Pawan Jury BhilwaraRj
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाने का आसान तरीका क्या है जिसमें कि उस याचिका पर अवश्य सुनवाई हो?
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मोटा मोटी इसके 4 तरीके है :
1. पैसा
2. पहुँच
3. पेड मीडिया
4. एडवेंचर
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(1) पैसा : यदि आपके पास सुप्रीम कोर्ट के जजों को देने के लिए पैसा है तो वे आपकी याचिका ले लेंगे. और फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह मुद्दा जनहित से जुड़ा हुआ है या नहीं !!
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'इधर रमेश प्लेटफोर्म पर पंहुचा और उधर रेलगाड़ी चल दी' की तर्ज पर जैसे ही सुप्रीम कोर्ट जज के पास पैसा पहुचेंगा वैसे ही तुरंत वह याचिका स्वीकार कर लेगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज आपसे सीधे पैसा नहीं लेंगे. इसके लिए आपको सुप्रीम कोर्ट के किसी जमे हुए यानी नामी वकील के माध्यम से पैसा देना पड़ेगा.
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लेकिन नामी वकील भी आपसे “जज को घूस” देने के नाम पर पैसा नहीं लेगा. वह घूस की यह राशि अपनी फ़ीस में जोड़ता है. मतलब वह आपसे जो 15 लाख लेगा उसमें से 10 लाख जज को देगा, और 5 लाख उसके पास रहेंगे.
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सभी “बड़े वकील” इसी तरह बड़े वकील बनते है. जज के साथ उनकी सेटिंग होती है, और इसीलिए वे मोटी फ़ीस लेते है. बाद में इस याचिका पर क्या फैसला आएगा वह भी दिए गए पैसे यानी घूस की राशि पर निर्भर करता है.
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उदाहरण के लिए, यदि आपने याचिका किसी “मोटी पार्टी” के खिलाफ लगाई है तो याचिका स्वीकार करने के लिए तो जज आपसे पैसा लेगा, लेकिन मामला स्वीकार करने के बाद सामने वाली पार्टी से और भी मोटी घूस लेकर याचिका ख़ारिज कर देगा !!
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इस तरह जज दोनों पार्टियों से पैसा बनाता है. और दोनों पार्टियों को कभी भी पता नहीं चलेगा कि उन्होंने जज को घूस दी है !! क्योंकि अगली पार्टी भी जज को सीधे पैसा नहीं देगी. वह भी वकील को ही देगी. मतलब कोई और भी बड़ा वकील यह केस लड़ने के लिए 2 करोड़ लेगा, और इसमें से 1.5 करोड़ जज को दे देगा !!
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(2) पहुंच : यदि आपका सम्पर्क किसी रसूखदार मंत्री, वरिष्ठ नौकरशाह, हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जज आदि के साथ है, और यदि आपकी याचिका पेड मीडिया के प्रायोजको या किसी रसूखदार व्यक्ति के खिलाफ नहीं है तो भी सुप्रीम कोर्ट के जज आपकी याचिका स्वीकार कर सकते है.
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(3) पेड मीडिया : यदि आपकी याचिका पेड मीडिया के प्रायोजको यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माताओ के हित में है तो बिना कोई पैसा चुकाए आपकी याचिका स्वीकार भी हो जायेगी, और फैसला भी जल्दी आ जाएगा. और इसे पेड मीडिया में काफी सकारात्मक कवरेज भी मिलेगा !!
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(4) एडवेंचर : कभी कभी जज कोई रोचक मामला देखते है तो एडवेंचर एवं सुर्खियों में आने के लिए मामला स्वीकार कर लेते है. किन्तु ऐसा एडवेंचर अनिवार्य रूप से पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ नहीं होना चाहिए. वरना जज को एडवेंचर महंगा पड़ सकता है. यदि याचिका पेड मीडिया के प्रायोजको के हितो के खिलाफ नहीं है, और इसमें रोचकता है तो 1-2% मामलो में याचिका स्वीकार हो सकती है.
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मेरी जानकारी में, सुप्रीम कोर्ट में बहुधा ऊपर दिए गए 4 तरीको से ही याचिकाए स्वीकार की जाती है !!
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समाधान ?
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प्रस्तावित जूरी कोर्ट के क़ानून ड्राफ्ट की धारा (36) में हायर जूरी कोर्ट एवं सुप्रीम जूरी कोर्ट में जनहित याचिकाएं स्वीकार करने की शक्ति राष्ट्रीय महाजूरी मंडल को दी गयी है. धारा (36) कहती है कि –
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(36) जनहित याचिकाएं : उच्चतर एवं उच्चतम महाजूरी मंडल में महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक विषयों पर सीधे जनहित याचिकाएं भी दायर की जा सकेगी। याचिका स्वीकार करने या खारिज करने का फैसला राष्ट्रीय महाजूरी मंडल करेगा। यदि याचिका स्वीकृत हो जाती है तो राष्ट्रीय महाजूरी मंडल फ़ीस के रूप में जमा की गयी राशि लौटाने का निर्णय ले सकती है। जनहित याचिकाओं की सुनवाई की प्रक्रिया भी उसी तरह से होगी जैसा जिला जूरी मंडल के खंड में बताया गया है।
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महाजूरी मंडल के गठन की प्रक्रिया धारा (11) में बतायी गयी है.
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(11) महाजूरी मंडल का गठन :
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(11.1) महाजूरी मंडल का गठन : राष्ट्रिय जूरी प्रशासक एक सार्वजनिक बैठक में दिल्ली की मतदाता सूची में से 25 वर्ष से 50 वर्ष की आयु के मध्य के 50 मतदाताओं का चुनाव लॉटरी द्वारा करेगा। इन सदस्यों का साक्षात्कार लेने के बाद जूरी प्रशासक किन्ही 20 सदस्यों को निकाल सकता है। इस तरह 30 महाजूरी सदस्य शेष रह जायेंगे।
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(11.2) अनुगामी महाजूरी मंडल : प्रथम महाजूरी मंडल में से जूरी प्रशासक पहले 10 महाजूरी सदस्यों को हर 10 दिन में सेवानिवृत्त करेगा। पहले महीने के बाद प्रत्येक महाजूरी सदस्य का कार्यकाल 3 महीने का होगा, अत: 10 महाजूरी सदस्य हर महीने सेवानिवृत्त होंगे, और 10 नए चुने जाएंगे। नये 10 सदस्य चुनने के लिए जूरी प्रशासक जिला/ राज्य /भारत की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा 20 सदस्य चुनेगा और साक्षात्कार द्वारा इनमें से किन्ही 10 की छंटनी कर देगा। इस तरह महाजूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा.
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(12) महाजूरी मंडलों का गठन करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाएगा :
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(12.1) मतदाता सूची ही जूरी ड्यूटी की सूची होगी, और जूरी का गठन मतदाता सूची से ही किया जाएगा
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(12.2) जूरी सदस्यों की आयु 25 से 50 वर्ष के बीच होगी। व्यक्ति की उम्र वही मानी जायेगी जो वोटर लिस्ट में दर्ज है।
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(12.3) सभी श्रेणी के सरकारी कर्मचारी स्पष्ट रूप से जूरी ड्यूटी के दायरे से बाहर रहेंगे।
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(12.4) जो नागरिक जूरी ड्यूटी कर चुके है, उन्हें अगले 10 वर्ष तक जूरी में नहीं बुलाया जायेगा।
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(12.5) यदि किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सक को जूरी ड्यूटी पर बुलाया जाता है तो डॉक्टर जूरी ड्यूटी पर न आने के लिए सूचना दे सकता है। जूरी सदस्य डॉक्टर पर जूरी ड्यूटी न करने के एवज में कोई आर्थिक दंड नहीं लगायेंगे।
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(12.6) यदि निजी क्षेत्र के कर्मचारी को जूरी ड्यूटी पर बुलाया गया है तो नियोक्ता उसे आवश्यक दिवसों के लिए अवैतनिक अवकाश प्रदान करेगा। नियोक्ता अवकाश के दिनों का वेतन कर्मचारी के वेतन में से काट सकता है।
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(12.7) महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 600 रू एवं यात्रा व्यय आदि का अतिरिक्त भुगतान किया जायेगा.
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(12.8) राष्ट्रीय महाजूरी मंडल के सदस्यों को यात्रा व्यय एवं भत्ते वगेरह दूरी के आधार पर मिलेंगे, और इसकी प्राथमिक दरें राष्ट्रीय जूरी प्रशासक तय करेगा। यदि दरें कम या ज्यादा है तो राष्ट्रिय महाजूरी मंडल बहुमत से इनमे बदलाव कर सकता है। इसके बाद ये दरें मुद्रा स्फीति या महंगाई दर के अनुसार समायोजित की जा सकेगी। आवागमन की दरें द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित शायिका ( Second Class AC Sleeper ) की दरों के समकक्ष होगी।
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यदि प्रधानमंत्री प्रस्तावित जूरी कोर्ट का क़ानून गेजेट में छाप देते है तो जनहित याचिका स्वीकार करने की शक्ति महाजूरी मंडल को मिल जाएगी, और तब बिना कोई पैसा दिए और बिना पेड मीडिया के सहयोग से वास्तविक जनहित याचिकाओ के स्वीकार होने की सम्भावना काफी बढ़ जाएगी.
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प्रस्तावित जूरी कोर्ट का पूरा ड्राफ्ट यहाँ देखा जा सकता है - <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/909604579412620/>
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भारत की सभी पेड मीडिया पार्टियों एवं सभी पेड बुद्धिजीवियों का मानना है कि, जनहित याचिकाओ को स्वीकार करने का अंतिम अधिकार सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजों के पास ही होना चाहिए और नागरिको की जूरी के पास किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिये.
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उनका दावा है कि एक आम भारतीय अशिक्षित, जाहिल, भ्रष्ट, निकम्मा, लालची, मूर्ख, जातिवादी, सांप्रदायिक है, और उसकी राजनैतिक संस्कृति परिपक्व नहीं है. आम भारतीय शासित होने की मानसिकता की ग्रस्त है, अत: आम भारतीयों को जनहित याचिकाएं स्वीकार करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए.
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इन पेड बुद्धिजीवियों से मेरा कहना है कि – "तुम अपनी बुद्धिमता के साथ दफा हो जाओ !! हमें तुम्हारी बौद्धिकता की कोई जरूरत नहीं है !!"
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दरअसल, जज सिस्टम का डिजाइन इस तरह का होता है कि पैसा फेंकने से काम हो जाता है. अत: धनिक वर्ग, नेता, नौकरशाह, रसूखदार एवं पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में जज सिस्टम जारी रखना चाहते है, जूरी कोर्मेंट के सख्त खिलाफ है.
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और इसीलिए उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम (पाठ्य पुस्तकें+समाचार पत्र+टीवी+फ़िल्में) से यह गलत धारणा भारतीय जनमानस में ठांस दी है, कि चूंकि आम भारतीय जाहिल है इसीलिए उन्हें जूरी राइट्स नहीं दिए जाने चाहिए.
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( जूरी कोर्ट का विरोध करने के लिए ये पेड बुद्धिजीवी किन पैंतरों एवं गलत तर्कों का इस्तेमाल करते है जल्दी ही मैं इस पर एक विस्तृत जवाब लिखूंगा.)
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