Pawan Jury BhilwaraRj
1947 में जब गोरे भारत से गये तो यह तय नही हुआ था कि देश को चलाने वाला जो आदमी होगा उसका फ़ैसला करने में भारत के नागरिकों की कोई भूमिका होगी या नहीं।
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उस समय जवाहर लाल गोरो के ख़ास और वफ़ादार थे। अत: वायसराय उन्हें पीएम बना गए और बोल गये थे कि — आगे का देख लेना अपने हिसाब से।
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तो 15 अगस्त के दिन कांग्रेस के शीर्ष नेताओ को सत्ता मिली थी, भारत के नागरिकों को नहीं। भारत के नागरिकों का इससे कोई लेना देना नहीं था।
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1950 में जो कविता लिखी गई थी, उसमें वयस्क मताधिकार का ज़िक्र था। लेकिन उस कविता में और भी बहुत सारा दर्शन लिखा हुआ है, जिससे कुछ होता जाता नहीं।
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भारतीयो का भारत से लेना देना 17 July 1951 को शुरू हुआ था, जब भारतीयो को क़ानून बनाने वाले लोगों को वोट द्वारा चुनने की प्रक्रिया यानी वोटिंग राइट्स मिले थे। (जन प्रतिनिधित्व क़ानून)
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और अहिंसामूर्ति महात्मा चंद्रशेखर आज़ाद ने 1925 में ही यह बात अपने पेम्पलेट में लिखकर बाँटना शुरू कर दी थी कि — यदि वोट वापसी क़ानून लागू नहीं किए गए तो लोकतंत्र एक मज़ाक़ बन कर रह जाएगा !!!
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#VoteVapsiPassbook
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