> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2022-03-22

Pawan Jury BhilwaraRj

Amit Kumar Swain:

राइट टू रिकॉल पार्टी के सभी ड्राफ्ट्स में नागरिकों के बहुमत को सिद्ध करने की व्यवस्था की गई है पर बहुमत के अनुसार प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री , जज आदि उसे माने ये बाध्यकारी नही किया गया है ।
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इसके कारण को समझने के लिए हमे सत्ता के स्रोत को समझना होगा । एक समय मे लोग राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे अर्थात राजा जो कहे वो ईश्वर के वाक्य हैं और समाज के बने रहने के लिए इस ईश्वरीय आदेश का पालन ज़रूरी है , जबतक ये मान्यता लोगों में बनी रही राजाओं का शासन चलता रहा । उस व्यवस्था में राजा ही सत्ता का स्रोत था ।
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पर अभी वैसा नही हैं प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री आदि सिर्फ सामयिक रूप से पद भार लेते हैं क्यों कि उन्हें जनता ने उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ये काम दिया है वो भी सामयिक । आजका पूरा सरकारी तंत्र एक व्यवस्था से उत्पन्न होती है जिसका आधार लोगों द्वारा दिए गए वोट हैं । आज सत्ता का स्रोत है नागरिकों का बहुमत ।
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सारे कानून और सरकारी अधिकारियों द्वारा लिए गए सारे सारे कदम सिर्फ इसलिये सर्वमान्य हैं क्यों की प्रचलित व्यवस्था ये धारणा को स्थापित करती है कि ये सब मे बहुमत का समर्थन है। या फिर इन मामलों में बहुमत कुछ और चाहता है ये सिद्ध करने के लिए कोई और तात्कालिक विकल्प उपलब्ध नही जिसलिये मौजूदा अधिकारी जो कर रहे हैं वही सर्व मान्य हैं ।
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तो अगर ऐसी स्थिति में अगर एक प्रक्रिया बनाई जाती है जिसमे किसी मामले में बहुमत को सिद्ध किया जाता है तो प्रक्रिया अनुसार उसे मानना अधिकारी के लिए बाध्यकारी किया जाता है या नही उसकी कोई अहमियत नही ।
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ये पढ़ने के बाद भी हो सकता है कि ये बिंदु समझ मे ना आये । तो आपको एक प्रश्न का उत्तर खोजना चाहिए ।
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भारत के प्रधानमंत्री कभी भी इमरजेंसी लागू करके पूरी विपक्ष को अरेस्ट करा सकते है और चुनावों को अनिश्चित काल के लिए निरस्त कर सकते है और हर विरोध को दबाने के लिए सेना का उपयोग कर सकते है , और ये सब वे लिखित कानूनों के अनुसार ही कर सकते हैं , सेनानायक कानूनी रूप से उनका आदेश मानने के लिए बाध्य होंगे । तो इसके बावजूद कितने प्रधानमंत्रियों ने ये जुर्रत की , क्यों नही की ?
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अगर आप मानते हैं कि कोई ऐसा प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री , जज या अधिकारी ऐसा होगा जो स्थापित बहुमत के बिरुद्ध जाने की जुर्रत कर सकता है , तो उसको आप कानून में कुछ भी लिख कर रोक नही सकते ।ईसलिये बाध्यकारी लिखा हो या नही लिखा हो उसका कोई मतलब ही नही ।
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अभी कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि बातको इतना घुमाने की क्या जरूरत बाध्यकारी लिख देने में क्या समस्या है ?
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समस्या सिर्फ इतनी है कि अगर ड्राफ़्ट में इसे बाध्यकारी लिख दी जाए तो हमे कुछ लंबे कानूनी तर्कों का सामना करना पड़ सकता है जिसे में लाभ नही देखता ।और बाध्यकारी नही लिखने से व्यवहारिक रूप से कोई नुकसान नही है ।