> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-08-06

Pawan Jury BhilwaraRj

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और 35A हटने के बाद क्या निर्णायक बदलाव आयेंगे ?
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(1) पहली बात : सरकार ने अनुच्छेद 370 में बदलाव किया है, इसे पूरी तरह ख़त्म नहीं किया है। परन्तु सरकार द्वारा लाये गए नोटिफिकेशन द्वारा इसमें पर्याप्त बदलाव किया जा चुका है, अत: पूरी तरह हटाने और बदलाव करने में अब सिर्फ प्रतीकात्मक अंतर है। इसमें क्या अंतर है, इस मैं बाद में लिखूंगा।
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(A) धारा 370 में बदलाव : सार रूप में इस बदलाव के बाद भारत के नागरिको एवं भारत की केंद्र सरकार का कश्मीर में दखल बढ़ जाएगा। धारा 370 के कई प्रावधान कश्मीर की भारत से एकरूपता बनाने में बाधा डालते है। अब यह बाधा नहीं रही है। भारत सरकार एवं संविधान की सीमा बढ़ने के कारण यह हमारी स्थिति को कश्मीर में मजबूत बनाता है।
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मैं सरकार के इस कदम का समर्थन करता हूँ। मोदी साहेब के इस कदम का स्वागत है, और मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। साथ ही संघ=बीजेपी के सभी कार्यकर्ता, मोहन भागवत एवं अमित शाह को भी धन्यवाद कि उन्होंने इस मामले को आगे बढ़ाया।
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(B) कश्मीर का पुनर्गठन : मैं इस बिल का भी समर्थन करता हूँ। जम्मू कश्मीर का राजनैतिक-भौगोलिक परिसीमन आनुपातिक ढंग से करने से प्रशासन ज्यादा सुविधापूर्ण ढंग से काम करेगा । दुसरे शब्दों में इससे शासकिय प्रबंधन एवं नियंत्रण में सुधार होगा।
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किन्तु यहाँ एक बात पर ध्यान देने की जरूरत है : सरकार ने जम्मू एवं कश्मीर का दर्जा घटा कर इसे केंद्र शासित प्रदेश का स्टेटस दे दिया है। ऐसा करना जरुरी भी था, ताकि यदि लाये गए इस बिल के कारण वहां पर हालात काबू से बाहर होते है तो केंद्र सरकार इसे नियंत्रित कर सके।
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अब यह बेहद जरुरी है कि मोदी साहेब अपना कार्यकाल ख़त्म होने से पहले जम्मू एवं कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा बहाल कर दें। यदि उन्होंने अपने कार्यकाल में यह बदलाव नहीं किया तो यह मामला अटक जाएगा और इसके परिणाम विपरीत आयेंगे। सरकार ने आश्वासन दिया है कि वे स्थिति के सामान्य होते ही राज्य का दर्जा फिर से बहाल कर देंगे। अभी मोदी साहेब के पास पूरे 5 साल का कार्यकाल शेष है, और मुझे उम्मीद कि वे अपना कार्यकाल ख़त्म होने से पहले यह फैसला ले लेंगे।
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(2) दूसरी बात : मोदी साहेब ने कश्मीर का पुनर्गठन करने के लिए जम्मू कश्मीर की विधानसभा की अनुमति नहीं ली है। उन्होंने केंद्र सरकार के प्रतिनिधि (राज्यपाल) की अनुमति से इस बिल का अनुमोदन कराया है। सुप्रीम कोर्ट के जज इस पॉइंट को स्टेंड बनाकर इस बिल को खारिज कर सकते है। वैसे सुप्रीम कोर्ट के जजों को इस पॉइंट की भी जरूरत नहीं है। उनके पास पूरा संविधान पड़ा है, किसी भी अनुच्छेद का हवाला देकर वे इस क़ानून को उड़ा सकते है।
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और सबसे बड़ी बात यह कि वे इस पर तुरन्त फैसला नहीं देंगे। इसकी फ़ाइल बनाकर अपनी दराज में डाल देंगे। और फिर 2-5 साल बाद जब भी उन्हें इस बिल को ख़ारिज करना होगा तब इसे टॉप गियर में डालकर बिल उड़ा देंगे !!
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(2.1) समाधान : सुप्रीम कोर्ट के जज इस क़ानून को केंसिल न करें इसके लिए नागरिको को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज को एक पोस्ट कार्ड लिखना चाहिए। पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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" मुख्य न्यायाधीश महोदय , 5 अगस्त 2019 को सरकार द्वारा जम्मू एवं कश्मीर के बारे में छापे गए गेजेट नोटिफिकेशन को निरस्त करने के बारे में दायर की गयी कोई याचिका स्वीकार ना करे। इस अधिसूचना का गेजेट क्रमांक 444 एवं आदेश संख्या 551 (अ) है। "
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यदि आप यह पोस्टकार्ड भेजते है तो रिकॉर्ड के लिए इसकी एक फोटोकॉपी अपने पास रखें। ऊपर दी गयी इबारत उस तरफ ही लिखे जिधर पता लिखा जाता है। और प्रेषक की जगह पर अपना नाम एवं वोटर नंबर लिखे।
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सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज का पता : मुख्य न्यायाधीश , उच्चतम न्यायालय , दिल्ली।
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(3) तीसरी बात : मैं अपने बहुधा जवाबो में यह जिक्र करते रहता हूँ कि भारत में ऐसी एक भी समस्या नहीं है जिसके लिए प्रधानमंत्री को संविधान छूने या संसद में पैर रखने की जरूरत पड़े । देश की सभी समस्याओ का समाधान सिर्फ गेजेट नोटिफिकेशन से किया जा सकता है। पर भारत के पेड बुद्धिजीवी और पेड मीडिया कर्मी नागरिको को गेजेट के बारे में सूचना नहीं देना चाहते अत: देश की किसी भी समस्या को डिरेल करने के लिए बहस के बीच में संविधान को लाकर पटक देते है।
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धारा 370 में बदलाव करने का नोटिफिकेशन मोदी साहेब ने सीधे गेजेट में प्रकाशित किया !! इसे संसद में नहीं भेजा गया !! धारा 370 में बदलाव के निस्बत संसद में जो कुछ भाषण बाजी आप देख रहे थे वह एक रस्म थी। संसद में जो वोटिंग की गयी वह सिर्फ कश्मीर पुनर्गठन बिल के बारे में थी धारा 370 में बदलाव के बारे में नहीं !!
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मतलब पीएम को जब कोई काम करना होता है तो उसके पास सबसे ताकतवर माध्यम गेजेट है। यदि मोदी साहेब चाहते तो जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल को भी अध्यादेश के रूप में पहले गेजेट में प्रकाशित कर देते और बाद में वोटिंग करवाते !! तो जब किसी पीएम को काम करना होता है तो वह गेजेट उठाता है , लेकिन जब उसे ड्रामा या टाइम पास करना हो तो वह राज्य सभा में बहुमत नहीं है, लोकसभा में नंबर नहीं है, संविधान के खिलाफ है टाइप के डायलॉग सुनाएगा !!
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लेकिन यदि मोदी साहेब अपना कार्यकाल ख़त्म होने से पहले कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल नहीं करते है, तो कश्मीर की अवाम खुद को दोयम दर्जे का नागरिक समझकर अलग थलग महसूस करने लगेगी और धीरे धीरे जन समर्थन हमारे खिलाफ होने लगेगा। तब यह एक समस्या को ख़त्म करने के चक्कर में दूसरी समस्या खड़ी हो जाने वाली बात हो जायेगी
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(4) कश्मीर में शांति बहाली :
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मेरा मानना है कि , कश्मीर पर वास्तविक नियंत्रण हथियारों से ही आ सकता है, कागज में हम कुछ भी छापते रहे , इससे कोई विशेष फर्क नहीं आता। उदाहरण के लिए मुंबई में जब कसाब आकर 66 लोगो को उड़ा देता है तो इससे कोई फर्क नहीं आता कि मुंबई केंद्र शासित प्रदेश है या पूर्ण राज्य है, या वहां पर कौनसी धारा लगी हुयी है । कसाब के पास हथियार थे और उसने कुछ घंटो के लिए मुंबई के एक हिस्से को टेक ओवर कर लिया था। बस यही वास्तविकता है।
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जब 1990 में कश्मीरी पंडितो को रातों रात पलायन करना पड़ा तो इसकी वजह यह नहीं थी कि धारा 370 में क्या लिखा है। वजह यह थी कि वे जिस सोसाईटी में रह रहे थे उनमे से कुछ लोगो के पास बंदूके थी और बंदूक वालो ने उन्हें खदेड़ दिया। यदि कश्मीरी पंडितो के पास भी बंदूके होती तो कश्मीरी पंडितो के पास तीन विकल्प होते —
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या तो वे इस्लाम स्वीकार करते, या
लड़ते , या फिर
पलायन करते
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पर हथियार विहीन होने के कारण उनके पास सिर्फ दो विकल्प थे –
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अपनी जान-माल-असबाब लेकर पलायन करो !!
या फिर इस्लाम स्वीकार करो !!
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नक्सली प्रभावित इलाके भी भारत के पूर्ण राज्य है, और वे सीमावर्ती भी नहीं है। किन्तु वहां पर वे हथियारों के बल पर गाहे बगाहे विचलन पैदा करते रहते है।
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ठीक इसी तरह से हम कागज में यह क़ानून बना सकते है कि आप कश्मीर में जमीन खरीद पर फैक्ट्री लगा सकते है। लेकिन जिस स्टेट में निरंतर सेना रखनी पड़ती है, उस स्टेट में निवेश करने वही जायेगा जिसके पास अरबों-खरबों डॉलर हो। मतलब इतना ताकतवर समूह जिसके पास अपने साजो समान की आतंकियों से रक्षा करने के लिए प्राइवेट सुरक्षा हो या फिर सरकार उन्हें सुरक्षा घेरा प्रदान करे।
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कश्मीर सीमावर्ती इलाका है, और वहां पर 3 देशो का दखल है। वहां पर पाकिस्तान एवं अन्य मुजाहिद संगठन हथियारों की सप्लाई भेजते रहते है। तो या तो आपको वहां पर हमेशा सेना रखनी पड़ेगी या फिर वहां के नागरिको को ही हथियार रखने की इजाजत देनी पड़ेगी। इस मामले से निर्णायक रूप से निपटने का और कोई रास्ता नहीं है।
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(5) तो इस स्थिति में कश्मीर के सिर्फ दो समाधान है :
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(5.1) भारत अपनी सेना को अमेरिका के बराबर मजबूत बनाए
ताकि भारत की सेना अमेरिका+पाकिस्तान+चीन के दखल को रोक सके। यदि भारत अपनी सेना को अमेरिका के बराबर मजबूत बना लेता है तो हमें वहां पर निरंतर सेना रखनी की जरूरत नहीं रहेगी । मतलब तब कश्मीर में जन जीवन समान्य हो जाएगा ।
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(5.2) कश्मीर का भारत के किसी अन्य राज्य में विलय करे ( विभाजन नहीं।)
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विलय करने के लिए हमारा प्रस्ताव इसे हिमाचल में मिला देने का है। इस तरह कश्मीर वास्तविक रूप से स्पेशल स्टेटस खो देगा और यह भारत के अन्य राज्यों की तरह एक टेरेटरी हो जायेगी। और तब हम इस राज्य के प्रत्येक नागरिक को बंदूक रखना अनिवार्य करने का क़ानून बना सकते है।
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क्योंकि यदि आप भारत की सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाने के लिए आवश्यक क़ानून ( जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स, धन वापसी पासबुक ) गेजेट में छापने को राजी नहीं है तो आपके पास हर नागरिक को बंदूक देने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। यदि हमने वहां के नागरिको को बंदूक नहीं थमाई तो कश्मीर को गंवाने की संभावनाएं बढती जायेगी। बुरी खबर यह है कि पाकिस्तान POK के नागरिको को बंदूक रखने की अनुमति देने का क़ानून बनाने पर विचार कर रहा है !!
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बहरहाल , हमारे लिए अच्छी बात यह है कि मोदी साहेब ने इस दिशा में एक अच्छा कदम उठाकर बात आगे बढ़ाई है।
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