Pawan Jury BhilwaraRj
पद्मावत फिल्म को लेकर विरोध हिंसक हो चुका है और कई शहर इसकी चपेट में है। ज्यूरी सिस्टम एक मात्र समाधान है, जो इस तरह की परिस्थिति से निपट सकता है।
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हमारा प्रस्ताव है कि, यह फिल्म 500 नागरिको की ज्यूरी के हवाले की जानी चाहिए। ज्यूरी सदस्य फिल्म देखकर तय करें कि इस फिल्म को बेन किया जाना चाहिए या नहीं। यदि ज्यूरी सदस्य फिल्म को आपत्तिजनक पाते है तो बेन करने के साथ ही निर्माता, निर्देशक एवं अभिनेताओं को जेल भी भेज सकते है।
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जज सिस्टम इस मामले में इसीलिए काम नहीं करेगा क्योंकि हमारे जज पूरी तरह से भ्रष्ट है। यदि निर्माता उन्हें पैसे पहुंचा देता है तो वे फिल्म को हरी झंडी दे देते है। नागरिको के पास इन भ्र्ष्ट जजों को नौकरी से निकालने का कोई अधिकार नहीं है। अलबत्ता वे चाहे तो सड़क पर आकर तोड़ फोड़ मचा सकते है। किन्तु इससे सुरक्षा घेरो में बैठे भ्रष्ट जजों के स्वास्थ्य पर कोई फर्क नहीं आता। यदि "राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट जज" का क़ानून होता तो नागरिक सुप्रीम कोर्ट के भ्र्ष्ट जज को नौकरी से निकाल सकते थे।
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मोदी साहेब भी उतने ही भ्र्ष्ट है जितना कि हुआ जा सकता है। केजरीवाल की तरह ही मोदी साहेब भी घूस में नकदी नहीं लेते। वे घूसदाता को यह भुगतान सीधे मीडिया कर्मियों को करने को कहते है। मीडिया इसके बदले मोदी साहेब को सकारात्मक कवरेज दे देता है। उन्होंने गुजरात चुनाव के मद्देनजर फिल्म को होल्ड करने को कहा और चुनाव ख़त्म होते है सेंसर बोर्ड चेयरमेन को फिल्म रिलीज करने के आदेश दे दिए। यदि राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून होता तो मोदी साहेब यह फिल्म नागरिको की ज्यूरी के हवाले कर देते थे। लेकिन ज्यूरी सिस्टम आने से पीएम के हाथ से घूस खाने का अवसर निकल जाता है।
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व्यवस्था में दोष सिर्फ इसीलिए बनाकर रखे जाते है ताकि घूस खाने के अवसर बने रहे। तो यदि आप समझते है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को व्यवस्था सुधारने में रुचि है तो आप भुलावे में है। अगर व्यवस्था में से दोष निकल गए तो शासको के हाथ से पैसा कमाने और मनमानी करने का अवसर हाथ से निकल जाएगा। यही वजह है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल समेत संघ-कांग्रेस-आपा के सभी नेता हमेशा से राईट टू रिकॉल एवं ज्यूरी सिस्टम के विरोधी रहे है और आज भी इसका पूरी शक्ति लगाकर विरोध कर रहे है।
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पद्मावती ; फिल्म का प्रचार करने के नाम पर चलाये जा रहे फर्जी समाधान Vs वास्तविक समाधान
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