Pawan Jury BhilwaraRj
क्या मोदी साहेब ने असंवैधानिक रूप से धारा ३७० को हटाया है ?
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तकनिकी पक्ष यह है कि : जम्मू-कश्मीर की विधानसभा से अनुमति लिए बिना धारा 370 में बदलाव करने का नोटिफिकेशन निकालना गैर कानूनी है।
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किन्तु व्यवहारिक पक्ष यह है कि : धारा 370 में जो बदलाव किया गया है वह देश हित में है और यह जम्मू-कश्मीर के हित में भी है।
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अब प्रश्न यह है कि हमें किस और जाना चाहिए ?
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देशहित को तवज्जो दें या क़ानून को।
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दरअसल अब यह अपनी अपनी सुविधा का मामला है। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि - क़ानून का पालन करो, उसका मखौल न बनाओ । तो वह सही कहता है, और हमें उसे तवज्जो देनी चाहिए। क्योंकि यदि क़ानून को तवज्जो देना बंद कर दिया जाए तो अराजकता आयेगी और लॉ एंड ऑर्डर फेल हो जाएगा !!
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किन्तु यदि हम 60 साल पहले की गयी किसी क़ानूनी गलती के चक्कर में आकर देशहित की अवहेलना करते है तो यह लकीर का फ़क़ीर बनने बाली बात हुयी है।
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मेरा इस पर स्टेंड यह है कि : इस तरह के मामलों का निस्तारण क़ानून के इंटरप्रिटेशन से होता है।
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मतलब जिस आदमी के पास क़ानून को इंटरप्रेट करने की शक्ति है, वह इसे जैसे भी इंटरप्रेट करेगा वही इसका सही अर्थ होगा। भारत में संविधान एवं कानूनों को इंटरप्रेट करने की अंतिम और निर्णायक शक्ति भारत के नागरिको के बहुमत के पास है। क़ानून की दुनिया का एक अलिखित क़ानून यह है कि, जो व्यक्ति / सदन / निकाय / समूह कोई क़ानून लागू करता है उसमे संशोधन लाने, उसे निरस्त करने और उसकी व्याख्या करने का अंतिम अधिकार उसी निकाय के पास रहता है।
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निचे भारतीय संविधान की प्रस्तावना दी गयी है। इस प्रस्तावना के शुरूआती 2 शब्द एवं अंतिम वाक्य पढ़िए। यह कहता है : हम, भारत के लोग........ अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 को को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
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प्रस्तावना :
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हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए,
तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी ) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
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तो भारत का संविधान भारत के नागरिको ने अपने ऊपर लागू किया था। इस तरह नागरिको का बहुमत वह सर्वोच्च शक्ति है जो इस संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार रखती है। संसद नागरिको द्वारा चुनी जाती है और इसी वजह से संसद क़ानून बनाने में सर्वोच्च है।
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किन्तु 1950 में संविधान के लागू होने के बाद से सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस शक्ति को धीरे धीरे अपने कब्जे में लेना शुरू किया और आज सुप्रीम कोर्ट के जज कानूनों की व्याख्या का अंतिम अधिकार पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले चुके है।
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मोदी साहेब ने वहां पर राष्ट्रपति शासन लगाया और राज्यपाल की अनुमति लेकर यह नोटिफिकेशन निकाल दिया। अब अपने आप में यह बात सही है कि मोदी साहेब ने घी निकालने के ऊँगली टेढ़ी की है। किन्तु मेरा मानना है कि क़ानून में जो भी लिखा हो सरकार ने धारा 370 में बदलाव लाकर अच्छा किया है।
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एक सम्भावना यह है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा और वहां अटका रहेगा। अभी देश का जो माहौल है उसमे कोई भी जज यह नोटिफिकेशन रद्द करने की हिम्मत नहीं दिखायेगा। लेकिन 2-4 साल बाद जब मामला शांत हो जाएगा या मोदी साहेब सत्ता से बाहर हो जायेंगे तब सुप्रीम कोर्ट इस फैसले को इस आधार पर पलट सकता है कि यह गैर कानूनी है।
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वे ऐसा कब करेंगे ?
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जब कोंग्रेस की या संयुक्त मोर्चे की सरकार सत्ता में आएगी। तब सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ति में सरकार की भूमिका होगी और वे उस आदमी को सुप्रीम कोर्ट का जज बनायेंगे जो इस केस में यह फैसला दे। ज्यादातर सम्भावना है कि उस समय सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के भ्रष्ट जजों में एक कम्पीटीशन शुरु हो जाएगा और वे कहेंगे कि आप हमें सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दो और हम इस क़ानून को गैर कानूनी घोषित कर देंगे !!
और उस समय आप देखेंगे कि जितने भी बुद्धिजीवी और संविधान विशेषग्य आज यह कह रहे है कि यह फैसला ठीक है, वे ही यह कहना शुरू करेंगे कि वह नोटिफिकेशन गैर कानूनी था। क्योंकि अल्टीमेटली तो यह नोटिफिकेशन गैर कानूनी ही है।
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समाधान :
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सुप्रीम कोर्ट के जज इस क़ानून को केंसिल न करें इसके लिए नागरिको को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज को एक पोस्ट कार्ड लिखना चाहिए। पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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" मुख्य न्यायाधीश महोदय , 5 अगस्त 2019 को सरकार द्वारा जम्मू एवं कश्मीर के बारे में छापे गए गेजेट नोटिफिकेशन को निरस्त करने के बारे में दायर की गयी कोई याचिका स्वीकार ना करे। इस अधिसूचना का गेजेट क्रमांक 444 एवं आदेश संख्या 551 (अ) है। "
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यदि आप यह पोस्टकार्ड भेजते है तो रिकॉर्ड के लिए इसकी एक फोटोकॉपी अपने पास रखें। ऊपर दी गयी इबारत उस तरफ ही लिखे जिधर पता लिखा जाता है। और प्रेषक की जगह पर अपना नाम एवं वोटर नंबर लिखे।
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सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज का पता : मुख्य न्यायाधीश , उच्चतम न्यायालय , दिल्ली।
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कृपया इस बात को नोट करें कि पोस्टकार्ड में यह बात अवश्य लिखे कि -- याचिका स्वीकार ही नहीं करनी है।
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उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट को यह पॉवर है कि वह कोई याचिका स्वीकार करें या ना करें !! मतलब हमें वो ठूंठ ही न चाहिए जिस पर उल्लू आकर बैठे। यदि याचिका स्वीकार हो गयी तो कभी न कभी झमेला हो जाएगा।
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आपको लग सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश पर आम नागरिको की चिट्ठी से क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन इससे फर्क आता है। नागरिक के सामने सुप्रीम कोर्ट का जज कुछ नहीं होता है। नौकर आदमी है, और हमने उसे 2 लाख रूपये महीने पर नौकरी पर रख रखा है। बस इस आदमी में इतनी ही वैल्यू होती है। लोकतंत्र में मतदाता सर्वोच्च है।
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मतदाता के बाद उस इंसान में कीमत है जिसे मतदाता ने चुना है, या वह मतदाताओ के बहुमत का प्रतिनिधित्व करता है। इस तरह पीएम वह आदमी है जिसमे कीमत है। क्योंकि वह चुनकर आता है। यदि आप मानते है कि एक नागरिक सुप्रीम कोर्ट के जज को निर्देश नहीं भेज सकता तो बुरा मत मानिए किन्तु तब आप लोकतंत्र में अपनी स्थिति में गिर चुके है, और शासित होने की ग्रंथि के शिकार है। अत: बेहतर है कि आप मतदाता के रूप में अपनी हैसियत का पुनरावलोकन करना शुरू करें। बहरहाल, यदि आप पोस्टकार्ड खरीदने और भेजने का कष्ट नहीं उठाना चाहते तो बात अलग है।
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क्या मोदी साहेब सुप्रीम कोर्ट के जज को यह याचिका स्वीकार करने से रोक सकते है ?
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नहीं !! मोदी साहेब अब ऐसा नहीं कर सकते है। संविधान के दायरे में अब उनके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वह निकाले गए किसी नोटिफिकेशन को न्यायिक पुनरावलोकन से रोक सके। वे अपनी बाजी चल चुके। यदि याचिका आती है तो सम्भावना है कि सुप्रीम कोर्ट के जज इसे स्वीकार कर लेंगे। और इसमें मोड़ तब आएगा जब मोदी साहेब सत्ता खो देंगे।
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मेरा मानना है कि यदि देश भर से 2 लाख लोग भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पोस्टकार्ड भेज दे तो सुप्रीम कोर्ट का जज दबाव में आ जाएगा और याचिका स्वीकार होने की सम्भावना कम हो जायेगी। जितनी ज्यादा चिट्ठियां जायेगी असर भी उतना ही बढेगा। और यदि ये सभी लोग अपने पोस्टकार्ड की इमेज फेसबुक / कोरा / व्हाट्स एप पर भी डालते रहते है तो दबाव 20 गुना तक बढ़ जाएगा !!!
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मैंने 5 तारीख को ही अपना पोस्टकार्ड भेज दिया था। क्योंकि मुझे यह पता था कि मोदी साहेब ने जिस रूट का इस्तेमाल किया है उस रूट में सुप्रीम कोर्ट किसी भी समय रोल में आ जाएगा।
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दरअसल , एक स्थिति ऐसी भी आती है जब "ज्ञान देने" की जगह कदम उठाने की जरूरत होती है। यह उसी तरह की बात है। तो इस नोटिफिकेशन का समर्थन करने वाले सभी नागरिको से मेरा आग्रह है कि 10 मिनिट निकालकर सुप्रीम कोर्ट के जज को एक पोस्टकार्ड भेज दें।
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यह अपना नागरिक कर्तव्य पूरा करने की तरह है। यदि आप सुप्रीम कोर्ट को पोस्टकार्ड नहीं भेजते हो और सुप्रीम कोर्ट का जज यह याचिका स्वीकार कर लेता है तो इसमें सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज का कोई दोष नहीं होगा। क्योंकि आपने सुप्रीम कोर्ट के जज को इस बारे में कोई निर्देश नहीं भेजा था। और टेक्निकली सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को सिर्फ एक मतदाता ही निर्देश भेज सकता है। पीएम-सीएम-सांसद-विधायक आदि इस शक्ति से वंचित है।
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तो आप अपने बारे में फैसला करिए कि आप इस नोटिफिकेशन को कैसे इन्टरप्रेट करना चाहते है। यदि आपकी व्याख्या है कि नोटिफिकेशन लाने का फैसला सही है, तो आप पोस्टकार्ड भेजकर अपना इंटरप्रिटेशन सुप्रीम कोर्ट जज को भेज सकते है।
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