Pawan Jury BhilwaraRj
जब भारत का पीएम कोई फैसला करता है, और पेड मीडिया भी पीएम के फैसले का समर्थन करता है, तो निर्णायक व्यक्ति कौन होता है ?
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पेड मीडिया के प्रायोजक या पीएम ?
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उदाहरण के लिए जब पीएम ने नोटबंदी की थी तो पूरा पेड मीडिया भी इस फैसले के समर्थन में था। पेड मीडियाकर्मी दिन रात हमें यह समझाने में मेहनत कर रहे थे कि, इससे काला धन ख़त्म हो जाएगा। तब भी देश के कार्यकर्ताओ के बहुत बड़े वर्ग का मानना था कि नोटबंदी का काले धन से कोई लेना देना है। किन्तु पीएम एवं पेड मीडियाकर्मी दोनों का "मानना" था कि इससे काला धन ख़त्म हो जाएगा !!
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तो क्या पीएम एवं पेड मीडिया के प्रायोजक बेवकूफ थे कि उन्हें यह पता नहीं था !!
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तो पहले क्या होता है ?
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(1) पीएम पहले फैसला लेते है और बाद में पेड मीडिया के प्रायोजक उनके फैसले का समर्थन करते है ? अथवा
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(2) पहले पेड मीडिया के प्रायोजक फैसला लेते है, और तब पीएम को वे यह फैसला लेने के लिए कहते है।
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भारत में नागरिको का एक बड़ा वर्ग, और यहाँ तक कि पीएम के धुर विरोधी भी इस गलत धारणा के शिकार है कि पहले भारत का पीएम फैसला करता है, और फिर पेड मीडिया पीएम के फैसले का समर्थन करता है !!
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वे इस गलत धारणा के शिकार इसीलिए है क्योंकि उन्हें दूर दूर तक कोई अंदाजा नहीं है कि भारतीय पेड मीडिया के प्रायोजक कौन है, और उनकी शक्ति का पैमाना क्या है !!
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भारत के पेड मीडिया के प्रायोजक अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता है !! यह बाघ और बकरी की लड़ाई है। मतलब, संघर्ष करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यदि आप बाघ एवं बकरी को समान सुर में गाते देखते है तो सुर का फैसला हमेशा बाघ ही करेगा।
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तो जब भी आप देखते है कि पीएम ने कोई ऐसा फैसला लिया है जिसका पेड मीडिया समर्थन कर रहा है तो हमेशा ही वह फैसला पेड मीडिया के प्रायोजको द्वारा लिया जाता है, किन्तु इसकी घोषणा पीएम करता है !!
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बूजने है तो इनको मिले इनका जंगल,
और आदमी है, तो मदारी से छुड़ाया जाए
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बूजने - बन्दर
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डमरू पेड मीडिया है, और मदारी बदलते रहते है. बंदर डमरू की थाप पर गुलाटी लगाता है, लेकिन दर्शको को लगता है कि मदारी उन्हें नचा रहा है !! और वे मदारी बदलते रहते है !! दर्शक वही रहते है !!
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