> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2017-09-12

Pawan Jury BhilwaraRj

नरेंद्र Vs नरेंद्र
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महात्मा मंगल पांडे ने 1857 में क्रान्ति का सूत्रपात किया था। वजह ? पाण्डे जी गाय की चर्बी वाले कारतूस दाँत से काटने को राजी नहीं थे। उनका कहना था कि -- मैं हिन्दू हूँ, और हिन्दू संस्कृति में गौ मांस भक्षण निषिद्ध है।
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मुग़ल कालीन भारत में गौ कशी निषिद्ध थी। यहाँ तक कि अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर ने गौ हत्यारे को तोप से उड़ा देने का क़ानून बनाया हुआ था। क्रांति के बाद जफर को बर्मा रवाना कर दिया गया। 1860 से अंग्रेजो ने भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देना शुरू किया। लेकिन अंग्रेज यह कतई नहीं चाहते थे कि आगे भी हिन्दू धार्मिक संस्कृति के आधार पर गौ हत्या का विरोध करें।
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इसी समय इत्तिफाक से भारत में एक संत का अवतरण हुआ। इन्होने 1885 में भारत के हिन्दुओ को यह बात "बतानी शुरू की" कि गौ मांस का सेवन हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग रहा है। यदि हिन्दूओ को ताकतवर होना है तो उन्हें मांसाहार अवश्य करना चाहिए। वे अन्तराष्ट्रीय संत थे / होना चाहते थे। अत: इस प्रकार की सूचना हिन्दुओ को देने के बाद ये महाशय पश्चिम में निकल गए। और पूरी दुनिया में भी इस आशय का प्रचार किया।
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उन्होंने यह भी बताया कि गीता पढ़ने की जगह यदि हिन्दू फ़ुटबाल खेलेंगे तो उन्हें मुक्ति जल्दी मिलेगी !! ये स्वयं भी माँसाहारी थे और अपने श्रावको को भी मांसाहार करने की सलाह देते थे। बात के साधारण होने के बावजूद इन तथ्यों की टाइमिंग का अपना महत्त्व था। वस्तुत: ब्रिटिश शासन में इन्हे काफी राष्ट्रीय एवं अंतरास्ट्रीय स्तर पर मकबूलियत हासिल हुयी। जाहिर है इन महाशय ने उस समय यह सूचना देकर गौ हत्या के पक्ष में एक वाजिब वजह दे दी थी !!
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सार यह है कि कौन संत है और कौन असंत है, या कौन संत अच्छा है और कौन बुरा है इसकी व्याख्या का अधिकार उनके श्रद्धालुओं पर छोड़ देना चाहिए। सभी संतो की अपनी एक भिन्न शैली होती है। जो उनके नजरिये से सहमत होते है वे उन्हें संत मानते है और जो उनसे सहमत नहीं होते वे उन्हें संत नहीं मानते। इस बात को तय करने का हमारे पास कोई सार्वभौम पैमाना नहीं है कि कौन अलसी संत है और कौन नकली।
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