Pawan Jury BhilwaraRj
स्वतंत्रता आंदोलन की वजह से जो एक मात्र बदलाव आया वह था -- प्रत्येक वयस्क भारतीय को वोट देने का अधिकार होगा और वोट से यह तय होगा कि देश कौन लोग चलाएंगे।
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पूरे देश में चुनाव हुए और भारत के आम नागरिको ने अपनी सरकार चुनी। दिन था - 17 अप्रेल 1952
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मेरे विचार में यह वो दिन है जिसे हर भारतीय को सेलिब्रेट करना चाहिए। इस बात पर भिन्न राय हो सकती है कि इस दिवस को क्या नाम दिया जाना चाहिए। लेकिन इतना तय है पूरे स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम सफलता इसी दिन में निहित है।
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क्योंकि असली स्वतंत्रता आन्दोलन इस बिंदु पर चलाया जा रहा था कि -- भारत के प्रत्येक नागरिक को मताधिकार दिया जाए। (क्रांतिकारियों ने इसमें वोट वापसी की मांग को भी जोड़ दिया था)
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1947 में भारत आजाद हो गया था लेकिन भारतीयों को वोटिंग राइट्स नहीं मिले थे। और जिन्हें सत्ता हस्तांतरित हुई थी वे इस फिराक में थे कि भारत के सभी वयस्कों को मताधिकार नहीं दिए जाने चाहिए। जब भारत में संविधान लागू हुआ तब उसमें यह जोड़ा गया था कि प्रत्येक वयस्क को मत देने का अधिकार होगा। किन्तु इस बारे में क़ानून 1951 में लागू हुआ।
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1952 में पहले आम चुनाव हुए और भारतीयों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके अपने प्रतिनिधि (शासक) चुने।
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1952 से पहले तक भारत का प्रधानमंत्री एवं उसकी केबिनेट को भारतीयों ने नहीं बल्कि गोरो ने चुना था !!
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1949 तक हमारी सेना का जनरल भी गोरा ही था, और अमुक जनरल ने गोवा का विलय करने के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग करने से इंकार कर दिया था !!
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1949 तक भारत का रिजर्व बेंक अधिकृत रूप से ब्रिटिश के अधीन था !!
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1952 तक भारत की पूरी सरकार, सेना आदि गोरो द्वारा नियुक्त थी। आम भारतीय नागरिको का इससे कोई लेना देना नहीं था।
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पहला एवं निर्णायक बदलाव 1952में आया। जब भारत के आम नागरिको ने अपनी सरकार चुनी।
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और वयस्क मताधिकार आने का फायदा यह हुआ कि अब व्यवस्था में वांछित बदलाव हेतु आवश्यक कानूनों लाने की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ताओ को शासन के खिलाफ बन्दुक उठाने की जरूरत नहीं रही है। वे चुनावों में जाकर यह काम कर सकते है।
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मेरा बिदु है कि 1947 को प्राप्त आजादी चाहे धोका है, या धोका नहीं है, यह जो भी है, लेकिन 15 अगस्त के दिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे शासक वर्ग के खिलाफ आम नागरिको की शक्ति में वृद्धि हुयी हो। दरअसल यह दिन भी स्वतंत्रता आदोलन की प्रक्रिया का हिस्सा था, जिससे हम एक कदम और आगे बढे थे। बस याग इतना ही है, इससे ज्यादा नहीं। और यह आन्दोलन 1952 में जाकर सफल हुआ था।