Pawan Jury BhilwaraRj
1954 में बनी अकिरा कुरोसोवा कि महान फिल्म "सेवेन समुराई" ( शोले जिसका रीमेक है ) betrayal by beneficiaries के बारे में बताती है।
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एक गाँव डाकुओ के गिरोह से पीड़ित है। वे लड़ना नहीं चाहते। अत: 7 जरायम पेशा योद्धाओ को रोटीयों के बदले अपनी जंग लड़ने के लिए किराए पर ले आते है। लेकिन उनके पास समुराई को अनुबंधित द्रव्य देने कि भी हैसियत नहीं है। किन्तु समुराई जंग लड़ने का फैसला करते है। एक लम्बी लड़ाई के बाद समुराई योद्धा डाकुओ का सफाया कर देते है जिसमे 4 समुराई योद्धा भी मारे जाते है। लेकिन डाकुओ के भय से मुक्त होते ही गाँव के लोग अपने पैदाइशी टुच्चेपन पर लौट आते है , और बचे हुए समुराई योद्धाओ को गाँव छोड़कर जाना पड़ता है। उनके लिए वहां कोई जगह नहीं है।
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बाद में लगभग सभी देशो में इस थीम पर फिल्मे बनायी गयी और आज भी इस थीम पर लगातार फिल्मे बनायी जाती है। आपराधिक प्रष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्मो में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय विषय है। लेकिन किसी भी फिल्मकार ने seven samurai के अंत को नहीं दोहराया। क्योंकि इस फिल्म का अंत कठोर यथार्थ है , व दर्शको के हाजमे के खिलाफ पड़ता है।
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शोले में वीरू बसंती के साथ वापिस शहर लौटने के लिए ट्रेन पर सवार हो जाता है। उसे विदाई देने के लिए प्लेटफोर्म पर सिर्फ ठाकुर खड़ा है। शेष गाँव वाले अपने अपने रोजगार में व्यस्त है। वीरू गाँव में ही रह जाना चाहता था। किन्तु जंग जीत जाने के बाद वीरू के लिए यही बेहतर है कि वह गाँव छोड़ दे। यदि गब्बर जेल से फिर छूट आता है तो वीरू को फिर से बुला लिया जाएगा !!
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( वास्तविक कथा में गब्बर ओम शिवपुरी ( पुलिस अधिकारी ) और जज को पैसा देकर फिर छूट जाता है और आकर ठाकुर के पैर भी काट देता है। गाँव वाले वीरू को फिर से बुलाते है , लेकिन बसंती वीरू को लौटकर जाने से मना कर देती है। )
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