> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-05-15

Pawan Jury BhilwaraRj

भारत में लोकतंत्र के नजरिये से चुनाव के नतीजे फरेब है , और इसका "जनता की जीत" , या "लोकतंत्र की जीत" या "जनता हमारे साथ है" जैसी धारणाओं से कोई सरोकार नहीं है।
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मेरे अनुसार भारत में लोकतंत्र नहीं है, बल्कि लोकतंत्र का विकृत रूप है।
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लोकतंत्र से आशय :
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यदि किसी राज्य का राज वर्ग अमुक राज्य में निवास करने वाले नागरिको के बहुमत के निरंतर अधीन हो, और एक क्षण के लिए इस अधीनता का निलंबन न किया जा सके, तो ऐसे तंत्र को लोकतंत्र कहा जा सकता है।

जनता के प्रति शासक वर्ग की "निरंतर अधीनता" सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं -
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१) नागरिको के पास शासक वर्ग को चुनने एवं उन्हें निष्कासित करने की शक्ति हो।

स्पष्टीकरण - यदि नागरिको के पास शासक को चुनने का अधिकार होगा किन्तु उसे निष्कासित करने का अधिकार नहीं होगा तो चुनने के साथ ही नागरिको के बहुमत की सर्वोच्चता का निलम्बन हो जाएगा। अत: नागरिको के पास शासक वर्ग को चुनने के साथ ही यह भी अधिकार होना चाहिए कि वे शासक वर्ग को भ्रष्टाचार में लिप्त पायें तो उन्हें अविलम्ब पद से निष्काषित कर सके।

भारत के नागरिको शासक को चुन तो सकते है किन्तु उन्हें 5 वर्ष से पहले निष्कासित नहीं कर सकते। अत: चुनाव खत्म होने के साथ ही अगले 5 वर्ष के लिए शासक नागरिको की अधीनता से मुक्त हो जाता है। इस तरह भारत में एक दिन का लोकतंत्र है। जैसे ही चुनावी नतीजे आते है वैसे ही नागरिको का बहुमत शासक वर्ग को नियंत्रित करने की क्षमता खो देता है।
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२) नागरिको के पास अपराधियों को दण्डित करने की शक्ति हो।

स्पष्टीकरण - यह आवश्यक है कि दंडाधिकारी नागरिको के बहुमत के नियंत्रण में रहे तथा दंड देने की सर्वोच्च सकती नागरिको में निहित हो। यदि ऐसा नहीं किया गया तो दंडाधिकारी अपराधियों एवं शासक वर्ग के साथ गठजोड़ बनाकर नागरिको का उत्पीडन करेगा। यदि न्याय तंत्र नागरिको के अधीन हुआ अपराध एवं उत्पीडन में कमी आएगी।

भारत में दंड देने की सर्वोच्च शक्ति जजों के पास है , किन्तु नागरिको के पास जजों को नियुक्त करने और उन्हें निष्काषित करने की कोई प्रक्रिया नहीं है। भारत में जजों की नियुक्ति खुद जज ही करते है, एवं एक बार नियुक्त होने के बाद आजीवन अपने पद पर बने रहते है। इस तरह भारत का न्याय पालिका नागरिको के नियन्त्रण से पूरी तरह से बाहर है।
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३) नागरिको के पास अपने देश की सेना एवं पुलिस को काबू करने की शक्ति हो।
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यदि चुनकर आया व्यक्ति शासक बनने के बाद सेना एवं पुलिस की सहायता से लोकतंत्र को निलम्बित कर देता है, तो नागरिको के पास वह वास्तविक शक्ति होनी चाहिए जिससे वे अपने राज्य की सेना एवं पुलिस को काबू कर सके। यह शक्ति सिर्फ हथियार बंद नागरिक समाज से ही आती है। अत: यह आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक हथियारबंद हो। हथियारबंद नागरिक समाज ही "लोकतंत्र की जननी" है। इसके अभाव में धीरे धीरे नागरिको के सभी अधिकारों का निलम्बन हो जाता है।

भारत में 1% नागरिको के पास भी बंदूके नहीं है, जबकि शासक के पास राज्य की सेना एवं पुलिस होती है। अत: भारत के नागरिक शासक के मुकाबले में बेहद कमजोर है। इसके अलावा यदि भारत को युद्ध का सामना करना पड़ता है और भारत की सेना हार जाती है तो नागरिको के पास अपनी एवं अपने देश की रक्षा करने के लिए कोई हथियार नहीं है।
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तो जब किसी देश के नागरिको के पास ये तीनो अधिकार हो तो शासक वर्ग निरंतर प्रजा के अधीन रहता है। जब तक शासक वर्ग प्रजा के अधीन बना रहेगा तब तक यह कहा जाएगा कि अमुक तंत्र पर लोक ( लोक = जनता ) का नियन्त्रण है , अत: यह लोकतंत्र है। किन्तु जैसे ही किसी वजह से इन प्रक्रियाओ का
निलम्बन होता है वैसे ही लोकतंत्र का निलम्बन हो जाता है। भारत में नागरिको के पास सिर्फ 1 दिन के लिए वोट करने का अधिकार आता है, और एक बार वोट करने के बाद अगले 5 वर्ष तक लोकतंत्र का निलम्बन हो जाता है। अत: भारत में लोकतंत्र नहीं है , बल्कि इसका विकृत रूप है।
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भारत में लोकतंत्र की स्थापना के लिए हमने ऐसी प्रक्रियाओ का प्रस्ताव किया है जिससे भारत के नागरिको को उपरोक्त तीनो अधिकारी मिल जायेंगे। हमारा प्रस्ताव है कि :

१) भारत के नागरिको के पास अपने जन प्रतिनिधियों एवं अधिकारियो को निष्कासित करने का अधिकार अर्थात राईट टू रिकॉल होना चाहिए।
२) भारत के नागरिको के पास दंड देने की शक्ति होनी चाहिए। ज्यूरी सिस्टम लाकर ऐसी व्यवस्था कायम की जा सकती है।
३) प्रत्येक नागरिक के लिए बन्दुक रखना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

इनके प्रस्तावित कानून ड्राफ्ट्स देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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"राजा को प्रजा अधीन होना चाहिए , वर्ना वह प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा" - महर्षि दयानंद सरस्वती , सत्यार्थ प्रकाश 1870
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भारत में चुनाव प्रणाली को इस तरह रचा गया है कि, जीतने का अवसर पार्टी उम्मीदवार के पास ही होता है। राजनैतिक पार्टियों के पास पूरे देश में / राज्य में / संसदीय क्षेत्र में / विधानसभा क्षेत्र में / बूथ स्तर तक फैला हुआ विशाल नेटवर्क होता है। जबकि निर्दलीय उम्मीदवार के पास ऐसा कोई नेटवर्क नहीं होता। चुनावों की अधिसूचना महीने भर पहले जारी की जाती है, और उम्मीदवार के पास चुनाव प्रचार के लिए 2 हफ्ते का समय होता है। अपने संसाधनों एवं मीडिया को भुगतान करने की अपनी क्षमता के कारण सिर्फ बड़ी एवं स्थापित पार्टियाँ ही मतदाता तक पहुंच पाती है। इसके पीएम का सीधा चुनाव न होने के कारण पीएम / सीएम वही बनता है जिसकी पार्टी के पास सांसदों / विधायको का बहुमत होता है। तो मतदाता के पास सिर्फ राजनैतिक पार्टी के उम्मीदवार ही विकल्प के रूप में रहते है। इस तरह कुछ 2-3 बड़ी पार्टियाँ अपना उम्मीदवार मैदान में उतार देती है और जनता को इन 2-3 लोगो में से सबसे कम बदतर व्यक्ति को चुनना होता है।
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दुसरे शब्दों में जनता के पास चुनने के लिए 2-3 विकल्प ही होते है। अब यदि इन 3 उम्मीदवारों में से एक डकैत है , दूसरा लुटेरा है एवं तीसरा चोर है , तो आप किसे चुनेंगे ? अब यदि आप चोर को चुनते है तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आप चोर को चुनना चाहते थे। बल्कि इसका आशय यह है कि आपके सामने तीन बदतर विकल्प मौजूद थे, जिसमे से आपने सबसे कम बदतर व्यक्ति को चुना। इस तरह यह बाध्यकारी समर्थन है। इसे लोकतंत्र की जीत, जनता की पसंद , जतना का मत , जनता का आदेश जैसी गलत धारणाओं से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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