Pawan Jury BhilwaraRj
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों द्वारा तय किया गया नियम की मरीजों को जबरदस्ती दवा दी जाये, और लॉकडाउन जैसे मुद्दों को छिपाने के लिए रामदेवजी एलोपैथी बनाम आयुर्वेद जैसे फर्जी मुद्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं !!
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एक मरीज को यह चुनने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए कि उसे क्या उपचार चाहिए। यह विकल्प पिछले साल मार्च-2020 में पीएम/सीएम द्वारा समाप्त किया गया था, न कि एलोपैथी डॉक्टरों द्वारा। यह पीएम/सीएम थे जिन्होंने फैसला किया कि तथाकथित आरटी-पीसीआर को महत्वपूर्ण बेंचमार्क के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और यह पीएम/सीएम थे जिन्होंने फैसला किया कि मरीजों को उनकी इच्छा के खिलाफ दवा दी जानी चाहिए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए। और यह पीएम/सीएम थे जिन्होंने फैसला किया था कि "कोरोना रोगी" तथाकथित कोविड अस्पतालों को आरटीआर पीसीआर परीक्षण नकारात्मक आने के बिना नहीं छोड़ सकते हैं।
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रामदेवजी ने इस अनिवार्य जबरन दवा का कभी विरोध नहीं किया !
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लॉकडाउन से भारी नुकसान हुआ है। और फिर, रामदेवजी ने इस तालाबंदी का कभी विरोध नहीं किया !
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और अंत में, पीएम/सीएम वैक्सीन द्वारा हुई समस्याओं पर आंकड़ें छिपाते रहे हैं, और कई बार, पीएम/सीएम, सम्बन्धी जानकारी भी एकत्र नहीं कर रहे हैं और न ही कोई वेबसाइट बनवाई जहां कोई वैक्सीन के बाद मौत की रिपोर्ट कर सकता है, अन्य नुकसानों को भूल जाइए। और फिर, रामदेवजी ने कभी भी वैक्सीन से होने वाली मौतों पर कोई डेटा एकत्र करने और उनको सार्वजनिक करने की मांग नहीं की।
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रोगी तय करेगा कि वह किस डॉक्टर से इलाज चाहता है। पूरा आयुर्वेद बनाम एलोपैथी का मामला एकदम बकवास है, क्योंकि उत्तर सिर्फ एक पंक्ति का है — रोगी तय करे कि वह किस डॉक्टर को देखना चाहता है। तो इस मुद्दे को बिल्कुल भी क्यों उठाया जाये !
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तो कुल मिलाकर, केवल वास्तविक मुद्दों को दरकिनार करने के लिए, जैसे कि टीके से होने वाली मौतों पर डेटा का खुलासा, और लॉकडाउन से होने वाली मौतों, रामदेवजी और आईएमए दोनों ने मिलकर इस बेकार आयुर्वेद बनाम एलोपैथी बकवास मुद्दा बनाया है।
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>आयुर्वेद का समर्थन करने वालों के लिए :
आयुर्वेदिक दवाओं के लिए कोई नियामक प्राधिकरण नहीं है जिसके द्वारा आयुर्वेदिक टैग में बहुत सारी छद्म दवाएं बेची जाती हैं। भारत में कोई भी खुद को आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में टैग कर सकता है और दवाएं देना शुरू कर सकता है, यहां तक कि अपनी दवाएं भी बना सकता है, मरीजों के लिए उनके खिलाफ रिपोर्ट करने का कोई तरीका नहीं है।
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चमत्कारिक दवाओं के खिलाफ एक कानून है लेकिन वह कभी लागू नहीं होता है।
तो जिन्हे लगता है, जैसे रामदेव जी, कि आयुर्वेद सबसे बेहतर है, वे कभी आयुर्वेद के नाम पर निरंकुश ठगी को रोकने के लिए सरकार से किसी कानून की मांग क्यों नहीं करते ?
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उत्तर आपके पास है ! क्यूंकि उन्हे आयुर्वेद बनाम अलोपथी करके लोगों का ध्यान असली मुद्दे जैसे प्रधानमंत्री द्वारा जबरदस्ती टीकाकरण, टीके से होने वाली समस्याओं, तालाबंदी, आदि से ध्यान हटाना था।
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2011 में अनशन से तबियत के बिगड़ने पर बाबा जी ने एलॉपथी अस्पताल में शरण लेकर जान बचायी।
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