Pawan Jury BhilwaraRj
यदि भारत के नागरिको के बहुमत को वोट चोरी में Evm के काले कांच की भूमिका के बारे में मालूम हो जाता है तो सांसदों के पास सिर्फ 2 विकल्प बचेंगे --
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(1) Evm को समाप्त करने के लिए क़ानून पास करें या
(2) बांग्लादेश जैसे हालात का सामना करें !!
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निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव किसी भी देश का अंतिम सेफ्टी वॉल्व है। देश के हालात कितने भी खराब क्यों न हो जाए, नागरिको का बहुमत जब तक यह विश्वास करता है कि चुनाव निष्पक्ष रूप से सम्पन्न हो रहे है, तब तक लोगो का असंतोष धरनो, प्रदर्शनों के रूप में निकलता रहता है, किन्तु सरकार को किसी निर्णायक विद्रोह का सामना तब भी नहीं करना पड़ता।
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किन्तु नागरिको का भरोसा यदि मतदान प्रक्रिया से उठ जाए तो बवाल का संकट आसन्न हो जाता है। मतदान प्रक्रिया धांधली का शुबहा अवाम को बल प्रयोग की नैतिक प्रेरणा दे देता है।
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जनवरी 2024 में बांग्लादेश में सिर्फ 40% लोगो ने वोट किया था !! वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी ने चुनावों में हिस्सा ही नहीं लिया। यह बात बांग्लादेश की अवाम की कॉमन नॉलेज में थी कि शेख हसीना ने चुनावों में धांधली करके सदारत हासिल की है (300 में से 210 सीट)।
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शेख हसीना के खिलाफ बेरोजगार छात्रो द्वारा चलाई जा रही तहरीक के पक्ष में जन समर्थन बढ़ता गया, और जब आंदोलन को दबाने के लिए शेख हसीना ने फ़ौज से मुताबिला किया तो जनरल वकार उज जमान ने गोली चलाने से इनकार कर दिया। और एक बार यदि फ़ौज प्रधानमंत्री के आदेश मानने से इनकार कर दे तो मुल्क छोड़कर जाने के सिवाय नेता के पास कोई रास्ता नहीं रहता।
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यद्यपि चीन भी शेख हसीना से नाराज था, और उन्हें निष्कासित करना चाहता था। शेख हसीना के रिश्ते चीन से इस हद तक ख़राब हो चुके थे, कि पिछले महीने शेख हसीना को चीन के दौरे से बीच में ही लौट आना पड़ा था। इस बात की पूरी सम्भावना है कि चीन ने जनरल को हाथ खींच लेने के लिए कहा हो।
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अब इससे बांग्लादेश में किस तरह का बदलाव आएगा ?
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इससे बदलाव कुछ भी नहीं होगा। बस इतनी सा है कि, जिस नेत्री को अवाम वोट करके निकालना चाहती थी, उसे निकालने के लिए उन्हें फौजदारी तरीके का इस्तेमाल करना पड़ा। यह किसी दोषपूर्ण मीनार को गिराने की कार्यवाही करने की तरह है। किन्तु मीनार को गिराना एक अलग बात है, और गिराकर उसकी जगह एक नयी दोष रहित मीनार खड़ी करना बिलकुल अलग बात है।
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कोरोना काल (सही शब्दों में जबरिया लॉकडाउन एवं जबरिया वैक्सीनेशन काल, जिसका कोरोना से कोई लेना देना नहीं था) के बाद से बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। और इसके अलावा भी उनके अपने कई मसाइल है। किन्तु निजाम सुधारने के लिए आईन सुधारने होते है। विद्रोहियों के पास सुधार लाने के लिए आवश्यक कानूनों का कोई समुच्चय नहीं है।
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बेंडी पिस्तौल नुमा ऐसे विद्रोह कई मुल्को में होते आए है, जिसके नतीजे में पब्लिक को संतोष हो जाता है कि, हमने शासक को गिरा दिया, और फिर वैसा ही दूसरा शासक आकर वैसा ही शासन फिर से नाफ़िज कर देता है।
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बहरहाल, बांग्लादेश का आगे क्या बनेगा, वो उनका मामला है, हमें उससे ज्यादा ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हमें भारत के बारे में देखना है।
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भारत के नागरिको को लगता है कि चुनावो में धांधली नहीं हो रही है, क्योंकि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि Evm का काला कांच किस तरह वोटो में हेराफेरी करता है।
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यदि भारत के नागरिको के बहुमत को जानकारी हो जाए कि, काला कांच उनके वोट चुरा रहा है तो सांसदों को Evm हटाकर बेलेट पेपर लाने का कानून पास करना पड़ेगा। क्योंकि तब यदि वे ऐसा नहीं करते है, तो उन्हें उसी तरह के विद्रोह का सामना करना पड़ सकता है, जैसा बांग्लादेश में शेख हसीना ने किया है।
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क्या काले कांच की जानकारी इतनी महत्त्वपूर्ण है ?
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हाँ। क्योंकि, जनवरी से अप्रेल तक उत्तर भारत के सिर्फ 2 करोड़ लोगो द्वारा इंटरनेट पर काले कांच का डेमो देख लेने की वजह से पेड मीडिया के प्रायोजको को Evm बचाने के लिए बीजेपी की सीटो में 100 से 125 सीटों की कटौती करनी पड़ी थी।
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वे जान चुके थे, कि यदि बीजेपी को 300 से अधिक सीट दी गयी तो Evm हटवाने के लिए लोग बड़े पैमाने पर सड़को पर आ सकते है। और यदि Evm उनके हाथ से निकल गयी तो सभी पार्टियों के शीश नेताओं की चोटियाँ उनके हाथ से निकल जायेगी।
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यदि आप Evm के काले कांच का विरोध करते है और Evm के काले कांच को पारदर्शी बनाना चाहते है तो निम्न कदम उठाए :
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(1) प्रधानमंत्री एवं चुनाव आयोग को एक खुला निर्देश पत्र भेजें कि -- Evm के काले अंधे कांच को बदल कर इसे पारदर्शी किया जाए।
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(2) आगामी विधानसभा चुनावों (हरियाणा, झारखण्ड, दिल्ली, महाराष्ट्र) में Evm के काले कांच को पारदर्शी बनाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ें।
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#EvmBlackGlass
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