> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2023-10-10

Pawan Jury BhilwaraRj

1919 में भारत में पहली बार चुनाव हुए और 1923 में प्रकाशित अपने उपन्यास में प्रेमचंद ने वोट वापसी क़ानून की आवश्यकता का जिक्र किया !! और वक्तव्य को पढने से लगता है, कथन वोट वापसी क़ानून के विरोधियों द्वारा दिए जा रहे तर्क पर प्रतिक्रिया है।
.
"दूसरे दिन प्रात: काल 9 बजे ज्ञानशंकर ने पैर गाड़ी संभाली एवं घर से निकले। वर्षा का आगमन हो चुका था, और घटा उमड़ी हुई थी। मानो समुद्र आकाश पर चढ़ गया हो। सड़को पर इतना कीचड़ था कि पैर गाड़ी मुश्किल से निकल सकी, छीटों से कपड़े ख़राब हो गए।
.
उन्हें म्युनिसिपैलिटी के सदस्यों पर क्रोध आ रहा था कि यह सब के सब स्वार्थी, खुशामदी और उच्चके हैं। चुनाव के समय भिखारियों की तरह द्वार-द्वार घूमते फिरते हैं, लेकिन मेम्बर होते ही राजा बन बैठते हैं । उस कठिन तपस्या का फल यह निर्वाण पद प्राप्त हो जाता है।
.
यह बड़ी भूल है कि मेम्बरों को एक निर्दिष्ट काल के लिए रखा जाता है। वोटरों को अधिकार होना चाहिए कि जब किसी सदस्य को जी चुराते देखें तो उसे पदच्युत कर दें। यह मिथ्या है कि उस दशा में कोई कर्तव्यपरायण मनुष्य मेम्बरी के लिए खड़ा न होगा। जिन्हें राष्ट्रीय उन्नति की धुन है, वह प्रत्येक अवस्था में जाति-सेवा के लिए तैयार रहेंगे।
.
मेरे विचार से जो लोग सच्चे अनुराग से काम करना चाहते हैं वह इस बंधन से और भी खुश होगे। इससे उन्हें अपनी अकर्मण्यता से बचने का एक साधन मिल जाएगा और यदि हमें जाति -सेवा का अनुराग नहीं तो म्युनिसिपल हॉल में बैठने की तृष्णा क्यों हो ? क्या इससे इज्जत होती है ? सिपाही बनकर कोई लड़ने से जी चुराए, यह उसकी कीर्ति नहीं, अपमान है।"
.
------------
.
भारत में चुनाव शुरू होने के साथ ही वोट वापसी कानूनों की मांग उठना शुरू हो चुकी थी। किन्तु पेड मीडिया एवं ब्रांडेड नेताओं (मोहन दास, जवाहर लाल, केशव बलिराम, गफ्फार खान आदि) की सहायता से गोरो ने इसे हाशिये पर धकेलने में सफल रहे।
.
#VoteVapsiPassbook