्दी एवं अन्य सभी क्षेत्रीय भाषाओं में भी एक साथ जारी किये जाए । यह बेहद जरुरी चीज है। इस तरह का क़ानून न होने के कारण सरकारें सिर्फ अंग्रेजी में ही क़ानून जारी करती है, हिन्दी में जारी ही नहीं करती। और इस वजह से अदालतों में भी अंग्रेजी में लिखे क़ानून को ही अधिकृत माना जाता है ।
उदाहरण के लिए मोदी साहेब ने आज तक भी जीएसटी क़ानून का हिन्दी अनुवाद जारी नहीं किया है। इसी तरह से FRDI , भूमि अधिग्रहण अध्यादेश आदि के क़ानूनो के हिन्दी अनुवाद भी आज तक सरकार ने जारी नहीं किये। इसका नुकसान यह होता है कि हिन्दी भाषियों को सेकेण्ड सोर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। और यह अनाधिकृत भी होता है।
पाठक कृपया ध्यान दें कि मेरा प्रस्ताव यह नहीं है कि सरकार कानूनों के हिन्दी अनुवाद जारी करें। मेरा प्रस्ताव मूल संस्करण अन्य भाषाओ में एक साथ जारी करने का है। और इसमें अन्तराल नहीं होना चाहिए। सभी भाषाओ में जारी न करके सबसे अधिक बोली जाने वाली किन्ही 5 भाषाओं में तो इन्हें जारी किया ही जाना चाहिए।
1. जब भी सरकार प्रेस रिलीज जारी करे तो इसे भी सर्वाधिक बोली जाने वाली 5 भाषाओं में जारी किया जाए।
1. हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जज जब भी अपना फैसला दें तब अनिवार्य रूप से इसे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओ में जारी करें।
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**(3) जूरी कोर्ट :** ऊपर बताए गए सभी बिंदु मामूली तौर पर समाधान लायेंगे। असली समाधान अदालतों एवं थानों का भ्रष्टाचार ठीक करने से आएगा। जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि अपनी भाषा बचाने के लिए यह जरूरी है कि हम तकनिकी अविष्कार एवं तकनिकी उत्पादन स्वयं करें। उदाहरण के लिए यदि माइक्रो सॉफ्ट विंडोज बनाएगा तो वह अंग्रेजी में ही चलेगा। आज भारत में तकनिकी उत्पादन का स्तर शून्य है , और इसी वजह से अंग्रेजी पर हमारी निर्भरता बढती जायेगी।
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तो बुनियादी समाधान फिर से जूरी कोर्ट ही है। यदि हम प्रस्तावित जूरी कोर्ट का क़ानून गेजेट में छाप देते है तो भारत में बड़े पैमाने पर तकनिकी उत्पादन होने लगेगा और हमारा यह ज्ञान अपनी भाषाओं में होगा। और तब इस काम के ज्ञान को जानने के लिए भारतीय हिन्दी पढ़ना-लिखना शुरू कर देंगे। इस तरह हिन्दी चलन में बनी रहेगी। जूरी कोर्ट का प्रस्तावित ड्राफ्ट आप **जूरी कोर्ट** नामक मंच में देख सकते है।
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