Pawan Jury BhilwaraRj
ज्यादातर संभावनाएं है कि लोकसभा चुनाव 2018 में संपन्न हो जाए। प्रस्तावित "एक देश एक चुनाव" नीति के तहत देश की सभी विधानसभाओ के चुनाव भी आम चुनावों के साथ करवाए जा सकते है। संसदीय सीमिति इसे 2 साल पहले ही पास कर चुकी है और ज्यादातर दल इस प्रस्ताव से सहमत है। समय का फैसला मोदी साहेब ने करना है। यदि उन्हें अनुकूल हुआ तो वे 2019 की जगह इसके लिए 2018 भी चुन सकते है।
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नयी व्यवस्था के तहत निम्न फार्मूले सुझाए जा रहे है :
अगर किसी राज्य या केंद्र में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिले तो प्रस्ताव किया जा रहा है कि :
1. सभी दल मिलकर मिलीजुली सरकार बनाए ।
2. सभी दल मिलकर अनिवार्य तौर पर सर्वदलीय सरकार बनाएं
3. या अगले चुनाव तक राष्ट्रपति शासन लगा रहे।
4. बीच में विधानसभा भंग होने पर भी सरकार चलाने की यही व्यवस्था लागू हो।
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सरकार बनाने की कानूनी 'मजबूरी' के चलते कोंग्रेस बीजेपी सपा बसपा लेफ्ट आदि सभी दल मिलकर सरकार बना सकेंगे । जिसके पास जितने विधायक सांसद होंगे उन्हें उस प्रकार से सत्ता में भागीदारी दे दी जायेगी । जवाबदेही में गिरावट आएगी, एजेंडे खुले तौर पर गड्ड मड्ड हो जायेंगे, एक नयी प्रकार की जमात का जन्म होगा जो 5 वर्ष में एक बार जनता को शक्ल दिखाएँगे, और बाकी सब चीजे संसद में आपस में बैठ कर तय कर लेंगे । यह क़ानून नागरिको की भागीदारी चुनावी प्रक्रिया में और भी कम कर देगा।
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एक पहलू यह है कि इस नीति के आने से चुनावी खर्चे की बचत होगी और चुनाव आयोग के कार्य का वजन कम होगा। किन्तु राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं के अभाव में कुल मिलाकर इस व्यवस्था में नेताओ की जवाबदेही और भी घटेगी।
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