Pawan Jury BhilwaraRj
पाओलो कोहेल्हो की पुस्तक "अल्केमिस्ट" में एक नामचीन एवं सफल पात्र कहता है -- "मैं अपना दिमाग भिड़ाकर जटिल चीजो को तो समझ लेता हूँ, किन्तु सरल चीजो को समझने में धोखा खा जाता हूँ। जबकि कई लोग सरल चीजो को समझ लेते है , जो कि वाकई काम की होती है।"
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कभी कभी राईट टू रिकॉल कानूनों की शक्ति कोई कार्यकर्ता इसीलिए भी नहीं समझ पाता क्योंकि वह इसे जटिल तरीके से समझने की कोशिश कर रहा होता है। उन्हें लगता है कि इतने बड़े देश की इतनी पेचीदा व्यवस्था को सुधारने के लिए काफी दिमागी मशक्कत करके एक वृहद व्यवस्था को ईजाद करना पड़ेगा, और इसके लिए कोई विशेषग्य चाहिए। सिर्फ 2 पेज का कानून कैसे देश में इतना बड़ा परिवर्तन ला सकता है कि सरकारी विभागों / नेताओं का भ्रष्टाचार एवं अकार्यकुशलता रातों रात हवा हो जाए !!
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असल में राईट टू रिकॉल की अवधारणा बेहद सरल है। यह इतनी सीधी है कि जटिलता ढूँढने का अभ्यस्त व्यक्ति इसमें जटिलता ढूँढने लगता है। और जब उसे इसमें जटिलता नहीं मिलती तो वह यह मान लेता है कि यह उससे भी ज्यादा जटिल है जितना मैंने अनुमान किया था !! सुलझी हुयी गुत्थी को सुलझाने का खब्त तो सिर्फ कवि और दार्शनिक ही पाल सकते है। साधारण व्यक्ति तो उलझी हुयी बात को सुलझा सकता है सुलझी हुयी को नहीं।
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यह गड़बड़ तब शुरू होती है जब कोई व्यक्ति राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया का ड्राफ्ट पढ़े बिना ही इसे समझने की कोशिश करता है !!
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समाधान - प्रक्रिया विहीन राईट टू रिकॉल को समझा नहीं जा सकता। इसका ड्राफ्ट पढना इसे समझने का सबसे आसान तरीका है। अत: इसे समझने के लिए इसका प्रस्तावित ड्राफ्ट पढ़े।
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