> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-05-15

Pawan Jury BhilwaraRj

हास्यास्पद --- 90 साल बाद अब बीजेपी के शीर्ष नेता मोहन भागवत यह दावा कर रहे है कि महात्मा राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे !!! शायद 2019 आते आते संघ यह भी बताने लगे कि महात्मा भगत सिंह जी भी लकड़ी चलाना सीखने के लिए नियमित रूप से शाखा जाते थे !!
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संघ के प्रचारक नरेन्द्र सहगल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि महात्मा राजगुरु शाखा भी जाते थे , और जब ब्रिटिश सरकार उनका पीछा कर रही थी तो वे हेडगेवार से मिले थे व हेडगेवार ने उनके छिपने का इंतजाम भी किया था !! पुस्तक की भूमिका बीजेपी के शीर्ष नेता मोहन भागवत ने लिखी है !!
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लेकिन महात्मा राजगुरु के भाई के पोतो का कहना है कि हमारे दादाजी या पिताजी ने हमें यह कभी नहीं बताया कि महात्मा राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे !! देश के इतिहासकारों के अनुसार भी इस तरह के दूर दूर तक कोई साक्ष्य / दस्तावेज नहीं है जो महात्मा राजगुरु के स्वयंसेवक होने की पुष्टि करें। यहाँ तक कि महात्मा राजगुरु की बायोग्राफी में भी इसका कोई जिक्र नहीं है !! लगता है महात्मा राजगुरु संघ के अंडर कवर स्वयंसेवक थे !!
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न्यूज लिंक - <https://goo.gl/PNfrJ8>;
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बीजेपी के नेता मोहन भागवत का यह दावा तो बिलकुल ही झूठा है कि महात्मा राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे , और जहां तक हेडगेवार से मिलने और हेडगेवार द्वारा महात्मा राजगुरु के छिपने का इंतजाम करने की बात है, तो यदि हम संघ की बात एक मिनिट के लिए मान भी ले कि महात्मा राजगुरु हेडगेवार से मिले थे और संघ महात्मा राजगुरू का समर्थन करता था , तो भी इस बात के कोई मायने नहीं है। इसकी दो मुख्य वजह है --
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१) यदि संघ महात्मा राजगुरु एवं महात्मा भगत सिंह जी का समर्थन करता था तो उन्होंने तब उन्हें "सार्वजनिक" समर्थन क्यों नहीं दिया ? चुपचाप समर्थन करने का क्या मतलब होता है ? यह खुली हुई बात है कि संघ इन क्रांतिकारियों को सार्वजनिक रूप से "भटके हुए नौजवान" कहता था , और खुद हेडगेवार ने अपने संस्मरण में यह बात कई जगह लिखी है कि वे युवाओं को भगत सिंह जी के रास्ते पर न चलने के लिए समझा रहे थे !!!
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जिन्हें इसकी पुष्टि करनी है वे संघ द्वारा प्रकाशित हेडगेवार की ऑटो बायोग्राफी "द एपोक मेकर" पढ़ें। तो संघ ने तब सार्वजनिक रूप से महात्मा भगत सिंह जी , महात्मा राजगुरु एवं महात्मा चंद्रशेखर आजाद का सार्वजनिक समर्थन नहीं किया, और चुपचाप समर्थन करने के कोई मायने नहीं होते। क्योंकि चुपचाप समर्थन सिर्फ तब किया जाता है जब समर्थन देने का नाटक करना होता है।
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दरअसल तब ब्रिटिश सरकार इन क्रांतिकारियों का पीछा कर रही थी और उनके निशाने पर वे सभी लोग थे जो इन क्रांतिकारियों का समर्थन कर रहे थे। संघ ब्रिटिश सरकार से कोई रार मोल नहीं ले सकता था , क्योंकि उन्हें संगठन चलाने के लिए जो पैसा आता था वह देशी राजाओं द्वारा दिया जा रहा था। ये सभी देशी राजा अंग्रेजो के सामने समर्पण कर चुके थे और उनके गुलाम थे। इस तरह ब्रिटिश शासन में सिर्फ वही संगठन पनप सकता था जो ब्रिटिश के एजेंडे पर काम करे। संघ का यह ओफिसियल स्टेंड था कि हमारा उद्देश्य आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेना नहीं है। संघ तब औपनिवेशिक शासन का समर्थन करता था और गोलवलकर ने खुद यह बात कई दफे अपनी पुस्तक "बंच ऑफ़ थोट्स" में कही है।
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२) संघ ने इतने सालो तक इस बात का जिक्र क्यों नहीं किया कि महात्मा राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे और वे भगत सिंह जी आदि क्रांतिकारियों का समर्थन करते थे ? उनके किसी साहित्य में किसी दस्तावेज में इस बात का कहीं पर जिक्र नहीं है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि संघ तब इन क्रांतिकारियों से दूरी बनाकर रखता था। यदि संघ इनका समर्थन करता तो और भी ज्यादा युवा इन क्रांतिकारियों के मार्ग का अनुसरण करते और ब्रिटिश सरकार को समस्या का सामना करना पड़ता। लेकिन संघ एवं ब्रिटिश दोनों ही ऐसा बिलकुल नहीं चाहते थे।
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जहां तक महात्मा राजगुरु के हेडगेवार से मिलने की बात है , इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महात्मा राजगुरु हेडगेवार जी से मिले हो। क्योंकि उस समय विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता एक दुसरे से सहयोग की उम्मीद में एक दुसरे से मिलते रहते थे। हेडगेवार महात्मा सुभाष चन्द्र बोस से मिलने गए थे , एक बार महादुरात्मा गाँधी भी हेडगेवार से मिलने के लिए संघ कार्यालय में आया था।
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तो इस तरह की मुलाकातों का कोई मतलब नहीं। हो सकता है कि महात्मा राजगुरु हेडगेवार जी को यह समझाने के लिए मिले हो कि जो हजारो युवाओं को उन्होंने शाखाओ में व्यायाम करने में उलझाकर रखा हुआ है , उनमे से क्यों न कुछ युवाओ को सांडर्स की तरह ही कुछ अंग्रेजो को ठिकाने लगाने का दायित्व दिया जाये, और बदले में हेडगवार ने महात्मा राजगुरु को यह समझाने की कोशिश की हो कि तुम हिंसा का रास्ता छोड़कर क्यों नहीं शाखा में आकर लकड़ी चलाना सीखते !!
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ऐसा प्रतीत होता है कि संघ की आई टी सेल और संघ के स्वयंसेवक जल्दी ही इस आशय की ख़बरें फैलाने लगेगें कि संघ की शाखाओं में क्रांतिकारियों को बम बनाना सिखाया जाता था , और संसद में फोड़ने के लिए महात्मा भगत सिंह जी को बम बनाकर खुद हेडगेवार जी ने ही दिया था !!
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बहरहाल यह स्थापित तथ्य है कि संघ का आजादी की लड़ाई से कोई लेनदेन नहीं था बल्कि वे आजादी की लड़ाई लड़ने वाले युवाओं को समझा बुझाकर "सही रास्ते पर" लाने का काम कर रहे थे। और अब संघ के नेता अपने इस इतिहास से पीछा छुड़ाने के लिए छटपटा रहे है।
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