Pawan Jury BhilwaraRj
1968, "भारतीय असभ्य, गंवार और जाहिल है। अत: उन्हें बंदूक रखने का अधिकार देने से वे एक दुसरे को मार देंगे !!"
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"आरामकुर्सी ही नहीं सभी कुछ मध्य्कालीन था। तख़्त, उसके ऊपर पड़ा हुआ दरी का चिथड़ा, कलमदान, सुखी हई स्याही की दवातें, मुड़े हुए कोनो वाले मटमैले रजिस्टर --- सभी कुछ शताब्दी पुराना दीख रहे थे !!
अभी इस थाने के लिए फाउंटेन पेन नहीं बना था, उस दिशा में कुल इतनी तरक्की हुयी थी कि कलम सरकंडे का नहीं था !! यहाँ के लिए अभी टेलीफोन ईजाद भी नहीं हुआ था !! हथियारों में कुछ प्राचीन राइफलें थी, जो लगता था कि गदर के दिनों में इस्तेमाल हुयी होंगी। वैसे सिपाहियों के साधारण प्रयोग के लिए बांस की लाठी थी, जिसके बारे में एक कवि ने बताया है कि, वह नदी-नाले पार करने और झपट कर कुत्ते को मारने में उपयोगी साबित होती है।
यहाँ के लिए अभी जीप का अस्तित्व नहीं था। उसका काम करने के लिए दो-तीन हवलदारो के प्यार की छांह में पलनेवाली घोडा नाम की एक सवारी थी, जो शेरशाह के जमाने में भी हुआ करती थी !!
थाने में आते ही लगता था कि किसी ने उसे कई सौ साल पीछे फेंक दिया है। अगर उसने अमेरिकी जासूसी उपन्यास पढ़े हो तो वह बिलबिलाकर देखना चाहता कि उँगलियों के निशान देखने वाले शीशे, कैमरे, वायरलेस लगी हुयी गाड़ियाँ -- ये सब कहाँ है !!
बदले में उसे सिर्फ वह दिखता जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। साथ ही एक नंग धडंग लंगोटबंद आदमी जो इमली के पेड के निचे भंग घोट रहा होता। बाद में पता चलता कि वह अकेला आदमी 20-25 गाँवों की सुरक्षा के लिए तैनात है, और जहाँ जिस हालत में वो है उसी हालत में वह 20 गाँवो में अपराध रोक सकता है, अपराध हो गया हो तो उसका पता लगा सकता है, और यदि अपराध नहीं हुआ हो तो अपराध करवा भी सकता है !!
कैमरा, शीशे, कुत्ते उसके लिए वर्जित है। इस तरह थाणे का वातावरण बड़ा ही रमणीक, और बीते दिनों के गौरव के अनुकूल था। जिन रोमांटिक कवियों को बीते दिनों की याद सताती है, उन्हें कुछ दिन रोके रखने के लिए यह थाना एक आदर्श स्थान था !!
जनता को दरोगा जी एवं सिपाहियों से बड़ी आशाएं थी। 250-300 गाँवों के उस थाने में यदि 8 मील दूर किसी गाँव में नकब लगे तो विश्वास किया जाता था कि इनमे से कोई न कोई इसे जरुर देख लेगा। 12 मील पर यदि डाका पड़े तो इनसे उम्मीद थी की ये डाकूओ से पहले पहुँच जायेंगे।
और इसी विश्वास पर किसी भी गाँव में इक्का दुक्का बन्दूको को छोड़कर हथियार नहीं दिए गए थे। हथियार देने से डर था कि गाँव में रहने वाले बर्बर और असभ्य आदमी बन्दूको का इस्तेमाल सीख जायेंगे, जिससे वे एक-दुसरे की हत्या करने लगेंगे, खून की नदियाँ बहने लगेगी। जहाँ तक डाकूओ से उनकी सुरक्षा का सवाल था, वह दरोगा जी और उनके दस बारह आदमियों की जादूगरी पर छोड़ दिया गया था.... "
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राग दरबारी से साभार, रचना काल - 1966, लेखक - श्रीलाल शुक्ल।
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मतलब यह है कि, -- "भारतीयों को बंदूक देने से वे एक दुसरे को मार देंगे" थ्योरी नयी नहीं है। पेड मीडिया तब भी नागरिको को यही परोस रहा था, और आज भी यही परोस रहा है। श्री लाल शुक्ल ने पेड मीडिया द्वारा जनमानस में प्लांट की गयी इस थ्योरी को उपरोक्त प्रकरण में बहुत अच्छे ढंग से रेखंकित किया है।
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( दिल्ली दंगो के दौरान कई नागरिको पुलिस बुलाने के लिए फोन किये थे, किन्तु पुलिस उन तक पहुँच नहीं पायी !! और ऐसा ही कश्मीरी पंडितो के साथ 1990 में और 2012 में असमियों के साथ हुआ था, जब सिर्फ 5,000 के हथियारबंद दस्ते ने 4 लाख हिन्दुओ को कोकराझार से पलायन करने को मजबूर कर दिया था। )
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