Pawan Jury BhilwaraRj
कोंग्रेस, सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी आदि को Evm की वजह से नुकसान होने के बावजूद इन पार्टियों के शीर्ष नेता जैसे राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, मायावती और अरविन्द केजरीवाल आदि Evm के काले कांच का समर्थन क्यों करते है ?
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दरअसल, ये पार्टियाँ इन शीर्ष नेताओ की तभी तक है जब तक इन पार्टियों का नियंत्रण इन नेताओ के हाथ में है। इन पार्टियों में मझौले स्तर के ऐसे कई नेता है, जो इन्हें शीर्ष पद से अपदस्थ करके शीर्ष पद पर कब्ज़ा कर सकते है।
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अपनी पार्टी में अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए यह जरुरी है कि चुनौती देने वाले या दे सकने वाले नेताओं एवं उनके समर्थक नेताओं को दबा कर रखा जा सके। और इन्हें दबाकर रखने के लिए इन्हें Evm की जरूरत है।
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पेड मीडिया के प्रायोजक Evm का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करते है कि, मुख्यधारा की पार्टियों के शीर्ष नेताओं को अपनी ही पार्टी के लोकप्रिय एवं जनाधार वाले नेताओं द्वारा चुनौती का सामना न करना पड़े, और इसके एवज में इन पार्टियों के शीर्ष नेता पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के समर्थन में काम करते है।
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वे जानते है, कि यदि वे पेड मीडिया के हितो को चोट पहुँचाने वाले मुद्दों पर काम करेंगे तो पेड मीडिया के प्रायोजक Evm की सहायता से उनकी ही पार्टी के किसी और नेता को उभार कर उन्हें उनकी ही पार्टी से अपदस्थ कर देंगे।
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शीर्ष स्तर के नेताओं को चुनौती देने की कूवत रखने वाले मझौले स्तर के नेता भी जब यह देखते है कि, शीर्ष नेता के खिलाफ जाने वाले नेताओ को Evm का इस्तेमाल करके निपटाया जा रहा है / जा सकता है, तो वे अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए शीर्ष नेता के प्रति वफ़ादारी प्रदर्शित करना शुरू कर देते है, और शीर्ष नेता को चुनौती नहीं देते।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये कि, कोंग्रेस में अशोक गहलोत / सचिन पायलट ऐसे नेता है जो राहुल गाँधी को चुनौती देना चाहते है, या मान लीजिये कि राहुल गांधी समझते है कि अशोक गहलोत / सचिन पायलट उन्हें चुनौती दे सकते है।
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इस स्थिति में राहुल गांधी पेड मीडिया के प्रायोजको से इन्हें निपटाने को कहेंगे। तब अशोक गहलोत / सचिन पायलट का समर्थन करने वाले विधायक प्रत्याशियों को Evm का इस्तेमाल करके हरा दिया जाएगा, और अशोक गहलोत / सचिन पायलट राहुल गांधी को चुनौती देने की क्षमता खो देंगे।
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तो Evm सबसे मुख्य वजह है कि मुख्य धारा की सभी पार्टियों की शीर्ष पदों पर एक से एक कचरा नेता वर्षो से बैठे हुए है, और उन्हें अपनी पार्टी में काबिल नेताओं से कभी किसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ता।
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Evm आने से पहले ऐसा नहीं था। तब शीर्ष पद पर बैठे नेता को अपनी ही पार्टी के नेताओं से निरंतर चुनौती मिलती रहती थी, और कमजोर प्रदर्शन करने पर यह चुनौती द्विगुणित हो जाती थी। इंदिरा गाँधी जी को अपनी ही पार्टी में मोरार देसाई , के. कामराज आदि नेताओं से निरंतर चुनौती का सामना करना पड़ा और उन्हें 2 बार अपनी ही पार्टी से निकाला गया। इंदिरा जी को नयी पार्टी बनानी पड़ी और वे सिर्फ चुनाव जीत कर ही फिर से पार्टी पर कब्ज़ा कर पायी।
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410 सीट जीतने वाले राजीव गाँधी को भी वीपी सिंह के नेतृत्व में चुनौती का सामना करना पड़ा। सोनिया गाँधी को भी शरद पवार, नारयण दत्त तिवारी, पूर्णो संगमा आदि की चुनौती का सामना करना पड़ा था।
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और ऐसा सिर्फ कोंग्रेस में ही नहीं है, बल्कि पार्टी के शीर्ष पद को कब्जाने की आंतरिक राजनीति हर समय सभी पार्टियों में कमोबेश मौजूद रही है। किन्तु Evm आने के बाद स्थिति बदल गयी, और शीर्ष पद पर बैठे नेताओ ने पार्टी में अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने और चुनौती देने वालो को निपटाने के लिए Evm का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
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यदि Evm के अंधे काले कांच को पारदर्शी सफ़ेद कांच से बदल दिया जाता है तो कुछ ही समय में लगभग सभी पार्टियों के शीर्ष स्थानों पर काबिज नेता उनकी ही पार्टियों के जनाधार वाले ज्यादा काबिल नेताओं द्वारा बदल दिए जायेंगे। और इसीलिए भारत की सभी मुख्य पार्टियों के शीर्ष नेता Evm के काले कांच का समर्थन कर रहे है !!
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यदि आप Evm के काले कांच का विरोध करते है और Evm के काले कांच को पारदर्शी बनाना चाहते है तो निम्न कदम उठाए :
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(1) प्रधानमंत्री एवं चुनाव आयोग को एक खुला निर्देश पत्र भेजें कि -- Evm के काले अंधे कांच को बदल कर इसे पारदर्शी किया जाए।
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(2) आगामी विधानसभा चुनावों (हरियाणा, झारखण्ड, दिल्ली, महाराष्ट्र) में Evm के काले कांच को पारदर्शी बनाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ें।
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#EvmBlackGlass
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