Pawan Jury BhilwaraRj
नागरिक सत्ता एवं नागरिक अधिकार में क्या अंतर है?
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सत्ता एवं अधिकार का बहुधा एक ही अर्थ लगाया जाता है, किन्तु तकनीकी रूप से इसमें एक बड़ा अंतर है। यह अंतर संप्रभुता का है। सत्ता हमेशा संप्रभु होती है, जबकि अधिकार सशर्त होने के कारण निर्णायक नहीं होते।
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राजवर्ग प्रजा को लूटने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है, और राजवर्ग की इस लूट को सिर्फ नागरिक सत्ता में वृद्धि करके ही रोका जा सकता है। नागरिक अधिकार राजवर्ग की नकेल कसने में नाकाफी साबित होते है।
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इस पोस्ट को बेहतर फोर्मेट में यहाँ भी पढ़ सकते है - <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1237809383258803/>
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[ टिप्पणी : कार्यकर्ताओ को भ्रमित करने के लिए राजवर्ग+धनिकों ने राजनीती विज्ञान, लोक प्रशासन, समाज शास्त्र, क़ानून एवं ज्ञान देने वाली किसी भी किताब में नागरिक अधिकार एवं नागरिक सत्ता के अंतर को नहीं लिखा है। ताकि नागरिक सिर्फ अधिकारों की लड़ाई लड़ने में व्यस्त रहे, और नागरिक सत्ता में वृद्धि के प्रस्तावों की उपेक्षा करें। ]
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इस जवाब के बिंदु :
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(1) सत्ता (Power) क्या है
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(2) अधिकार (Right) क्या है
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(3) नागरिको को लूटने के लिए राजवर्ग एवं धनिकों का गठजोड़।
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(4) नागरिक सत्ता में वृद्धि होने से राजवर्ग+धनिकों द्वारा प्रजा को लूटने की शक्ति “हमेशा के लिए” घट जाती है।
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(5) राजवर्ग+धनिको का नागरिक सत्ता में बढ़ोतरी पर रूख।
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(6) प्रजा विरोधी नेताओं / कार्यकर्ताओ को चिन्हित करना।
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(1) सत्ता (Power) क्या है – किसी विषय में निर्णायक, अंतिम एवं सम्प्रभु शक्ति होना सत्ता है। और जब यह निर्णायक शक्ति जनता के पास हो तो इसे नागरिक सत्ता कहते है।
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उदाहरण के लिए, नागरिक के पास वोटिंग पॉवर होना नागरिक सत्ता है। वोटिंग पॉवर सत्ता इसीलिए है क्योंकि जब नागरिको का बहुमत चुनावी प्रक्रिया का पालन करके किसी व्यक्ति को चुन लेता है तो नागरिको के इस फैसले को न तो कहीं चुनौती दी जा सकती है, और न इसे सही-गलत के मापदंड पर तौला जा सकता है।
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एक बार नागरिको ने मत शक्ति का प्रयोग करके जिस व्यक्ति को सांसद चुन लिया अब वही व्यक्ति सांसद बनेगा। कोई अपील नहीं !! और यही स्थिति उन सभी पदों के साथ है जो नागरिको के वोट से चुन कर आते है, जैसे - विधायक, सरपंच, पार्षद, सभापति आदि।
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जब नागरिक मत शक्ति का प्रयोग करके कोई फैसला लेते है तो यह संप्रभु है, निर्णायक है, अंतिम है, और राजवर्ग को नागरिको के इस फैसले की समीक्षा का कोई विवेकाधिकार नहीं दिया गया है !! अत: नागरिको की मत शक्ति (Voting Power) नागरिको की सत्ता है।
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(पेड पाठ्यपुस्तकों में मत-शक्ति को मताधिकार कहा गया है, जबकि यह अधिकार न होकर सत्ता है।)
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कुछ और नागरिक सत्ताओ के उदाहरण निम्नलिखित है :
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(1.1) रिटेंशन रिव्यू : रिटेंशन इलेक्शन की प्रक्रिया में नागरिक वोट करके यह तय करते है कि किसी कार्यरत शीर्ष जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए या नहीं। जजों के निष्कासन की अंतिम शक्ति नागरिको के पास होने के कारण यह नागरिक सत्ता है। जापान के नागरिको के पास यह प्रक्रिया मौजूद है। हालांकि यह वोट वापसी की शक्ति की तुलना में कम प्रभावी है।
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(1.2) जूरी सिस्टम : जूरी सिस्टम में मुकदमे सुनकर फैसला देने की अंतिम शक्ति / सत्ता नागरिको के पास होने के कारण जूरी प्रणाली नागरिक सत्ता है। किन्तु जज सिस्टम में दंड देने की अंतिम सत्ता जज के पास होती है।
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(1.3) असेसर सिस्टम : एसेसर सिस्टम में नागरिको के 2 प्रतिनिधि जज के साथ बैठकर मुकदमा सुनते है और सजा / रिहाई का फैसला करते है। अत: दंड देने की शक्ति में नागरिको की सहभागिता होने के कारण यह नागरिक सत्ता है। चीन में यह प्रणाली मौजूद है।
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(1.4) वोट वापसी प्रक्रियाएं : वोट वापसी में नागरिक बहुमत का प्रयोग करके किसी अधिकारी को निकाल सकते है, और नागरिको के बहुमत द्वारा दिए गए इस फैसले को कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती।
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(1.5) जनमत संग्रह : जनमत संग्रह में नागरिक सरकार के किसी भी फैसले या मामले के बारे में अपना मत प्रदर्शित करते है और बहुमत द्वारा प्रदर्शित फैसला ही अंतिम होता है। अभी हाल ही में किया गया ब्रेग्जिट जनमत संग्रह का उदाहरण है।
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(1.6) विविध स्तरीय चुनाव प्रणाली : चूंकि इलेक्शन में मत शक्ति का इस्तेमाल होता है, अत: मल्टी इलेक्शन भी नागरिक सत्ता में इजाफा करता है।
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सार - यदि किसी मामले या विषय में नागरिको के बहुमत को यदि कोई फैसला लेने / प्रतिभाव देने का हक़ दिया गया हो और यदि नागरिको का यह फैसला अंतिम एवं निर्णायक हो, तो कहा जाएगा कि - अमुक विषय में सत्ता नागरिको के पास है, राजवर्ग के पास नहीं। किन्तु यदि अंतिम फैसला करने की शक्ति शासन के किसी अंग के पास हो तो यह नागरिक सत्ता नहीं है।
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(2) अधिकार (Right) क्या है – नागरिक अधिकारों में निर्णायक सत्ता जनता के पास न होकर राजवर्ग / शासन के पास ही रहती है। और राजवर्ग अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करके जनता के किसी अधिकार को कानूनी रूप से निलम्बित / स्तंभित कर सकता है।
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नागरिक अधिकारों के कुछ उदाहरण
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(2.1) न्याय का अधिकार : भारतीय नागरिको को न्याय पाने का अधिकार है, किन्तु अंतिम रूप से न्याय जज ही देता है। इस तरह “न्याय पाने का अधिकार” नागरिको के पास है , किन्तु “न्याय देने” की अंतिम सत्ता जज (राजवर्ग) के पास है।
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(2.2) सूचना का अधिकार : भारत में सूचना का अधिकार नागरिको के पास होने के बावजूद “सूचना देने” की निर्णायक सत्ता सूचना आयुक्त के पास है। सूचना के अधिकार में सत्ता नागरिको के पास नहीं होने के कारण वे महत्त्वपूर्ण सूचनाएं नहीं निकलवाई जा सकती है, जो शासन देना नहीं चाहता।
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उदाहरण के लिए कुछ 2 साल पहले यह सूचना मांगी गयी थी कि RSS=BJP और कोंग्रेस ने इलेक्टोरल बांड के माध्यम से कौन कौन सी विदेशी कम्पनियों से चंदा लिया है। 2 साल से सूचना मांगने वाले कार्यकर्ता सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि के चक्कर लगा रहे है।
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सूचना पाने का अधिकार होने के बावजूद यह सूचना आज तक नहीं दी गयी, क्योंकि नागरिको को “सूचना पाने” का तो अधिकार है, किन्तु “सूचना देने” की सत्ता शासन के पास है !! अत: सूचना का अधिकार एक नागरिक अधिकार है, किन्तु नागरिक सत्ता नहीं है।
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इसी तरह शिक्षा का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आदि कई प्रकार के अधिकार लोकतंत्र का प्रोपेगेंडा खड़ा रखने के लिए भारत के नागरिको को दिए गए है, किन्तु इन सभी अधिकारों पर काफी सारी शरायत यानी “Terms & Condition apply” होती है। और सभी मामले में अंतिम शक्ति राजवर्ग के पास ही है।
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असल में, नागरिक सत्ता असली तत्व है, और अधिकारों में कोई वैल्यू नहीं है। क्योंकि अधिकार सिर्फ तब तक काम करेंगे जब मामला प्रजा Vs प्रजा के बीच है। लेकिन जब प्रजा का राजवर्ग से टकराव होता है, तो अधिकार काम नहीं करते। राजवर्ग से प्रजा की रक्षा सिर्फ सत्ता ही कर सकती है !!
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(3) नागरिको को लूटने के लिए राजवर्ग एवं धनिकों का गठजोड़
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“राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए , वर्ना वह प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा। प्रजा के अधीन नहीं होने पर राजवर्ग अन्याय पूर्वक दंड लगाकर प्रजा का उसी तरह से भक्षण कर जाएगा जिस तरह माँसाहारी पशु शाकाहारी जीवो को खा जाते है “ – महर्षि दयानंद सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाश
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राजवर्ग के अंग :
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(3a) प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद आदि (राजनेता)
(3b) कलेक्टर, एसपी, तहसीलदार, कर अधिकारी आदि (अधिकारी वर्ग)
(3c) सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट एवं लोअर कोर्ट के जज (अदालतें)
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इन तीनो वर्गों के सदस्य राजवर्ग है, और इनके जीवन का वही उद्देश्य है, जो अमूमन दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति का होता है – मतलब, ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाना → ज्यादा पैसा बनाकर अपनी शक्ति में वृद्धि में करना, और → शक्ति बढ़ने पर और भी ज्यादा पैसा बनाना, ताकि → अपनी शक्ति को और भी बढ़ाया जा सके !!
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पैसा बनाने के लिए ये तीनो वर्ग (नेता+अधिकारी+जज) आपस में गठजोड़ बना लेते है, और 24 घंटे नागरिको को लूटने एवं उनका शिकार करने की टोह में रहते है !! अब इस गठजोड़ में तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण घटक और जुड़ता है – धनिक वर्ग !!
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चूंकि राजवर्ग को पैसा बनाना है, और धनिक वर्ग के पास पैसा बनाने के कारोबार है, अत: वे धनिक वर्ग को लाभ देने वाले क़ानून छापते है, और बदले में धनिक वर्ग उन्हें पैसा देता है। और फिर धनिक वर्ग अमुक क़ानून का फायदा उठाकर उस राशि से 100 गुना पैसा बना लेता है, जितना पैसा उसने अमुक क़ानून छापने के एवज में राजवर्ग को चुकाया है !!
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आम तौर पर धनिक एवं राजवर्ग को जनता का दमन करने में कोई रुचि नहीं होती है। उन्हें बस पैसा चाहिए। किन्तु पैसा बनाने के लिए वे अन्यायपूर्वक तरीको का इस्तेमाल करते है, अत: नागरिको एवं धनिकों+राजवर्ग में घर्षण बढ़ जाता है।
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नागरिको को राजवर्ग+धनिक नामक उपरोक्त शिकारियों से निरंतर खतरा है !! और शिकार करने के लिए उनके पास काफी ताकत है। उनके पास पैसा वसूलने के लिए उलटे सीधे क़ानून छापने की शक्ति है, पकड़ने के लिए पुलिस है, और दंड देने के लिए अदालतें है। और यदि नागरिक हिंसक प्रतिरोध करते है तो सेना है !!
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(4) नागरिक सत्ता में वृद्धि होने से राजवर्ग द्वारा प्रजा को लूटने की शक्ति “हमेशा के लिए” घट जाती है।
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राजवर्ग+धनिकों की लूट / दमन को आप तीर-चाकू-भालों की संज्ञा दे सकते है। राजवर्ग की तरफ से निरंतर तीरों की यह बारिश चलती रहती है। जैसे ही उन्हें मौका मिलेगा वे आपका खून निकाल लेंगे। यदि नागरिको ने निचे बैठकर या दाएं-बाएँ होकर तीरो से बचने का कोई रास्ता निकाला है, तो वे भाले निकाल लायेंगे। और आप सामने के भालो से निपटेंगे, उतने में वे आपके पीछे से चाकू या तलवार चला कर आपका खून निकाल लेंगे।
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उन्हें आपको जान से नहीं मारना है, उन्हें आपका खून (पैसा) चाहिए। अत: आपका खून (पैसा) निकालने के बाद वे आपको छोड़ देंगे। जब आप में नया खून बन जायेगा तो वे फिर से अपनी बोतल लेकर आ जायेंगे और कोई न कोई तिकड़म लगाकर फिर से आपका खून निकाल लेंगे !! नागरिक चिल्ला चोट करते रहेंगे और राजवर्ग+धनिक नागरिको को नयी नयी तरकीबें लगाकर लूटते रहेंगे।
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वे अस्त्रों-शस्त्रों से सुसज्जित होकर हर समय आपका खून निकालने के लिए मुस्तैद है। उनका दिमाग 24*7 घंटे इसी दिशा में काम करता है, कि किस तरह वे प्रजा ज्यादा से ज्यादा लूट सकते है। सिर्फ मौका मिलने की देर है।
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जब चमगादड़ किसी पशु का खून पीना शुरू करता है तो उसके सलाइवा में मौजूद रसायन उस हिस्से को सुन्न कर देता है। सुन्न हो जाने के कारण पशु को खून निकलने का पता नहीं चलता। पेड मीडिया का मुख्य काम नागरिको के शरीर-दिमाग को सुन्न करके रखना है, ताकि जब खून निकाला जाए तो आपको अहसास न हो।
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अब मान लीजिये कि आप एक नागरिक है और आपके सामने निम्नलिखित परिस्थिति है :
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(4.1) ‘क’ आकर आपसे कहता है कि - यदि मुझे राजा बना दिया जाता है तो मैं नागरिको का खून निकालने के लिए कोई तीर-भाला-तलवार नहीं चलाऊंगा, और न ही राजवर्ग के किसी सदस्य को ऐसा करने दूंगा !!
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किन्तु यदि आप उससे कवच और ढाल मांगते है, ताकि आप निरंतर चलने वाले इस द्वन्द से खुद की रक्षा कर सके तो वह आपको कवच / ढाल धारण करने की शक्ति देने से इंकार कर देता है !!
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(4.2) एक और सज्जन ‘ख’ आकर आपसे कहता है कि शासन द्वारा प्रहार के लिए प्रयुक्त किये जा रहे भालो a, b, c, d, e, f, g, h ....... x, y ,z में से भाला c बहुत ही घातक है, और मैं आपको c नंबर के भाले से बचाने के लिए प्रतिबद्ध हूँ।
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किन्तु यदि आप उससे कवच और ढाल मांगते है, ताकि आप निरंतर चलने वाले इस द्वन्द से खुद की रक्षा कर सके तो वह आपको कवच / ढाल धारण करने की शक्ति देने से इंकार कर देता है !!
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(4.3) एक व्यक्ति ‘ग’ आकर आपको कहता है कि नागरिको को कवच / ढाल धारण करने की शक्ति दी जानी चाहिए ताकि वे हमेशा के लिए खुद की रक्षा कर सके।
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मुझे नहीं पता कि आप उपरोक्त में से किस विकल्प को चुनेंगे। किन्तु मैं ‘ग’ के प्रस्ताव को चुनूंगा। क्योंकि यदि एक बार नागरिको के पास ढाल-कवच धारण करने की शक्ति आ जाती है तो वे हमेशा के लिए राजवर्ग+धनिक के तीरों-भालों-तलवारों से खुद को बचा सकेंगे।
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यहाँ नागरिको का ढाल / कवच का स्वामी होना और इसे धारण करने की शक्ति होना नागरिक सत्ता है, ताकि प्रजा खुद राजवर्ग+धनिकों के हमलो से निरंतर अपनी रक्षा कर सके।
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नागरिक सत्ता होने से मतलब आपके पास उस मकान का स्वामित्व साबित करने वाले कानूनी दस्तावेज है जिसमें आप रह रहे है, और किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वे आपको बेदखल कर सके। जबकि नागरिक अधिकार वह किराए का मकान है, जो आपको रहने के लिए दिया गया है। और शासन किसी भी दिन आपसे यह मकान छीन सकता है।
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भारत में जब गोरो का शासन था तो नागरिको के पास कोई भी शक्ति / सत्ता नहीं थी। और सिर्फ इस वजह से गोरो का दमन बढ़ गया था। जब अंग्रेज भारत से गए तो सत्ता का हस्तांतरण कोंग्रेस को कर गए थे। यदि आजादी आने के बावजूद भारतीयों को मत शक्ति (Voting Power) नहीं दी जाती तो कोंग्रेस के नेता अगले 10 साल में भारतीयों का इतना चमड़ा उधेड़ देते कि, भारतीय फिर से इंग्लेंड जाकर अंग्रेजो को बुला लाते, ताकि वे इन नेताओं से छुटकारा पा सके !!
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और आज भी भारत के विधायक / नेता आपकी और हमारी किडनियां निकालकर विदेशियों को बेच देने के प्रोग्राम को सिर्फ इसीलिए मुल्तवी कर रहे है क्योंकि भारतीयों के पास मत शक्ति के रूप में एक ढाल है !! आप जैसे ही यह ढाल हटायेंगे राजवर्ग आपकी किडनी निकालने के लिए दरवाजा खटखटा देगा !!
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ब्रिटेन पूरी दुनिया से इसीलिए आगे निकल गया क्योंकि वहां के कार्यकर्ताओ ने 12 वी सदी में राजा की गर्दन दबाकर जूरी में आने की शक्ति पर हस्तक्षर करवा लिए थे। ब्रिटेन में नागरिको के पास वोटिंग पॉवर 1920 के आस पास आये थे। किन्तु जूरी सत्ता की ढाल होने कारण वे राजवर्ग+धनिको से खुद की रक्षा कर पाए।
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वोटिंग पॉवर की तुलना में जूरी पॉवर ज्यादा बेहतर ढाल है । वोटिंग पॉवर सिर्फ एक दिन के लिए मिलती है, और जिस दिन नागरिक वोट करके आता है, उसी समय वह अपनी ढाल भी राजवर्ग के पास जमा करके आ जाता है। अब अगले 5 वर्षो तक नागरिक के पास कोई ढाल नहीं है।
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इसके उलट जूरी पॉवर कभी निलम्बित नहीं होता और निरंतर नागरिक इसका इस्तेमाल करते रहते है। किसी देश में रोज सैंकड़ो झूठे-सच्चे मुकदमें दर्ज होते है और नागरिक निरंतर जूरी में जाकर मुकदमें सुनते है और फैसले देते है। अत: जिस देश के नागरिको के पास जूरी पॉवर है वहां राजवर्ग की दमन शक्ति में तेजी से गिरावट आ जाती है।
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अमेरिका के नागरिको के पास राजवर्ग से खुद को बचाने के लिए सबसे ज्यादा ढाले एवं इंतजामात है। अमेरिकियों के पास 5 प्रकार की सत्ता है जिनका इस्तेमाल वे राजवर्ग+धनिकों से खुद को बचाने के लिए करते है :
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(4a) उनके पास मत शक्ति (Voting Power) है,
(4b) जनमत संग्रह की शक्ति (Referendum) भी है,
(4c) जूरी में आने की सत्ता ( Jury Power) भी है,
(4d) वोट वापसी की शक्ति (Recall Power) भी है, और
(4e) विविध स्तरीय चुनाव प्रणाली (Multi Election) भी है।
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और इसके अलावा अमेरिकन नागरिको के पास बंदूक रखने की शक्ति भी है !! ताकि कोई जनरल जिया या मुशर्रफ आकर नागरिको की उपरोक्त सत्ता का निलम्बन न कर दें। इस तरह नागरिको के पास यदि बंदूक नहीं है तो ये सभी नागरिक सत्ताएँ अनाथ संताने है। बंदूक इन सभी सत्ताओ की माँ है, जो सभी नागरिक सत्ताओ की रक्षा करती है।
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सार यह है कि , जिस देश में नागरिक सत्ता के रूप में ढालो की संख्या बढ़ जाती है, वहां पर राजवर्ग द्वारा नागरिको के अन्यायपूर्वक शोषण करने की शक्ति में कमी आती है, और जिस देश के नागरिको के पास नागरिक सत्ता के रूप में कम ढाले है वहां पर राजवर्ग+धनिकों द्वारा किये जा रहे शोषण में इजाफा हो जाता है। नागरिको के पास जितनी कम ढाले होंगी शोषण / दमन उतना ही बढ़ जायेगा।
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(5) राजवर्ग+धनिक वर्ग का नागरिक सत्ता में बढ़ोतरी पर रूख :
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पिछले 10,000 वर्षो से दुनिया की सभी सभ्यताओं में राजवर्ग नागरिको को सत्ता देने के जबरदस्त खिलाफ रहा है। जब तक खून की नदियाँ ना बहने लगे तब तक राजवर्ग नागरिको की सत्ता बढाने वाली प्रक्रियाएं कभी लागू नहीं करता। असल में यह छीनने की चीज है, मांगने से कभी भी मिलती नहीं है !!
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Power cannot be Given... it has to be Taken !!
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(5.1) यदि राजवर्ग+धनिक यदि नागरिको को सत्ता दे देते है तो वे नागरिको को आसानी से लूट नहीं पायेंगे। आप राजवर्ग से अधिकार मांगेंगे तो वे आपको Terms & Condition apply वाला अधिकार दे देंगे, लेकिन सत्ता किसी भी सूरत में नहीं देंगे।
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(5.1.1) यदि आप अपने जिले / राज्य में “मास्क-वैक्सीन अनिवार्य” का क़ानून डालने का विरोध करेंगे तो वे आपके जिले / राज्य में “मास्क-वैक्सीन अनिवार्य” का कानून नही डालेंगे, लेकिन वे ऐसी प्रक्रिया कभी लागू नहीं करेंगे कि जिले / राज्य के नागरिक जनमत संग्रह की शक्ति का प्रयोग करके “सीधे” इस क़ानून को रद्द कर सके !!
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(5.1.2) यदि आप निर्भया रेप केस के आरोपियों को फांसी देने की मांग करेंगे तो वे उन्हें फांसी दे देंगे लेकिन नागरिको को यह पॉवर कभी नहीं देंगे कि देश के नागरिक जूरी में आकर “सीधे” इसका फैसला दे सके !!
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(5.1.3) यदि नागरिक किस मंत्री को निष्कासित करने की मांग करेंगे तो वे अमुक मंत्री को निष्काषित कर देंगे लेकिन नागरिको को यह शक्ति कभी नहीं देंगे कि नागरिक बहुमत का प्रदर्शन करके “सीधे” किस मंत्री को नौकरी से निकाल सके !!
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(5.1.4) यदि आप अपने जिले के एसपी को ट्रांसफर / सस्पेंड करने की मांग करते है तो वे एसपी को बर्खास्त कर देंगे लेकिन जिले के नागरिको को यह शक्ति नहीं देंगे कि वे अपने जिले के एसपी को “सीधे” निष्कासित करने के लिए बहुमत का प्रयोग कर सके।
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और इस तरह के हजारो उदाहरण दिए जा सकते है। वे आपको फ्री स्कूल देंगे, अस्पताल देंगे, भत्ते देंगे, रोजगार देंगे, फ्री अनाज-राशन देंगे, सड़के, पुल, विकास सभी कुछ दे देंगे, लेकिन जैसे ही आप उनसे नागरिक सत्ता वे वृद्धि करने वाली प्रक्रियाएं लागू करने को कहेंगे राजवर्ग की आँखे लाल हो जाती है !!
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सार यह है कि राजवर्ग+धनिक वर्ग नागरिको को सीधे निर्णायक सत्ता / शक्ति देने से अत्यंत घृणा करता है।
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(5.2) अब मैं आपको एक व्यवहारिक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करता हूँ कि कैसे नागरिक सत्ता में वृद्धि करने वाली प्रक्रियाएं खेल को पूरी तरह पलट कर रख देती है। हमेशा के लिए !! निचे मैंने नागरिक सत्ता बढ़ाने वाली 3 धाराओं की एक प्रक्रिया दी है। और मान लीजिये कि, मुख्यमंत्री अपने राज्य में निचे दी गयी प्रक्रिया को लागू कर देते है :
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(5.2a) यदि कोई मतदाता जिला कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है तो जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट स्वीकार कर लेगा और एक विशिष्ट सीरियल नंबर जारी करेगा। कलेक्टर यह शपथपत्र मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा, ताकि कोई भी नागरिक इसे बिना लॉग इन के देख सके।
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(5.2b) यदि कोई मतदाता धारा उपरोक्त धारा के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपनी स्वीकृति दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और मतदाता की स्वीकृति को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक कर देगा।
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(5.2c) यदि किसी शपथपत्र पर राज्य के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता हाँ दर्ज कर देते है तो मुख्यमंत्री अमुक शपथपत्र पर कार्यवाही करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते है।
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(5.3) यह प्रकिया किस तरह का बदलाव ले आती है ?
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मान लीजिये कि, राज्य / केंद्र सरकार ने “मास्क अनिवार्य” का क़ानून लागू किया है नागरिक उपरोक्त प्रक्रिया का निम्नलिखित तरीके से इस्तेमाल कर सकते है :
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पहली धारा का इस्तेमाल करके कोई भी नागरिक “मास्क अनिवार्य” के क़ानून को रद्द करने का एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकेगा।
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दूसरी धारा का इस्तेमाल करके राज्य के नागरिक इस कानून को खारिज करने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकेंगे।
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और जब किसी राज्य के 51% नागरिक अपनी स्वीकृति दर्ज करवा देंगे तो मुख्यमंत्री इस कानून को हटा देंगे।
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और इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करके राज्य के नागरिक स्वयं उन सभी गलत कानूनों को बहुमत का प्रदर्शन करके “सीधे” रद्द कर सकते है, जिन कानूनों को हटाना चाहते है। और नागरिक बहुमत का प्रदर्शन करके उन कानूनों को लागू करवा सकते है, जिन कानूनों को वे लागू करवाना चाहते है। और राज्य की तरह किसी जिले के नागरिक भी बहुमत का प्रदर्शन करके ये फैसले ले सकेंगे !! सीधे !!!
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तो यह एक उदाहरण है, जो इस बात को स्पष्ट करता है कि नागरिक सत्ता बढ़ाने वाली प्रक्रियाएं किस पैमाने का बदलाव ला सकती है। ऊपर दी गयी प्रक्रिया में शासन का कोई दखल नहीं है। पूरी प्रकिया नागरिको द्वारा ही शुरू की गयी है, और सरकार के किसी फैसले को खारिज / स्वीकार करने की अंतिम शक्ति भी नागरिको के पास है। यह एक जनमत संग्रह के सदृश प्रक्रिया है, और यह नागरिक सत्ता की श्रेणी की प्रक्रिया है, अधिकार नहीं।
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दुसरे शब्दों में, ऊपर दी गयी प्रक्रिया एक ढाल की तरह है, क्योंकि एक बार जिस देश / राज्य / जिले में यह प्रक्रिया लागू हो जाती है वहां के नागरिको को किसी गलत फैसले को पलटने के लिए कभी भी किसी नेता की जरूरत नहीं पड़ेगी !!
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(6) प्रजा विरोधी नेताओं / कार्यकर्ताओ को चिन्हित करना।
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मुझसे कई कार्यकर्ताओ द्वारा निरंतर यह पुछा जाता है कि, अमुक नेता/कार्यकर्ता कैसा है, या अमुक नेता/कार्यकर्ता के बारे में मेरा क्या विचार है।
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और जब भी मुझे यह चिन्हित करना होता है कि अमुक नेता / कार्यकर्ता / समाजसेवी / लेखक / बुद्धिजीवी / कलाकार आदमी प्रजा की तरफ है या राजवर्ग के पाले में है तो मैं उसे सिर्फ इस कसौटी पर परखता हूँ कि अमुक व्यक्ति प्रजा को ढाल देने की प्रक्रियाओं का समर्थन कर रहा है, या प्रजा को ढाल देने वाली प्रक्रियाओं के खिलाफ है।
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और जब मैं लोगो के चरित्र को इस कसौटी पर कसता हूँ तो मुझे इतिहास से लेकर वर्तमान तक के सभी महान लोग नंगे नजर आने लगते है। क्योंकि ये सभी नेता / कार्यकर्ता नागरिको को सिर्फ Terms & Condition apply वाला अधिकार दिलाना चाहते है, किन्तु नागरिको की सत्ता में वृद्धि करने का विरोध करते है !!
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(6.1) 1947 के जवाहर लाल से लेकर 2020 में मोदी साहेब तक भारत में जितने भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री हुए है मुझे वे सभी नेता प्रजा विरोधी नजर आने लगते है। कोई अपवाद नहीं !!
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इन सभी लोगो ने अच्छा शासन किया, या बुरा शासन किया, यह दीगर बात है। वे कितने न्याय प्रिय थे और कितने निर्मम थे, इसे भी जाने दीजिये। लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है, कि भारत के ये सभी नेता प्रजा की सत्ता में इजाफा करने के सख्त खिलाफ थे। कोई अपवाद नहीं !! कोई भी अपवाद नहीं !! और वे प्रजा की सत्ता में इजाफा करने के खिलाफ इसीलिए थे क्योंकि वे स्वयं राजवर्ग का हिस्सा थे !!!
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(6.2) भारत में पिछले 70 सालो में आज तक जितने भी विधायक-सांसद (और इनकी संख्या लाखों में है) हुए है, उनमें से किसी भी विधायक / सांसद ने अपनी जिन्दगी में कभी भी प्रजा की सत्ता बढ़ाने वाले किसी भी क़ानून का समर्थन नहीं किया, बल्कि उन्होंने पूरा जोर लगाकर उन सभी कानून प्रक्रियाओं का विरोध किया जिससे नागरिको की शक्ति में इजाफा हो !! एक भी अपवाद नहीं !! एक भी नहीं !!
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(6.3) अपनी पूरी जिन्दगी में मैंने आज तक किसी भी कथित महान और कथित ज्ञानी इंसान को नागरिको की सत्ता में वृद्धि करने वाली प्रक्रियाओ का समर्थन करते नहीं पाया !! इसीलिए राजवर्ग के शक्ति में इजाफा करने वाले कानूनों का समर्थन एवं प्रजा की शक्ति बढाने वाले कानूनों का विरोध करने वाले इन सभी महान / ज्ञानी लोगो से मुझे अत्यंत घृणा करता है !! कोई अपवाद नहीं !!
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इन सभी महान / बुध्दिजीवियों / ज्ञानियों ने जनता को गुमराह किया, और उन्हें ढाल विहीन बनाये रखने में कोई कसर नहीं रखी, ताकि राजवर्ग प्रजा का शिकार करते रह सके !! और उन्होंने नागरिक सत्ता को बढ़ाने वाले सभी प्रस्तावों का इसीलिए विरोध किया क्योंकि या तो वे खुद राजवर्ग में शामिल थे या फिर राजवर्ग से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे !!
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कार्यकर्ताओ से मेरा आग्रह है कि जब भी वे इतिहास के किसी महान व्यक्ति / ज्ञानी / बुद्धिजीवी / नेता के योगदान की पड़ताल करे तो उसे सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या वो नागरिक सत्ता में इजाफा करने वाले प्रस्तावों का समर्थन कर रहा था !! और आप पायेंगे कि सभी कथित महान व्यक्ति / राजनेता इस मुद्दे पर जानबूझकर खामोश थे !! क्योंकि वे राजवर्ग+धनिकों की आँख की किरकिरी नहीं बनना चाहते थे !!
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हम रिकालिस्ट है : आजादी आने से भारतीय नागरिको को सिर्फ मत शक्ति (Voting Power) मिली, और जैसा कि हम देख ही रहे है कि नागरिको को राजवर्ग से बचाने के लिए यह अकेली ढाल पर्याप्त नहीं है। हम भारत में कार्यकर्ताओ का एकमात्र समूह है जो जनता को सत्ता दिलाने वाली क़ानून प्रक्रियाओं की मांग को आगे बढ़ा रहे है !! हम Terms & Condition apply के वाले थोथे अधिकारों की मांग करने वालो की फेहरिस्त का हिस्सा नहीं है !! हम प्रजा को ढाल दिलाने की लड़ाई में है !!
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हमारा उद्देश्य नागरिको को कवच, बख्तर, ढाल से लैस कर देना है, ताकि नागरिक राजवर्ग के हमलो से खुद को प्रभावी ढंग से बचा सके। हमेशा के लिए !!
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[ टिप्पणी : एक प्रश्न / आरोप जिसका हम रिकालिस्ट्स को बार बार सामना करना पड़ता है कि – हम इतिहास एवं वर्तमान के लगभग सभी राजनेताओ / महान लोगो का विरोध क्यों करते है ? यह उत्तर इस सवाल के औचित्यपूर्ण जवाब की अंतर्दृष्टि देता है। ]
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