Pawan Jury BhilwaraRj
सच और सच्चे-अच्छे आदमी के नाम पर सर्कस
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जिस तरह वोटिंग सिस्टम में सही-गलत का कोई महत्त्व नहीं होता बल्कि बहुमत जो कहे वही होता है -चाहे सही हो या ग़लत, ठीक उसी तरह सच और सच्चे आदमी का भी कोई महत्त्व नहीं होता, बल्कि उन क़ानूनों का महत्त्व होता है, जो किसी सच्चे-अच्छे/झूठे व्यक्ति ने प्रस्तावित किए है।
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क्योंकि समाज-देश या आपकी जिंदगी में बदलाव क़ानूनों से ही आएगा। सच या झूठ की जुगाली से नहीं।
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उदाहरण के लिए, GST सच-झूठ का लेखा जोखा नहीं है। यह एक क़ानून है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि GST छापने वाला सच्चा आदमी है या झूठा आदमी।
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कार्यकर्ताओं को इस चक्कर में नहीं आना चाहिए कि अमुक कोई नेता, समाज सुधारक, गुरु-गुरायत, यू ट्यूबर आदि सच बोल रहा है या झूठ, या वह अच्छा आदमी है या बुरा। कार्यकर्ताओं को सिर्फ़ यह देखना चाहिए कि वह जिस समस्या को उधेड़ने के लिए सच बोल रहा है, उस समस्या को समाप्त करने के लिए उसने क़ानून कौनसा रखा है।
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वरना आप सच्चे-अच्छे आदमियों से सच सुन सुनकर धोखे खाते रहेंगे। क्योंकि धोखा देने के लिए सच्चा आदमी होना पहली शर्त है। झूठे आदमी लोगो को धोखे नहीं दे पाते।
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तो आइंदा जब भी आपका पाला राजनैतिक-सामाजिक विषयों पर बोलने वाले किसी सच्चे आदमी से पड़े तो आपके मन में इस संदेह के बादल तुरंत घुमड़ने चाहिए कि- अमुक सच्चा-अच्छा आदमी सच बोलने के एवज में आपको कौनसा धोखा देने की कोशिश कर रहा है।
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और वैसे भी राजनीति में सच नाम की वस्तु तो होती भी नहीं है। इसके लिए तथ्य शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जो लोग अपने वाक्य को देववाणी तुल्य दर्शाना चाहते है, वे ही तथ्यों को सच कहने की धांधली करते है। और “सत्य” शब्द एक बिल्कुल ही अलग चीज है। इतना कि इस पर कुछ भी लिखना समय व्यर्थ करना है।
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