Pawan Jury BhilwaraRj
पतंजलि के मामले में एफडीआई संभवत भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाएगा।
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१) मान लीजिये एक विदेशी कम्पनी को इस शर्त पर आमंत्रित किया जाता है कि -- वे भारत में अपने उत्पाद बेचेंगे और जो रुपया वे भारत में कमाएंगे उसके बदले में रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया उन्हें डॉलर में भुगतान करेगा। इस स्थिति में भारत पर विदेशी मुद्रा का भार बढेगा और हमें घाटा होगा।
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२) लेकिन मान लीजिये कोई विदेशी कम्पनी किसी भारतीय कम्पनी में इस शर्त पर निवेश करती है कि -- यह साझा उद्यम भारत में किसी उत्पाद की बिक्री नहीं करेगा, लेकिन भारत में इस साझा उद्यम द्वारा निर्मित उत्पादों का विक्रय भारत से बाहर किन्ही अन्य अमेरिकी-यूरोपीय देशो में करेगा। इस बिक्री से होने वाले लाभ को साझेदारो द्वारा आपस में बाँट लिया जाएगा। तो इस तरह का अनुबंध भारत पर किसी प्रकार की विदेशी मुद्रा के भुगतान का भार नहीं रखता।
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जहां तक मुझे जानकारी है , यदि पतंजली विदेशी कम्पनी से अनुबंध करती है तो वह बिंदु (२) में वर्णित परिस्थिती को प्राथमिकता देगी। तब पतंजली द्वारा विदेशी कम्पनी के साथ की गयी ऐसी साझेदारी भारत को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती।
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लेकिन, यदि पतंजलि बिंदु (१) के तहत अनुबंध करती है तो यह भारत पर विदेशी मुद्रा का भार बढ़ाएगा। किन्तु मुझे नहीं लगता कि पतंजली को बिंदु (१) में वर्णित परिस्थिति के तहत समझौता करने की जरूरत है। पतंजली को भारत में स्थानीय स्तर पर बिक्री बढाने के लिए पूँजी की आवश्यकता नहीं है। उन्हें विदेशी पूँजी की जरूरत सिर्फ भारत से बाहर कारोबार फैलाने के लिए है।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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