> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2020-09-23

Pawan Jury BhilwaraRj

कृषि बिल :
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(1) कांट्रेक्ट फार्मिंग के विवादों का निपटान करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को दिया गया है। मजिस्ट्रेट उस आदमी के पक्ष में फैसला सुनाएगा जो उसे ज्यादा घूस देगा। बड़े व्यापारी के पास ज्यादा पैसा होता है, अत: वे छोटे किसानो के खिलाफ फैसले निकलवा लेंगे।
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असल में, सरकार ऐसा कोई क़ानून नहीं बना सकती जो किसी भी पक्षकार को अदालत जाने से रोकता हो। इस तरह यह प्रावधान फर्जी है, और कोर्ट इसे उड़ा देगा। मतलब, व्यवहारिक रूप से यदि कोई पक्षकार जज के पास जाता है, और जज को दखल करना है तो जज मामला स्वीकार कर सकता है !!
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और यह खुली हुई बात है कि, जज फैसला घूस की राशि के आधार पर देते है। क़ानून और अनुबंध में कुछ भी लिखा हो, उन्हें उससे कोई मतलब नहीं होता !!
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(2) अभी तक जो व्यवस्था थी उसमें मंडियों में आढतियों (होलसेलर) ने जिला स्तर पर कार्टेल बनाया हुआ था और इस वजह से वे किसानो से कम दाम में फसल खरीदकर ज्यादा मुनाफा बना पाते थे। अब मंडियों के जिला स्तरीय कार्टेल को तोड़ दिया गया है, और इसकी जगह अब देश व्यापी कार्टेल ले लेगा !!
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मतलब अब पूरे देश में 25-50 कम्पनियां जरुरी जिंसो की कीमतों को देशव्यापी स्तर पर नियंत्रित कर सकेगी। पहले चरण में इससे उपभोक्ता एवं किसानो दोनों को फायदा होगा।
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उदाहरण के लिए, अभी व्यापारी किसान से 5 से 8 रू किलो में प्याज खरीदकर 30 रू किलो में बेच देते है। लदान भाड़ा, भण्डारण आदि का 5 रूपया और जोड़े तो भी 30-13 = 17 रू बिचौलियों में बंट जाता है। अब चूंकि बड़ी कम्पनियां सीधे खरीद करके असीमित भण्डारण कर सकती है, अत: वे किसान को 10 रू प्रति किलो तक दे देंगे और अपने स्टोर पर उपभोक्ता को 30 रू की जगह 25 रू में ही बेच देंगे।
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इस तरह प्रथम चरण में किसान एवं उपभोक्ता दोनों को 3 से 5 रू का फायदा हुआ। किन्तु एक बार कार्टेल (भंडारण, कांट्रेक्ट, रिटेलिंग स्टोर आदि का नेटवर्क) बनाने के बाद वे इस पर एकाधिकार बनाकर किसानो को कम कीमत देंगे और उपभोक्ता से ऊँचे दम वसूलेंगे !!
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इस व्यवस्था में छोटे कार्टेल को बड़ा कार्टेल खा जायेगा। वोल्यूम बड़ा होने एवं मोनोपॉली के कारण खाद्य जिंसो की कीमतों पर बड़े कारोबारियों का निर्णायक नियंत्रण रहेगा। और सरकार के हाथ में न कुछ रहने से वे कह सकते है कि अब महंगाई वगेरह बाजार के हवाले है, और सरकार इसमें कुछ न कर सकती है !!
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(3) कृषि से सम्बंधित 3 बिल पास किये गए है, और इनमें काफी विसंगतियां है। घूमा फिरा कर इन प्रावधानों से अंतिम चरण में बड़ी कम्पनियां की ताकत एवं मुनाफा बढ़ेगा। और पुलिस-अदालतों के बदतर होने से उनकी मूल्य नियंत्रण की उनकी इस ताकत में और भी इजाफा होगा।
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भारत में कृषि मंत्री कौन होगा इसका फैसला पेड मीडिया के प्रायोजक करते है, नागरिक नहीं। अत: पिछले कई सालो से कृषि मंत्री किसानी को ख़त्म करने और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ देने वाले क़ानून छापते रहे है, और आगे भी वे पेड मीडिया के प्रायोजको को मुनाफा देने वाले क़ानून बनाते रहेंगे।
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(4) समाधान :
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(4.1) कांट्रेक्ट के विवादों का निपटान करने का "अधिकार" नागरिको की जूरी को दिया जाना चाहिए। यदि यह अधिकार जूरी को दे दिया जाए तो जूरी मंडल बड़े व्यापारियों से छोटे किसानो की निरंतर रक्षा करता रहेगा।
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(4.2) यदि कृषि मंत्री को वोट वापसी पासबुक के दायरे में कर दिया जाए तो नागरिको यह अधिकार मिल जायेगा कि वे कृषि मंत्री को निष्काषित करने का फैसला कर सके। और इस तरह कृषि मंत्री वे नीतियाँ बनाना शुरू करेगा जो किसानो के हित में हो, पेड मीडिया के प्रायोजको के हित में न हो।
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(5) जरुरी बात :
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(5.1) चूंकि पेड मीडिया के प्रायोजक "नागरिको को अधिकार" देने के सख्त खिलाफ है। अत: RSS ने बिल में कोंट्रेक्ट के विवादों का फैसला करने का अधिकार नागरिको की जूरी को न देकर जजों+मजिस्ट्रेट के पास ही रखा है।
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साथ ही वे कृषि मंत्री को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के भी खिलाफ है। क्योंकि इससे "नागरिक अधिकारों" में वृद्धि होती है।
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(5.2) चूंकि पेड मीडिया के प्रायोजक नागरिको को "अधिकार" देने के सख्त खिलाफ है। अत: कोंग्रेस ने भी सरकार से यह मांग नहीं की है कि, कोंट्रेक्ट के विवादों का फैसला करने का अधिकार नागरिको की जूरी को दिया जाना चाहिए।
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और कोंग्रेस भी कृषि मंत्री को वोट वापसी पासबुक एक दायरे में लाने के खिलाफ है !!
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कोंग्रेस यह जता रही है कि वे किसानो की लड़ाई लड़ रही है !! जबकि कोंग्रेस भी बीजेपी=आरएसएस के तरह किसानो एवं नागरिको को "अधिकार" देने के खिलाफ है, और इस तरह पेड मीडिया के प्रायोजको के पाले में है।
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दुसरे शब्दों में, बीजेपी एवं कोंग्रेस दोनों का यह कहना है कि, किसानो एवं नागरिको का हित किस क़ानून में है इसका फैसला "हम" करेंगे किन्तु नागरिको-किसानो को यह अधिकार नहीं देंगे कि वे इस बारे में खुद फैसला कर सके !!
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(5.3) चूंकि पेड मीडिया के प्रायोजक नागरिको को "अधिकार" देने के सख्त खिलाफ है। अत: षड्यंत्रकारी सिद्धांतो को बढ़ावा देकर नागरिको का टाइम पास एवं समय बर्बाद करने वाले कार्यकर्ता (जैसे न्यू वर्ल्ड ऑर्डर, इलुमिनाटी आदि प्रोपेगेंडा चलाने वाले) भी कोंट्रेक्ट फार्मिंग के विवादों का फैसला करने का अधिकार नागरिको की जूरी को देने का समर्थन नहीं करते।
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और ये षड्यंत्रकारी कार्यकर्ता (कोंस्पिरेसी थ्योरिस्ट) वोट वापसी कृषि मंत्री के क़ानून के विरोध में भी है। क्योंकि यदि कृषि मंत्री वोट वापसी पासबुक के दायरे में आ जाता है, तो कृषि मंत्री पेड मीडिया के नियंत्रण से निकलकर सीधे नागरिको के "नियन्त्रण" में आ जाएगा, और तब पेड मीडिया के प्रायोजक कृषि मंत्री को बाध्य करके मन मुताबिक क़ानून नहीं बनवा पायेंगे !!
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तो जब भी कोई व्यक्ति "नागरिक अधिकारों में वृद्धि" की बात करे तो नागरिक अधिकारों की मांग को चर्चा से बाहर रखने के लिए षड्यंत्रकारी सिद्धांतो के प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल करते है।
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इस तरह षड्यंत्रकारी सिद्धांतो का प्रचार करने वाले कार्यकर्ता भी "नागरिक अधिकारों में वृद्धि" के खिलाफ है, ताकि पेड मीडिया के प्रायोजको एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको की शक्ति में इजाफा हो।
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